Sunday, 20 December 2009

दुश्मनी लाख सही ख़त्म न कीजे रिश्ता


दुश्मनी
लाख सही , ख़त्म कीजे रिश्ता ,
दिल मिले या मिले हाथ मिलाते रहिये

कभी-कभी यूँ भी हमने अपने दिल को बहलाया है,
जिन बातों को खुद नहीं समझे, औरों को समझाया है

मीरों,ग़ालिब के शेरों ने किसका साथ निभाया है,
सस्ते गीतों को लिख-लिख के हमने घर बनवाया है

दिल में हो जुर्रत तो मोहब्बत नहीं मिलती,
खैरात में इतनी बड़ी दौलत नहीं मिलती

कुछ लोग यू ही शहर में हमसे भी खफा हैं,
हर एक से अपनी भी तबीयत नहीं मिलती

इंसान में हैवान यहाँ भी है वहां भी, अल्लाह निगेबान यहाँ भी है वहां भी,
खूंखार दरिंदों के फखत नाम अलग हैं, हर शहर बियाँबान यहाँ भी है वहां भी


रहमान की कुदरत हो कि भगवान् की मूरत,
हर खेल का मैदान यहाँ भी है वहां भी

- निदा फाजली

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