Wednesday, 20 January 2010

जब कभी कश्ती मेरी सैलाब में आ जाती है . . .


जब कभी कश्ती मेरी सैलाब में आ जाती है,

माँ दुआ करती हुई ख़ाब में आ जाती है।

यही मौसम था जब नंगे बदन छत पर टहलते थे,
यही मौसम है अब सीने में सर्दी बैठ जाती है।

सुलाकर अपने बच्चे को यही हर माँ समझती है,
कि उसकी गोद में किलकारियां आराम करती हैं।

मुझे घर भी बचाना है वतन को भी बचाना है,
मेरे कन्धों पर जिम्मेदारियां दोनों तरफ से हैं।

एक उम्र तक बुजुर्गों के पैरों में बैठ कर,
पत्थर को मैंने सीखा है पानी से काटना।

छत्ते से छेड़-छाड़ की आदत मुझे भी है,
सीखा है मैंने शहद की मक्खी से काटना।

मेरी ख्वाहिश है कि मै फिर से फरिश्ता हो जाऊं,
माँ से इस तरह लिपट जाऊं कि बच्चा हो जाऊं।

मै अपने गाँव का मुखिया भी हूँ बच्चों का कातिल भी,
जलाकर दूध कुछ लोगों के लिए घी बनाता हूँ।

मै चाहूँ तो मिठाई की दुकानें खोल सकता हूँ,
मगर बचपन हमेशा रामदाने तक पहुँचता है।

उन्ही को सर बुलंदी भी अता होती है दुनियां में,
जो अपने सर के नीचे हाथ का तकिया लगाते हैं।

ज़बाँ दो चाहने वालों को शायद दूर कर देगी,
मै बंगला कम समझता हूँ वो उर्दू कम समझता है।

सब ओढ़ लेंगे मिटटी की चादर को एक दिन,
दुनियां का हर चराग हवा की नज़र में है।

तेज आंधी में बदल जाते हैं सारे मंज़र,
भूल जाते हैं परिंदे भी ठिकाना अपना।

मुनव्वर राना

5 comments:

SACCHAI said...

sanjeev sir,

" bahut hi badhiya laga aapki is post ko padhker ..maano her alfaz aapne nichodker sanjoya hai bahut hi bhavpurn likhavat hai ."

" aapko is post ke liye dhero badhai ."

----- eksacchai { AAWAZ }

http://eksacchai.blogspot.com


sir,agar ho sake to plz ye word veryfication hata de
---thanx

रावेंद्रकुमार रवि said...

अच्छी खोज है!
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"सरस्वती माता का सबको वरदान मिले,
वासंती फूलों-सा सबका मन आज खिले!
खिलकर सब मुस्काएँ, सब सबके मन भाएँ!"

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क्यों हम सब पूजा करते हैं, सरस्वती माता की?
लगी झूमने खेतों में, कोहरे में भोर हुई!
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संपादक : सरस पायस

संगीता पुरी said...

सुंदर रचना !!

Udan Tashtari said...

बहुत आभार इस प्रस्तुति का!!

अजय कुमार said...

कमाल है धमाल है