Wednesday, 13 January 2010

वजारत के लिए हम दोस्तों का साथ मत छोड़ो !



बहुत सी कुर्सियां इस मुल्क में लाशों पे रखी हैं,
ये वो सच है जिसे झूठे से झूटा बोल सकता है,
चलो चलते हैं मिलजुल कर वतन पर जान देते हैं,
बहुत आसां है कमरे में वंदे-मातरम कहना

वजारत के लिए हम दोस्तों का साथ मत छोड़ो,
इधर इकबाल आता है उधर इकबाल जाता है,

मुनासिब है कि पहले तुम भी आदमखोर बन जाओ,

कहीं संसद में खाने कोई चावल-दाल जाता है?


ये मेरे मुल्क का नक्शा नहीं है, एक काज़ा है,
इधर से जो गुजरता है,
वो सिक्के डाल जाता है,

मोहब्बत रोज पत्थर से हमें इंसान बनती है,
तासुब रोज इन आँखों पे पर्दा डाल जाता है।

- मुनव्वर राना

3 comments:

संगीता पुरी said...

सुंदर रचना पढवाने के लिए आपका आभार !!

Udan Tashtari said...

बहुत आभार राणा जी की रचना प्रस्तुत करने का...आनन्द आ गया.

अजय कुमार said...

शानदार गजल