Wednesday, 29 August 2018

इतने टेंशन में क्यों रहते हैं आप?

नेहा - तो क्या मैं पापा से बात करूं? 
जय - किस बारे में? 
नेहा - अरे शादी के बारे में और किस बारे में? 
जय - कौन, वो तुम्हारे पापा के दोस्त की बेटी? 
नेहा - हां, लड़की बहुत सुंदर है। 
जय - देखो तुम जानती हो कि मुझे सुंदरता में कोई इंट्रेस्ट नहीं है। मुझे पता है मैं कैसा दिखता हूं। और फिर किसी खुबसूरत लड़की को मेरे जैसे कम शक्ल इंसान में इंट्रेस्ट क्यों होगा? 
नेहा - आप एक बार मिल तो सकते हैं उससे। 
जय - तुम्हें पता है कि शादी के इस सिस्टम का मैं समर्थक नहीं हूं। अच्छा, तुम बताओ तुम सबसे ज्यादा प्यार किससे करती हो। 
नेहा - अपने मम्मी-पापा से। 
जय - अच्छा, इन दोनों से तुम्हारा रिश्ता कैसे बना? क्या तुमने अपने मां-बाप को चुना था? मतलब, दुनिया का पहला रिश्ता ही नैचुरल है, स्वाभाविक है, प्राकृतिक है। इसमें चुनाव वाली तो कोई बात ही नहीं है। इसके बाद भाई-बहन, दोस्त-रिश्तेदार, ये सारे रिश्ते तो स्वाभाविक ढंग से ही बनते हैं। हम ये तो नहीं कहते कि वो दिखने में अच्छा नहीं है तो उसे मैं अपना भाई नहीं कहूंगी। फिर, ऐसा रिश्ता जिसे हम जिंदगी भर निभाने की कसम खाते हैं उसे शर्तों पर क्यों तय किया जाता है? क्यों ये शर्त रखी जाती है कि तुम्हारी शादी उसी शख्स से होगी जो तुम्हारे धर्म का हो, तुम्हारी ही जाति का हो, गोत्र एक ही हो.... इस रिश्ते को भी स्वाभाविक ढंग से क्यों नहीं बनने दिया जाता? क्यों इतनी दीवारें खड़ी की जाती हैं? 
नेहा - आपको किसी ने रोका है क्या ऐसा करने से? आपको करना है तो आप कीजिए अपने ढंग से। और अगर होना होता तो हो गया होता अब तक.... अगर आप कोशिश ही नहीं करेंगे तो कैसे होगा वैसा भी जैसा आप चाहते हैं। कोशिश तो कीजिए...किसी से मिलेंगे-जुलेंगे तभी तो होगा वैसा, जैसा आप चाहते हैं। लेकिन आपको तो किसी से मिलना ही नहीं है। 
जय - देखो, मैं मिलने के खिलाफ नहीं हूं लेकिन, ये मिलना भी तो कंडीशनल ही हुआ न? हम किसी से इसलिए मिलेंगे क्योंकि एक-दूसरे में हम शादी की संभावना तलाशेंगे? 
नेहा - तो फिर कैसे मिलेगी वो जिसे आप तलाश रहे हैं? 
जय - किसने कहा कि मैं तलाश रहा हूं? 
नेहा - तो फिर इतने बेचैन क्यों रहते हैं हर वक़्त ? 
जय - तुम्हे ऐसा क्यों लगता है कि मैं इसलिए बेचैन हूं कि मुझे किसी की तलाश है? ये भी तो हो सकता है कि मेरी तलाश पूरी हो गई है इसलिए मेरी बेचैनी बढ़ गई है। क्या बेचैनी का ये कारण नहीं हो सकता कि जिसकी तलाश थी वो मिल गई है, लेकिन मैं उसे ये बता नहीं पा रहा हूं? 
नेहा ने कोई जवाब नहीं दिया...

