Thursday, 21 January 2010

मै तो पत्थर था मुझे फेंक दिया ठीक किया !

मै तो पत्थर था मुझे फेंक दिया ठीक किया,
आज उस शहर में शीशे के मकां कैसे हैं।

सबा तू तो उधर से ही गुज़रती होगी,
उस गली में मेरे पैरों के निशाँ कैसे हैं।

राही मासूम रज़ा

वही आँगन ,वही खिड़की ,वही दर याद आता है,
मै जब भी तन्हा होता हूँ मुझे घर yaad आता है।

मेरे सीने की हिचकी भी, मुझे खुल कर बताती है,
तेरे अपनों को गाँव में, तू अक्सर याद आता है।

जो अपने पास हो उनकी कोई कीमत नहीं होती,
हमारे भाई को ही लो, बिछड़ कर याद आता है।

सफलता के सफ़र में तो कहाँ फुर्सत की कुछ सोचें,
मगर जब चोट लगती है, मुक्कदर याद आता है।

मई और जून की गर्मी बदन से जब टपकती है,
नवम्बर याद आता है, दिसंबर याद आता है।

आलोक श्रीवास्तव

2 comments:

rakhshanda said...

bahut khoobsoorat....

vivek said...

hum aapse kya kahen jaise purani ALMARI se koi pahle padi hui kitaab nikal aaty hai aur purane sher padker namkeen meetha munh ho jate hai waisa laga ,aapke bhi ashiyaar qamaal ke hain... main theatre artist,musician,aur patrakaar hun.. mere blog www.rangdeergha.blogspot.com par aapka swagat hai ,ise padkar apne vicharon se awagat ZAROOR KARWAYEN