Saturday, 23 January 2010

ये दौर बहुत मुश्किल है मगर ...

ये दौर बहुत मुश्किल है मगर
न जाने क्यूँ इसे सहता हूँ,
मेरे साथ कई रहबर हैं मगर
उन पर नहीं होता कोई असर।

मैं काहिल हूं, वो मेहनतकश
मैं हर काम में जान लड़ाता हूं,
वो जाम लड़ा कर कहते हैं...
तू काम बहुत करता है मगर, हम गधों से दूर ही रहते हैं।

वो कमजोरों पर हँसते हैं, उन्हें पिछड़ा कहते रहते हैं
ये देख के पीड़ा होती है कि 'साहब' भी उन्हीं की सुनते हैं,
ये खेल तमाशेबाजी का, मैं सीख भी लूं तो किसके लिए
हारुंगा तो अकेला रोउंगा, मैं जीता तो वो सब रोएंगे।

रोते को हँसाना चाहता था, गिरते को उठाना चाहता था
जो सबसे पीछे था उसको, मैं आगे लाना चाहता था
पर.. जो आगे हैं वो कहते हैं,
ये काम है नेता-मसीहा का, और खुद रिश्वत पर जीते हैं। 

अब सोचता हूँ, पिछड़ा किसको कहूँ
जो पीछे हैं या नीचे (नीच) हैं,
ये दौर बहुत मुश्किल है क्योंकि, यहां आगे वाला पिछड़ा है
जो पीछे है वो बढ़िया है, जो आगे है वो घटिया है।

संजीव श्रीवास्तव

Friday, 22 January 2010

क्यूँ पहुँच गए इस राह पे हम?

जीवन को समझना आसां नहीं,
किसी राह पर चलना आसां नहीं,
कह सकता हूं ये मैं क्योंकि, कई राहों से होकर गुजरा हूं
किसी राह में क्या दुश्वारी है, ये जाना जब एक ठोकर लगी।

बचपन में घर वालों ने कहा,
जवानी में जग वालों ने कहा,
अब चलता हूँ बस चलने के लिए,
उन सबको खुश रखने के लिए।

ऐसी भी कई राहें हैं जो, अब अक्सर याद आती हैं हमें
उन राहों पर थे साथी कई, वो सफ़र सुहाना लगता था
वो साथी आगे निकल गए, पर मैं अभी भी चलता हूँ
ये राह कठिन तब लगती है, वो साथी जब याद आते हैं

अक्सर ये सवाल परेशां करता है,
क्यूँ पहुँच गए इस राह पे हम,
ये तो हमारी राह न थी,
इसपे न तो कोई साथी बना,
न ये सफ़र सुहाना लगता है,

क्यूँ चुना ये सफ़र अब लगता है,
थी फिक्र हमें पैसों की बहुत,
था बेगारी का डर भी हमें,
थी उम्र निकलने की भी फिकर,

क्या करूँ घर में बहन कुंवारी थी, भाई की गंभीर बीमारी थी
अब मज़बूरी चलाती है, और हमको चलना पड़ता है
गर यूं हीं चला इन राहों पर, तो ये राहें शायद बच जाएं
गुर्बत तो फिर भी सह लेंगे, पर शायद हम न बच पाएं।

मुश्किल है इन राहों पर चलना क्योंकि,
जिंदा दिखता है इंसा बस, कोई रूह नहीं न उसमें जिगर
इसीलिए इन राहों पर, कोई साथी नया नहीं बनता है
अब समझा ये सफ़र हमें, सुहाना क्यूँ नहीं लगता है।

संजीव श्रीवास्तव

Thursday, 21 January 2010

अब नींद चैन की आती है !


जब
मै जाड़ों में घर पर होता था,
दालान में धूप सेंकता था,
अक्सर वहीँ चारपाई पे ही सो भी जाता था,
मेरी माँ मुझे अपना पसंदीदा साल उढ़ा देती थी,
उसे कोई और मांगे तो डांट सुना देती थी,

यहाँ धूप तो होती है उसी सूरज से मगर,
यहाँ वैसी नींद नहीं आती है,
जब कभी यहाँ झपकी लगती है ,
माँ के साल की याद आती है

इस बार जब मै घर पे गया,
और लौटने लगा जब घर से यहाँ,
माँ ने खाना बाँध दिया,और करने लगी बिदा मुझे,
मैने ठण्ड लगने का बहाना किया,
और वही पुराना साल मांग लिया