गुझिया की याद में

ढोल-नगाड़ों की तेज आवाज से अचानक उसकी नींद टूट गई। चादर से मुंह निकाल उसने घड़ी देखने की कोशिश की। साढ़े ग्यारह बज रहे थे। उसने सोचा: बाहर निकलने का भी क्या फायदा, चाय-सिगरेट तो मिलेगी नहीं आज।

मोबाइल पर होली मुबारक वाले नोटिफिकेशन की बाढ़ आई हुई थी। उसने किसी को जवाब नहीं दिया। बिस्तर से उठ जैसे ही उसने दरवाजा खोला तो चटख धूप पूरे कमरे में फैल गई। आंख मिझते हुए बालकनी की ओर बढ़ा ही था कि उसका पांव फिसल गया। नीचे देखा तो पूरी फर्श गीली थी। तभी पानी से भरा एक बड़ा सा गुब्बारा उसके पांव के पास छपाक से गिरा।

गुब्बारे में रंग नहीं था, सिर्फ पानी। सामने वाले घर में दो बच्चे गुब्बारों से भरी बाल्टी लिए ये करतब कर रहे थे। उसकी नजर पड़ते ही बच्चे थोड़ा सहम गए। बालकनी में खड़ा वह काफी देर तक गली में लोगों के झुंड और बच्चों की टोली पर पानी, रंगों और गुब्बारों की बौझार को देखता रहा।

उसे अचानक गुझिया की याद आ गई। सामने वाले बच्चों को खाता देख उसे भी जैसे भूख लग आई। मोबाइल की घंटी सुन वह अंदर आ गया।

- हैलो, आपको भी हैप्पी होली। इतना शोर क्यों हो रहा वहां?

- अरे, मत पूछो यार। कल तक तुम्हारी भाभी ने रो-रो कर बुरा हाल कर रखा था। जब तक बेटा घर में आ नहीं गया तब तक गुझिया का सामान लाने तक को तैयार नहीं थीं। अब सारे मिलकर गुझिया बना रहे हैं और एक-दूसरे को परेशान कर रहे हैं। खैर, तुम क्यों नहीं आए होली पर?

- अरे, आप जानते तो हैं... प्राइवेट नौकरी में छुट्टी का ही तो लफड़ा है।

- हां, सो तो है। और... खाना-वाना खा लिया? भगवान को थोड़ा अबीर-गुलाल चढ़ा देना। होली के दिन शुभ करना जरूरी होता है।

- हां, चढ़ा दिया है।

- अच्छा, रखता हूं फोन। पता नहीं किस-किस का मिस कॉल और मैसेज आ चुका है इतनी देर में। उन्हें भी निबटाना जरूरी है यार। चलो तुम होली एंन्जॉय करो। हैप्पी होली!

Sunday, 15 April 2012

...जब एक धामके ने शुरू किया देश का सबसे खतरनाक गैंगवार


...सुपारी किलर एपिसोड- 8



कहते हैं जंग और प्यार में सब जायज है. 1993 (मुंबई) में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों ने दो दोस्तों को एक-दूसरे का सबसे बड़ा दुश्मन बना दिया. इनमें से एक था दुनिया के सबसे खूंखार अपराधियों में शामिल डॉन दाऊद इब्राहीम और दूसरा राजेंद्र सदाशिव निकल्जे उर्फ़ छोटा राजन.

फिल्मों की टिकट ब्लैक करने वाले राजेंद्र सदाशिव निकल्जे की मुलाक़ात एक दिन राजन नैयर उर्फ़ बड़ा राजन से होती है और जल्द ही यह लड़का राजन का ख़ास आदमी बन जाता है.


बड़ा राजन की मौत के बाद राजेंद्र सदाशिव निकल्जे खुद को उसके काले धंधों का नया सरताज घोषित करता है और बन जाता है 'छोटा राजन'. जल्द ही मुंबई के जुर्म की दुनिया में तीन नामों का सिक्का जम जाता है. दाऊद इब्राहीम, अरुण गवली और छोटा राजन की यह तिकड़ी अंडरवर्ल्ड की दुनिया में आतंक का दूसरा नाम बन जाता है. अरुण गवली के भाई की हत्या, इस गैंग से उसके अलग होने की वजह बनी.


