Sunday, 20 December 2009

हम तो ज़ख्मो की नुमाइश को गज़ल कहते हैं !

झील आँखों को होठों को कमल कहते हैं,
हम तो ज़ख्मो की नुमाइश को गज़ल कहते हैं।

अब आसमानों से रोजे हिसाब मांगता हूँ,
लहू में डूबा हुआ आफ़ताब मांगता हूँ,
मुझे ये इज्जतो, तौकीर कुछ नहीं दरकार,
मै एक सवाल हूँ अपना जवाब मांगता हूँ।

- मिराज फैजाबादी

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