Sunday 15 April 2012

...जब एक धामके ने शुरू किया देश का सबसे खतरनाक गैंगवार


...सुपारी किलर एपिसोड- 8



कहते हैं जंग और प्यार में सब जायज है. 1993 (मुंबई) में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों ने दो दोस्तों को एक-दूसरे का सबसे बड़ा दुश्मन बना दिया. इनमें से एक था दुनिया के सबसे खूंखार अपराधियों में शामिल डॉन दाऊद इब्राहीम और दूसरा राजेंद्र सदाशिव निकल्जे उर्फ़ छोटा राजन.

फिल्मों की टिकट ब्लैक करने वाले राजेंद्र सदाशिव निकल्जे की मुलाक़ात एक दिन राजन नैयर उर्फ़ बड़ा राजन से होती है और जल्द ही यह लड़का राजन का ख़ास आदमी बन जाता है.


बड़ा राजन की मौत के बाद राजेंद्र सदाशिव निकल्जे खुद को उसके काले धंधों का नया सरताज घोषित करता है और बन जाता है 'छोटा राजन'. जल्द ही मुंबई के जुर्म की दुनिया में तीन नामों का सिक्का जम जाता है. दाऊद इब्राहीम, अरुण गवली और छोटा राजन की यह तिकड़ी अंडरवर्ल्ड की दुनिया में आतंक का दूसरा नाम बन जाता है. अरुण गवली के भाई की हत्या, इस गैंग से उसके अलग होने की वजह बनी.


अब छोटा राजन और दाऊद, जुर्म की दुनिया के ऐसे सिक्के बन चुके थे जिसमें चित और पट दोनों पर ही डी-कंपनी का नाम लिखा हुआ था. सब कुछ ठीक वैसा ही चल रहा था जैसा दाऊद चाहता था.


जुर्म करने वालों का भले ही कोई धर्म न हो लेकिन, ईमान जरुर होता है. ये बात अगर दाऊद के बारे में गलत थी तो छोटा राजन के बारे में उतनी ही सही. दाऊद और राजन के बीच यह छोटा सा फर्क उस दिन एक बड़ी खाई बनकर सामने आता है जब पैसे और ईमान की लड़ाई में दाऊद पैसों को चुनता है, जबकि छोटा राजन ईमान को.


1993 के मुंबई बम धमाकों ने छोटा राजन को दाऊद के गैंग का सबसे बड़ा दुश्मन बना दिया, क्योंकि राजन के लिए देश के मासूमों और निर्दोषों की हत्या, पैसे के लिए ईमान बेचने के बराबर था. इस घटना के बाद शुरू हुआ एक ऐसा गैंगवार जिसने मुंबई के साथ पूरे देश को हिला कर रख दिया...


'...सुपारी किलर' की अगली कड़ी में पढ़िए इस गैंगवार का खतरनाक अंजाम.

Friday 13 April 2012

...और तब सपने आना भी बंद हो जाते हैं


पुस्तक समीक्षा

किताब: आई टू हैड अ लव स्टोरी (अ हार्ट ब्रेकिंग ट्रू लव टेल)
लेखक: रविंदर सिंह
भाषा: अंग्रेजी
पहला प्रकाशन: 2009
पब्लिशर: श्रृष्टि पब्लिकेशन एंड डिस्ट्रीब्यूटर
मूल्य: 100 रूपए

दुनिया देखने के लिए आंखें जरुरी होती हैं, लेकिन सपने देखने के लिए इन आंखों को बंद करना जरुरी होता है.

किसी की भी जिंदगी में सपने देखने और सपनों के टूटने से ज्यादा दर्दनाक होता है, सपनों का खत्म हो जाना.


हम सबका शरीर, मन, आत्मा कभी न कभी ऐसे दौर से गुजरता है जब आंखें बंद होते ही सपनों की फिल्म शुरू हो जाती है. ये सिलसिला तब तक चलता रहता है जब तक की हम किसी भयंकर पीड़ा, दुःख, अवसाद, असफलता या विछोह से नहीं गुजरते. अक्सर और शायद ज्यादातर मामलों में इस तरह के सदमों के बाद सपने गायब हो जाते हैं.


ऐसा नहीं है कि इस तरह का अनुभव हर किसी को होता ही है, लेकिन जिन्हें भी होता है, जिंदगी के प्रति उनका नजरिया बेहद असामान्य (आम लोगों से हट कर) हो जाता है. बदलाव की यह प्रक्रिया इंसान के भीतर ही एक दूसरे इंसान को जन्म देती है. इस दूसरे इंसान का व्यक्तित्व लंबे समय से जी रहे पहले इंसान से बिलकुल अलग हो जाता है.


जीवन को झकझोर देने वाली एक ऐसी ही घटना 26 साल के एक युवक (रविंदर सिंह) के साथ घटती है. ये एक घटना उसे जिंदगी के कई ऐसे पाठ पढ़ा जाती है जो उसकी अब तक की जिंदगी के सरे पाठ और अनुभव को खोखला और बौना साबित कर देती है.


इंटरनेट के इस 'सूचना युग' में एक प्रतिभाशाली युवा(रविंदर सिंह), एक बेहद खूबसूरत लड़की (ख़ुशी) से मिलता है. मिलन का माध्यम बनता है इंटरनेट (शादी डॉट कॉम). बेहद आम भाषा और शैली में लिखी गई यह किताब जीवन के एक बेहद पेचीदा सवाल पर ख़त्म होती है, "क्या बिना किसी मकसद, प्रेरणा और उत्साह के जिंदगी जी जा सकती है? क्या कोई है जो इन सारी चीजों को हमारी जिंदगी में लाता और एकदम से इन्हें हमसे छीन लेता है?


इस किताब को रविंदर सिंह ने ही लिखा है और ये कहानी उनके जीवन में घटी एक घटना पर आधारित है.