अब दूर हूँ घर से और माँ से भी,
पर सीने पर साल रखता हूँ,

रातों में रजाई के अन्दर,
जैसे
माँ से लिपटा रहता हूँ,
ठण्ड तो क्या जायेगी उस पुराने साल से लेकिन,
अब नींद चैन की आती है

संजीव श्रीवास्तव

Sunday, 17 January 2010

कुम्भ की कथा

कुम्भ की कथा का वर्णन विष्णुपुराण में मिलता है। जब देवताओं और असुरों में संग्राम हुआ तो देवता हारने लगे। ऐसे में उन्होंने श्री विष्णु से मदद की गुहार लगाई। विष्णु ने देवताओं को असुरों के साथ मिलकर समुद्र मंथन करने का सुझाव दिया। विष्णु के अनुसार इस समुद्र मंथन से निकलने वाले अमृत को पीकर देवता अमर हो जायेंगे और फिर असुरों को आसानी से हरा सकेंगे।

असुर अमृत के लालच में देवताओं के साथ समुद्र मंथन करने के लिए तैयार हो गए। विष्णु के अवतार कछप की पीठ पर विराट मद्रांचल पर्वत को मथनी बनाया गया और नाग राज वासुकी को रस्सी बना कर असुरों और देवताओं ने समुद्र मंथन शुरू किया। समुद्र मंथन से एक-एक कर कुल चौदह महारत्न निकले। इस मंथन से हलाहलविष भी निकला जिसे पीने से भगवान शिव का कंठ नीला हो गया और वो नीलकंठ कहलाए। समुद्र मंथन के अंत में धनवन्तरी अमृत-कलश ले कर प्रकट हुए। अमृत को पाने के लिए देवताओं और असुरों में पुनः युद्ध छिड गया।

युद्ध को रोकने के लिए विष्णु ने मोहनी (अत्यंत सुन्दर स्त्री) का रूप धारण किया। मोहनी ने दोनों के बीच समझौता कराया कि वो एक-एक कर देवताओं और असुरों को अमृत-पान कराएगी। मोहनी ने छल से सिर्फ देवताओं को ही अमृत पिलाना शुरू कर दिया। असुरों में से एक असुर राहु को इस बात का पता लग गया और वो वेश बदल कर देवताओं के बीच जा बैठा। सूर्य और चन्द्रमा को इस बात का पता लग गया। उन्होंने मोहनी को इस बात से परिचित कराया लेकिन तब तक वो अमृत-पान कर चुका था। इस पर विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से राहु का सर धड़ से अलग कर दिया। उसके दो हिस्से ही राहू और केतु कहलाए। चूँकि वो अमृत पी चुका था,इसलिए ऐसा माना जाता है कि वही राहु और केतु सूर्य और चन्द्रमा पर अपनी काली छाया डाल कर ग्रहण का निर्माण करते हैं।

इसी बीच अमृत को असुरों से बचाने के लिए इन्द्र के पुत्र जयंत अमृत कलश लेकर वहां से भागने लगे। वो लगातार १२ दिन तक भागते रहे। इस दौरान अमृत की कुछ बूंदे १२ स्थानों पर गिरी। जिनमे से चार स्थान पृथ्वी पर और आठ स्वर्ग पर थे। पृथ्वी पर ये चार स्थान थे - प्रयाग (इलाहाबाद), नासिक, उज्जैन और हरिद्वार। देवताओं का एक दिन मनुष्यों के १२ साल के बराबर होता है, इसीलिए हर बारहवे साल इन स्थानों पर महाकुम्भ का अयोजन होता है।

इस वर्ष ये पवित्र आयोजन हरिद्वार में हो रहा है। इस आयोजन में देशभर के १३ अखाड़े शामिल होंगे। इनमे से ७ अखाड़े दशनामी सन्यासियों के हैं,जिनमे नागा साधु शामिल होते हैं। अखाड़ों के स्नान को शाही स्नान कहा जाता है। पहला शाही स्नान १२ फ़रवरी को, दूसरा १५ मार्च को और प्रमुख शाही स्नान १५ अप्रैल को है। इस महापर्व की पूर्णाहुति २८ अप्रैल को, वैशाखी अधिमास पूर्णिमा स्नान के साथ होगी। उत्तराखंड सरकार ने कुम्भ से सम्बंधित एक वेबसाईट का भी निर्माण किया है जिसपर महापर्व से सम्बन्धित सूचना पायी जा सकती है। वेबसाइट का लिंक है - http://www.kumbh2010haridwar.gov.in

संजीव श्रीवास्तव

Tuesday, 12 January 2010

मुझे अक्सर अनदेखा कर देते हैं !