अब छोटा राजन और दाऊद, जुर्म की दुनिया के ऐसे सिक्के बन चुके थे जिसमें चित और पट दोनों पर ही डी-कंपनी का नाम लिखा हुआ था. सब कुछ ठीक वैसा ही चल रहा था जैसा दाऊद चाहता था.


जुर्म करने वालों का भले ही कोई धर्म न हो लेकिन, ईमान जरुर होता है. ये बात अगर दाऊद के बारे में गलत थी तो छोटा राजन के बारे में उतनी ही सही. दाऊद और राजन के बीच यह छोटा सा फर्क उस दिन एक बड़ी खाई बनकर सामने आता है जब पैसे और ईमान की लड़ाई में दाऊद पैसों को चुनता है, जबकि छोटा राजन ईमान को.


1993 के मुंबई बम धमाकों ने छोटा राजन को दाऊद के गैंग का सबसे बड़ा दुश्मन बना दिया, क्योंकि राजन के लिए देश के मासूमों और निर्दोषों की हत्या, पैसे के लिए ईमान बेचने के बराबर था. इस घटना के बाद शुरू हुआ एक ऐसा गैंगवार जिसने मुंबई के साथ पूरे देश को हिला कर रख दिया...


'...सुपारी किलर' की अगली कड़ी में पढ़िए इस गैंगवार का खतरनाक अंजाम.

Friday, 13 April 2012

...और तब सपने आना भी बंद हो जाते हैं


पुस्तक समीक्षा

किताब: आई टू हैड अ लव स्टोरी (अ हार्ट ब्रेकिंग ट्रू लव टेल)
लेखक: रविंदर सिंह
भाषा: अंग्रेजी
पहला प्रकाशन: 2009
पब्लिशर: श्रृष्टि पब्लिकेशन एंड डिस्ट्रीब्यूटर
मूल्य: 100 रूपए

दुनिया देखने के लिए आंखें जरुरी होती हैं, लेकिन सपने देखने के लिए इन आंखों को बंद करना जरुरी होता है.

किसी की भी जिंदगी में सपने देखने और सपनों के टूटने से ज्यादा दर्दनाक होता है, सपनों का खत्म हो जाना.


हम सबका शरीर, मन, आत्मा कभी न कभी ऐसे दौर से गुजरता है जब आंखें बंद होते ही सपनों की फिल्म शुरू हो जाती है. ये सिलसिला तब तक चलता रहता है जब तक की हम किसी भयंकर पीड़ा, दुःख, अवसाद, असफलता या विछोह से नहीं गुजरते. अक्सर और शायद ज्यादातर मामलों में इस तरह के सदमों के बाद सपने गायब हो जाते हैं.


ऐसा नहीं है कि इस तरह का अनुभव हर किसी को होता ही है, लेकिन जिन्हें भी होता है, जिंदगी के प्रति उनका नजरिया बेहद असामान्य (आम लोगों से हट कर) हो जाता है. बदलाव की यह प्रक्रिया इंसान के भीतर ही एक दूसरे इंसान को जन्म देती है. इस दूसरे इंसान का व्यक्तित्व लंबे समय से जी रहे पहले इंसान से बिलकुल अलग हो जाता है.


जीवन को झकझोर देने वाली एक ऐसी ही घटना 26 साल के एक युवक (रविंदर सिंह) के साथ घटती है. ये एक घटना उसे जिंदगी के कई ऐसे पाठ पढ़ा जाती है जो उसकी अब तक की जिंदगी के सरे पाठ और अनुभव को खोखला और बौना साबित कर देती है.


इंटरनेट के इस 'सूचना युग' में एक प्रतिभाशाली युवा(रविंदर सिंह), एक बेहद खूबसूरत लड़की (ख़ुशी) से मिलता है. मिलन का माध्यम बनता है इंटरनेट (शादी डॉट कॉम). बेहद आम भाषा और शैली में लिखी गई यह किताब जीवन के एक बेहद पेचीदा सवाल पर ख़त्म होती है, "क्या बिना किसी मकसद, प्रेरणा और उत्साह के जिंदगी जी जा सकती है? क्या कोई है जो इन सारी चीजों को हमारी जिंदगी में लाता और एकदम से इन्हें हमसे छीन लेता है?


