Sunday, 10 January 2010

अच्छे - बुरे की तुमको खबर दे के जाऊंगा


अच्छे - बुरे की तुमको खबर दे के जाऊंगा,
चेहरों को पढने वाली नजर दे के जाऊंगा,
यारों मै इस ज़माने का संगतराश हूँ ,
पत्थर को बोलने का हुनर दे के जाऊंगा

तुमको तुम्हारा फ़र्ज़ मुबारक ,
हमको मुबारक हमारा सुलूक,
हम फूलों की शाख तराशें,
तुम चाकू पर धार करो

फूलों की दुकाने खोलो,
खुशबू का व्यापार करो,
इश्क खता है तो ये खता,
एक बार नहीं सौ बार करो

खुश्क दरियाओं में हल्की सी रवानी और है,
रेत के नीचे अभी थोडा सा पानी और है,
एक कहानी ख़त्म करके हो गया वो मुतमईन,
भूल बैठा है कि आगे, एक कहानी और है,
जो भी मिलता है उसे अपना समझ लेता हूँ मै,
एक बीमारी मुझे ये खानदानी और है

बोरिये पे बैठिये कुल्ल्हड़ में पानी पीजिये,
हम कलंदर हैं हमारी मेजबानी और है

लोग हर मोड़ पर रुक-रुक के सम्हलते क्यूँ है,
वो इतना डरते हैं तो फिर घर से निकलते क्यूँ है

मेरे खुलूश की गहराई से नहीं मिलते,
ये झूटे लोग हैं सच्चाई से नहीं मिलते,
मोहब्बतों का सबक दे रहे हैं दुनिया को,
जो ईद अपने सगे भाई से नहीं मिलते

हम अब मकान में ताला लगाने वाले हैं,
पता चला है कि मेहमान आने वाले हैं,
इन्हें जहाज की उचाइयों से क्या मतलब,
ये लोग सिर्फ कबूतर उड़ाने वाले हैं

इसी मैखाने में एक वक़्त हमारा था,
मगर हम तुम्हारी तरह नशे में नहीं रहते थे

घरों के धंसते हुए मंजरों में रखे हैं,
बहुत से लोग यहाँ मकबरों में रखे हैं,
हमारे सर की फटी टोपियों पर तंज कर,
हमारे ताज अजायबघरों में रखे हैं

हमें हकीर जानो हम अपने नेजे से ग़ज़ल की आँख में काजल लगाने वाले हैं,
जंग होती थी जहाँ तुम भी वहीँ रहते थे, हाँ मगर अगली सफों में तो हमी रहते थे

राहत इन्दौरी

1 comment:

Udan Tashtari said...

राहत इन्दौरी साहब के तो क्या कहने!!