क्या था कह नहीं सकता,

क्यूँ था कह नहीं सकता,
कैसे हुआ कह नहीं सकता,
कब हुआ कह नहीं सकता,

क्यूँ हुआ कह नहीं सकता,
जो हुआ कह नहीं सकता,
किसने किया कह नहीं सकता,
कहते हैं जो होता है अच्छा होता है,

जो हुआ अच्छा हुआ,
जो होगा अच्छा होगा,
फिर क्यूँ अच्छा नहीं लगता,
जो हुआ या जो हो रहा है मेरे साथ,

सोचता था खूब पढूंगा,
खूब बड़े काम करूँगा,
जरुरत पड़ी तो जान भी दे दूंगा,
खून-पसीना एक कर दूंगा,

ऐसा नहीं है कि परेशानियाँ नहीं आई कभी,
ऐसा भी नहीं है कि दुशवारियां नहीं आई,
फिर भी करता रहा जो कर सका,
लड़ता रहा जहाँ तक लड़ सका।

अब कभी-कभी लगने लगता है कि,
शायद अब न लड़ सकूँगा,
शायद अब न जीत पाउँगा,
शायद अब न दौड़ पाउँगा,

ये अहसास मुझे अक्सर दूसरों को देख कर होता है,
उन्हें, जिनके पास पिता का साया है,
जिनके पास माँ का प्यार है,
जिनके पास अपना घर है,

जिनके पास खर्च करने के लिए पैसे हैं,
जिनके पास अच्छे कपडे हैं,
जो पढने के लिए किताबें खरीद सकते हैं,
जो जरुरत कि हर चीज खरीद सकते हैं।

मै सहम जाता हूँ जब खुद को उनके बीच पाता हूँ,
सोच में पड़ जाता हूँ, कैसे पहुँच गया इनके बराबर?
जबकि मेरे पास ना तो पिता हैं, ना उनका सहारा,
न घर है, न खर्चने के पैसे, किताब तो क्या कभी-कभी
पेन की रिफिल खरीदने के भी पैसे नहीं होते जेब में,

मेरी तंगहाली मेरे सहपाठियों से मुझे दूर कर देती है,
क्यूँकी मेरे कपड़े थोड़े भद्दे होते हैं,
वो लेटेस्ट ट्रेंड से मैच नहीं खाते,
मै हफ़्तों एक ही जोड़े में गुज़ार देता हूँ,
उन्हें लगता है मै बहुत गन्दगी से रहता हूँ,

उन्हें लोग बड़ी इज्ज़त देते हैं, मुझे अक्सर अनदेखा कर देते हैं,
वो वीकेंड पर पित्जा खाने की बात करते हैं तो मै सकपका जाता हूँ,
इन सब के कारण मै भीड़ में भी तनहा महसूस करता हूँ,
उन्हें मुझ पर हँसता हुआ देख, खुद भी हंसने का दिखावा करता हूँ।

लोग कहते हैं दिखावे पर मत जाओ,
लेकिन आज तो वही बिकता है जो दिखता है,
मै उनके बीच अक्सर अनदेखा कर दिया जाता हूँ,
इसलिए कभी-कभी लगने लगता है कि,
शायद अब न लड़ सकूँगा
शायद अब न जीत सकूँगा ...

संजीव श्रीवास्तव

Monday, 11 January 2010

क्या जीना सच में इतना मुश्किल है?


क्या अक्सर ये बताया जा सकता है कि, आप खुश हैं?

या ये कि आप खुश नहीं हैं?
कई बार हम बताना चाहते हैं, लेकिन बता नहीं पाते,
कई बार हम कहना चाहते हैं , लेकिन कोई सुनने वाला नहीं होता ।
क्यूँ ऐसा होता है कि हम चाहकर भी कह नहीं पाते,
कह कर भी बता नहीं पाते,
क्या जीना सच में इतना मुश्किल है?
क्या खुश रहना इतना मुश्किल है?
कहाँ है ख़ुशी ?
हमारी सफलता में?
हमारे रिजल्ट कार्ड में ?
हमारे प्रमोशन में ?
टी. वी. सिरीयल में?
मल्टीप्लेक्स में?
डिस्को-थेक में?
स्कूल में?
कॉलेज में?
ऑफिस में...
अक्सर मै खुश महसूस करता हूँ,
जब अकेला होता हूँ,
जब दोस्तों के साथ होता हूँ,
जब कोर्स से अलग कोई किताब पढ़ता हूँ,
जब घर का खाना खाता हूँ,
जब स्कूल से घर जाता था,
जब ऑफिस से निकल आता हूँ,
जब किसी के साथ हँसता हूँ,
जब किसी को हँसाता हूँ,
जब-जब अपने मन की करता हूँ,
तब-तब मेरे सिवाए सब नाखुश होते हैं,
मन करता है कि कुछ नया करूँ,
कुछ अलग करूँ,
कुछ ऐसा करूँ , जिससे किसी को हँसा सकूँ,
किसी को जीता सकूँ, किसी को विश्वास दिला सकूँ,
कि वो भी खुश हो सकता है,
कि वो भी वो सब कर सकता है जो उसका मन करता है।
फिर डर जाता हूँ कि,
क्या ऐसा करके बड़ा घर बना सकूँगा?
क्या ऐसा करके बड़ी गाड़ी खरीद सकूँगा?
क्या ऐसा करके मल्टीप्लेक्स में जा सकूँगा?
क्या ऐसा करके लेवाइस की जींस पहन सकूँगा?
फिर भी ऐसा करके मै खुश क्यूँ हो जाता हूँ?
जबकि और कोई भी मेरे घर में खुश नहीं होता,
जबकि घर में सब चाहते हैं कि मै खुश रहूँ।

