Wednesday, 13 January 2010

दिए से मेरी माँ मेरे लिए काजल बनाती है !


ये देख के पतंगें भी हैरान हो गईं,

अब तो छतें भी हिन्दू-मुसलमा हो गईं


जिस्म पर मिट्टी मलेंगे पाक हो जायेंगे हम,
जमीं एक दिन तेरी खुराक हो जायेंगे हम

गरीबी देख रस्ते में हमें मत छोड़ना,
अमीरी दूर रह, नापाक हो जायेंगे हम

मुसलसल गेसुओं की बरहमी अच्छी नहीं होती,
हवा सबके लिए ये मौसमी अच्छी नहीं होती,
मुनव्वर माँ के आगे यूँ कभी खुल के नहीं रोना,
जहाँ बुनियाद हो इतनी नमी अच्छी नहीं होती

लिपट जाता हूँ माँ से और मौसी मुस्कुराती है,
मै उर्दू में ग़ज़ल कहता हूँ हिंदी मुस्कुराती है
अँधेरे देख ले मुह तेरा कला हो गया,
माँ ने आँखे खोल दी घर में उजाला हो गया

इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है,
माँ बहुत गुस्से में होती है तो रो देती है,
किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकान आई,
मै घर में सबसे छोटा था मेरे हिस्से में माँ आई

मुझको हर हाल में बकशेगा उजाला अपना,
चाँद रिश्ते में नहीं लगता है मामा अपना,
मैंने रोते हुए पोछे थे किसी दिन आंसू,
मुद्दतों माँ ने नहीं धोया दुपट्टा अपना

जरा सी बात है लेकिन हवा को कौन समझाए,
दिए से मेरी माँ मेरे लिए काजल बनाती है,
सुना
है जब से तय होते हैं रिश्ते आसमानों में,
वो पगली उँगलियों से रोजोसब बादल बनाती है

सगुफ्ता लोग भी टूटे हुए होते हैं अन्दर से,
बहुत रोते हैं वो जिनको लतीफे याद रहते हैं,
खुदा ने ये सिफत दुनियां की हर औरत को बक्शी है,
कि वो पागल भी हो जाय तो बेटे याद रहते हैं

- मुनव्वर राना

2 comments:

Udan Tashtari said...

मुनव्वर राना साहब का कोई जबाब नहीं..उनको सुनना और पढ़ना हमेशा ही सुखद रहता है.

सुशील कुमार छौक्कर said...

राना जी को पढकर एक अलग ही अहसास महसूस होता है। शुक्रिया उन्हें पढवाने का। और हाँ ये वर्ड वेरिफिकेशन हटा दें प्लीज।