Sunday, 20 December 2009

लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में


हर
धडकते पत्थर को लोग दिल समझते है ,
उम्रें बीत जाती हैं दिल को दिल बनाने में

फाकता की मज़बूरी ये भी कह नहीं सकती,
कौन सांप रखता है उसके आशियाने में

सर से पाँव तक वो गुलाबों का सजर लगता है,
बा वजू हो के भी छूते हुए डर लगता है

मै तेरे साथ सितारों से गुजर सकता हूँ,
कितना आसां मोहब्बत का सफ़र लगता है

मुझ में रहता है कोई दुश्मने जानी मेरा,
खुद से तन्हाई में मिलते हुए डर लगता है

जिंदगी तुने मुझे कब्र से कम दी है जमी,
पाओ फेलाओ तो दीवार में सर लगता है

वही ताज है वही तख़्त है, वही जहर है वही जाम है,
ये वही खुदा की जमी है, ये वही बुतों का निजाम है

बड़े शौक से मेरे घर जला, कोई आंच तुझपे आएगी,
ये जबान किसी ने खरीद ली, ये कलम किसी का गुलाम है

- बशीर बद्र

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