Wednesday, 13 January 2010

ये ऐसा क़र्ज़ है जो मै अदा कर ही नहीं सकता !


बस इतनी बात पर उसने हमें बलवाई लिखा है,
हमारे घर के बर्तन पर आई एस आई लिखा है


बुलंदी देर तक किस शख्श के हिस्से में रहती है,

बहुत ऊँची ईमारत हर घडी खतरे में रहती है,

ये ऐसा क़र्ज़ है जो मै अदा कर ही नहीं सकता,
मै जब तक घर लौटूं मेरी माँ सजदे में रहती है,

अमीरी रेशमो कमखाब में नंगी नज़र आई,
ग़रीबी शान से एक टाट के परदे में रहती है

मुहब्बत करने वालों में ये झगड़ा डाल देती है,
सियासत दोस्ती की जड़ में मठ्ठा डाल देती हैं,
तवायफ की तरह अपनी गलतकारी के चेहरे पर,
हुकूमत मंदिर और मस्जिद का पर्दा डाल देती है

हुकूमत मुहभराई के हुनर से खूब वाकिफ है,
ये हर कुत्ते के आगे शाही टुकड़ा डाल देती है,
कहाँ की हिजरतें,कैसा सफ़र कैसा जुदा होना,
किसी की चाहत पैरों पर दुपट्टा डाल देती है

भटकती है हवस दिन-रात सोने की दुकानों पर,
गरीबी कान छिदवाती है तिनका डाल देती है

- मुनव्वर राना

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