Sunday, 10 January 2010

भूले हैं रफ्ता-रफ्ता उन्हें मुद्दतो में हम


एक
पल में एक सदी का मज़ा हमसे पूछिए,

दो दिन की जिंदगी का मज़ा हमसे पूछिए

भूले हैं रफ्ता-रफ्ता उन्हें मुद्दतो में हम,
किश्तों में खुदकुशी का मज़ा हमसे पूछिए

आगाज़े आशिकी का मज़ा आप जानिए,
अंजामे आशिकी का मज़ा हमसे पूछिए

वो जान ही गए कि हमें उनसे प्यार है,
आँखों की मुखबिरी का मज़ा हमसे पूछिए

हँसने का शौक हमको भी था आपकी तरह,
हँसिये मगर हँसी का मज़ा हमसे पूछिए

खुमार बाराबंकी

1 comment:

Udan Tashtari said...

वो जान ही गए कि हमें उनसे प्यार है,
आँखों की मुखबिरी का मज़ा हमसे पूछिए।

आनन्द आ गया खुमार बाराबंकी जी को पढ़कर.