इस किताब को रविंदर सिंह ने ही लिखा है और ये कहानी उनके जीवन में घटी एक घटना पर आधारित है.

Tuesday, 27 March 2012

जब दुनिया के सबसे खूंखार आका का दुश्मन बना उसका ही एक वफादार


'...सुपारी किलर' एपिसोड-7

लालच और गलत संगत ने दाउद को सिर्फ एक अपराधी ही नहीं, बल्कि एक आतंकवादी बना दिया था जिसका मकसद अपने फायदे के लिए किसी को भी नुकसान पहुँचाना था, भले ही वह अपना वतन ही क्यों न हो. उसके इसी लालच ने दाउद गैंग में ही उसके सबसे वफादार साथी को उसका दुश्मन बना दिया.

'राजेंद्र सदाशिव निखालजे' उर्फ़ 'छोटा राजन' जिसे दाउद का दाहिना हाथ कहा जाता था ने 1993 में हुए मुंबई बम धमाके के बाद न सिर्फ खुद को दाउद से अलग कर लिया, बल्कि उसने उन सब लोगों को ठिकाने लगाने की भी सोच ली जिन्होंने भारत के निर्दोष लोगों को निशाना बनाया था.

मुंबई बनी गैंगवार की राजधानी...

यहीं से छोटा राजन और दाउद गिरोह के बीच गैंगवार की शुरुवात हुई. डी-कंपनी छोड़ने के साथ ही अपने कुछ साथियों (मोहन कुट्टियन, साधू शेट्टी और जसपाल सिंह) के साथ छोटा राजन दुबई में जाकर बस गया.


जबकि उसे सबक सिखाने के लिए मुंबई में छोटा राजन के सबसे करीबी दोस्त रमानाथ पय्यादे की जून 1995 में दाउद के गुर्गों ने हत्या कर दी.


इससे पहले डी-कंपनी ने छोटा राजन के करीबी कहे जाने वाले फिल्म प्रोड्यूसर 'मुकेश दुग्गल' की हत्या करवा दी थी. छोटा राजन को सबक सिखाने के लिए दाउद का तरीका दिन पे दिन खौफनाक होता जा रहा था. उसे कमजोर करने की फिराक में दाउद हर उस शख्स को निशाना बना रहा था जिससे छोटा राजन के सम्बन्ध थे.


इस कड़ी में अगस्त 1995 में एक बड़ी घटना हुई जब राजन के करीबी रहे शार्प शूटर सुनील सावंत की भी मुंबई में हत्या हो गई. इसके अलावा राजन के दोस्त और मुंबई के बिल्डर ओ पी कुकरेजा की भी दाउद के गुर्गों ने हत्या कर दी.

छोटा राजन ने दिया डी-कंपनी को जोर का झटका

अब मौका था छोटा राजन के पलटवार का. उसने सबसे पहले ईस्ट वेस्ट एयरलाइंस के प्रबंध निदेशक थाकियुद्दीन वाहिद को निशाना बनाया जिसे किराए के किलर ने बम धमाके में उड़ा दिया.


लेकिन सबसे सनसनीखेज वारदात थी नेपाल के एक पूर्व मंत्री व संसद सदस्य मिर्ज़ा दिलशाद बेग की हत्या. दरअसल बेग को नेपाल में दाउद का सबसे ख़ास आदमी माना जाता था.

मुंबई बम धमाके के आरोपियों का फैसला किया छोटा राजन गिरोह ने...


इसके बाद छोटा राजन ने एक-एक कर उन सभी को निशाना बनाना शुरू किया जिहोने मुंबई बम धमाके का जाल बुना था. इसमें सबसे पहला शिकार सलीम कुर्ला था, जिसकी अप्रैल 1998 में हत्या हुई. इसके बाद जून में मोहम्मद जींदरान और मार्च 1999 में माजिद खान को भी राजन ने ठिकाने लगवा दिया.