संजीव श्रीवास्तव

Sunday, 10 January 2010

आंकड़ो में सिमटती गरीबी


गरीबी
रेखा को लेकर हमारे देश में इतनी रिपोर्ट्स चुकी हैं कि फैसला करना मुस्किल हो जाता है कि आखिर हमारे देश में गरीबों की वास्तविक संख्या क्या हैराष्ट्रीय सांख्यकी आयोग के पूर्व अध्यक्ष सुरेश तेंदुलकर ने दिसंबर २००९ को अपनी रिपोर्ट पेश करते हुए बताया कि अभी भी ३७.% जनसंख्या गरीबी रेखा के नीचे रहती है जहाँ शहरों में २५.% लोग गरीबी रेखा के नीचे गुजर-बसर कर रहे हैं वहीँ गावों में ये संख्या ४१.% हैइस रिपोर्ट में वर्ष २००४-०५ को आधार वर्ष बनाया गया है

विश्व बैंक मानता है कि भारत में ४२% लोग गरीबी रेखा के नीचे रह रहे हैंजबकि २००७ में अर्जुन सेन गुप्ता समिति ने ये बता कर सबको चौंका दिया था कि देश कि ७७% जनसँख्या २० रूपए से भी कम पर गुजारा करती है ग्रामीद विकास मंत्रालय द्वारा गठित एन सी सक्सेना समिति के अनुसार ये संख्या ५०% है

देश में पहली बार गरीबी रेखा का निर्धारण १९७३ में किया गयाइस निर्धारण का आधार था कि प्रति व्यक्ति को कितनी कैलोरी उर्जा प्रतिदिन प्राप्त होती हैमाना गया कि अगर शहर में रहने वाले व्यक्ति को प्रतिदिन २१०० कैलोरी और गाँव में रहने वाले व्यक्ति को प्रतिदिन २४०० कैलोरी उर्जा मिलती है तो वो गरीबी रेखा के ऊपर हैउस समय इतनी कैलोरी उर्जा शहर में ७१ रूपए में और गाँव में ६२ रूपए महीने में पाई जा सकती थी

२००४ - ०५ तक सरकार ये मानती रही कि इतनी कैलोरी उर्जा शहर में ५३९ और गाँव में ३५६ रूपए खर्च करके पाई जा सकती है। इन्ही कसौटियों की देन रही कि जहाँ १९७३ में देश में गरीबों कि संख्या ५५% थी, वहीँ १९८३ मेंघट कर ४४% हुई और १९९३-९४ में ये ३६% हो गई। अब महज ३७.२% गरीब ही देश में रह गए हैं।

ये समझाना किसी के लिए भी मुस्किल नहीं होगा कि महज ५३९ या ३५६ रूपए महीने में किसी भी गाँव या शहर में कितने कैलोरी वाला खाना मिल सकता है। क्या सिर्फ खाना ही वो पर्याप्त आधार है जिससे इस बात का निर्धारण किया जा सकता है कि कोई व्यक्ति गरीब है या नहीं? क्या तन ढकने के लिए कपड़ा, रहने के लिए छत और शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी चीजे सिर्फ अमीरों के लिए ही जरुरी हैं?

शायद अभी भी हम उस औपनिवेशिक सोच से बाहर नहीं निकल पाए हैं कि अमीर और गोरों की तरह गरीब और काले इंसान को भी जीने के लिए मानवीय परिस्थितियों की दरकार है।

संजीव श्रीवास्तव