हालांकि इसी दौरान डी-कंपनी ने शिवसेना के एक नेता मोहम्मद सलीम की भी हत्या करवा दी. ऐसा भी कहा जाता है कि इस घटना के बाद महाराष्ट्र की भाजपा सरकार छोटा राजन के पक्ष में हो गई और उसे रानीतिक संरक्षण भी मिलने लगा.


यहां तक कि शिवसेना के मुखपत्र 'सामना' में ये लिखा गया कि पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई छोटा राजन की हत्या कराने की फिराक में है.


फरवरी 2010 में छोटा राजन गिरोह ने जामिम शाह की हत्या करवा दी. माना जाता है कि वह नेपाल में एक बड़ी मीडिया हस्ती था और दाउद का समर्थक भी.


शाह के आईएसआई से भी सम्बन्ध थे और वह भारत में जाली मुद्रा पहुंचाने वाले गैंग का सरगना भी था. हालांकि उसके भारत विरोधी कामों से भारत सरकार लम्बे समय से परेशान थी. जिसे एक झटके में ही छोटा राजन ने ठिकाने लगा दिया.


'...सुपारी किलर' की अगली कड़ी में पढ़िए कैसे फिल्मों की टिकट ब्लैक करने वाला एक आम लड़का बन गया छोटा राजन...

Thursday, 9 February 2012

अपने देश का यह शख्स है आतंक की दुनिया का सबसे खूंखार 'आका'


...'सुपारी किलर' एपिसोड - 6

80 के दशक में मुंबई में स्मग्लिंग से लेकर अपराध के हर तरीकों पर वरदराजन मुदलियार, करीम लाला, मस्तान मिर्जा उर्फ़ हाजी मस्तान का नाम एक 'ब्रांड' बन चुका था. इनके लिए ब्रांड शब्द का इस्तेमाल थोड़ा अटपटा जरुर लगता है, लेकिन ये छोटा सा शब्द काली दुनिया के इनके बड़े साम्राज्य को समझने का बस एक शॉर्टकट तरीका है.




वरदराजन मुदलियार, हाजी मस्तान और करीम लाला के बाद जिस नाम ने इनकी जगह लेना शुरू किया वो था 'दाउद इब्राहीम'. वैसे तो इस नाम से ज्यादातर लोग परिचित हैं ही. सभी को पता है कि दाउद जिस कंपनी (गैंग) को चलाता है, उसे ही शॉर्ट में 'डी-कंपनी' भी कहा जाता है. दाउद पर आधारित अपनी इस श्रृंखला में हम आपको कुछ ऐसी सच्चाइयों से रूबरू कराने जा रहे हैं जिन्हें कम ही लोग जानते हैं.




डर के साथ नफरत फैलाने वाला 'पहला डॉन'





मुंबई में जो लोग अब तक डॉन के नाम से अपना प्रभाव रखते थे वो भले ही स्मग्लिंग जैसे गैरकानूनी काम में लगे हुए थे, और उनके नाम का लोगों में डर था, लेकिन दाउद इस दुनिया में उभरा ऐसा पहला नाम था जिसने डर के साथ नफरत फैलाने का भी 'धंधा' शुरू किया. इसकी शुरुवात 1990 में उसके अफगानिस्तान जाने से ही हो गई थी, लेकिन 12 मार्च 1993 को मुंबई में हुए सीरियल बॉम्ब ब्लास्ट ने इस बात की आधिकारिक पुष्टि कर दी.




इसके बाद तो उसका नाम देश ही नहीं पूरी दुनिया में चर्चा में आ गया. 2001 में अमेरिका पर हुए आतंकी हमले से लेकर, 2003 में भारतीय संसद पर हमला, गुजरात में ब्लास्ट जैसी वारदातों से उसका नाम जुड़ने लगा. जल्द ही पता चला कि उसके सम्बन्ध अल-कायदा से लेकर ओसामा बिन लादेन तक से हैं.




दुनिया भर में बन गया आतंक का पर्याय




2003 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने दाउद को 'अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी' घोषित किया, जबकि 2003 में ही भारत ने भी आतंकियों की हिट लिस्ट में दाउद का नाम सबसे ऊपर लिख दिया. अपराध और आतंक की उसकी दुनिया जिस तेजी से बढ़ रही थी, उसी तेजी से उसकी बदनामी का ग्राफ भी उठ रहा था. 2008 में फ़ोर्ब्स ने 'दुनिया के 10 सबसे खूंखार अपराधियों' की सूची में दाउद का नाम शामिल किया.




बढ़ते आतंक और मासूमों को निशाना बनाने का उसका यह खेल भले ही बहुत तेजी से पनप रहा था, लेकिन बढ़ रहे अत्याचार ने अपने ही गैंग में उसका सबसे बड़ा विरोधी पैदा कर दिया. इस शख्स ने दाउद के मजबूत किले में ऐसी सेंध लगाई कि एक-एक कर इसकी दीवारें ढहने लगीं.




'सुपारी किलर...' की अगली कड़ी में जानिए क्यों और कैसे इस अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी की जड़ों को खोदने का काम उसके ही एक गुर्गे ने किया...

जुर्म की दुनिया के बादशाह का यहां हुआ फकीरों से भी बुरा हाल


...'सुपारी किलर' एपिसोड - 5


पिछली कड़ी में आपने पढ़ा कि कैसे जेल से निकलने के बाद हाजी मस्तान ने अपने काम और मकसद को आसानी से बदल लिया और फ़िल्मी दुनिया में अपना सिक्का जमाना शुरू कर दिया.





कहा जाता है हाजी मस्तान को शुरू से ही फिल्मों से काफी लगाव था और वह फिल्म अभिनेत्री 'मधुबाला'को बेहद पसंद करता था. इत्तेफाक से उसकी मुलाक़ात एक ऐसी अदाकारा से हुई जिसकी शक्ल मधुबाला से काफी मिलती थी. हाजी मस्तान उसकी खूबसूरती पर फ़िदा हो गया. 'सोना'नाम की इस अदाकारा के लिए उसने कई फिल्मों में पैसे भी लगाए और अंततः उससे शादी कर ली. हाजी ने सोना को जूहू में देव आनंद साहब के घर के बगल में बना एक बंगला भी गिफ्ट किया.





एक साइकिल वाला बना एक आलिशान कोठी का मालिक





हाजी मस्तान का बचपन बेहद अभाव और गरीबी में बीता था. बड़ा बनने का सपना और गरीबी से लड़ाई, ये दोनों चीजें जब एक साथ चल रही हों, तो चलने वाला अक्सर इस दोराहे के भंवर में उलझ जाता है.





ऐसे में इंसान या तो परिस्थितियों के आगे घुटने टेक देता है या व्यवस्था के खिलाफ खड़ा हो जाता है. ऐसा शायद इसलिए भी होता है कि अक्सर, खुद को नैतिकता के ठेकेदार कहने वाले संत, महात्मा या नेता के पास या तो ऐसा युवा पहुंच नहीं पाता या शायद पहुंचने ही नहीं दिया जाता.





हाजी ने स्मग्लिंग से काफी पैसा बनाया था और उस पैसे को उसने पानी की तरह खर्च भी किया. बचपन में जब वह अपनी साइकिल की दुकान से वापस अपनी बस्ती जाता था तो रास्ते में बने बड़े-बड़े बंगले हमेशा उसे ललचाते थे.





दरअसल,अपनी इन्हीं इच्छाओं को पूरा न कर पाने की बेबसी ने ही उसे एक साधारण साइकिल वाले से मुंबई का सबसे बड़ा डॉन बना दिया था. इसलिए जब उसके पास पैसे आए तो सबसे पहले उसने अपनी इन्हीं दबी इच्छाओं को साकार करने की कोशिश की और मुंबई के सबसे पॉश इलाके 'पेद्दा रोड' पर बने सोफिया स्कूल के ठीक सामने एक आलिशान हवेली खरीदी.





इस हवेली की छत से समन्दर साफ़ दिखाई देता था. कहते हैं हाजी मस्तान हवेली के ऊपरी हिस्से में बने एक छोटे से कमरे में रहता था जहां से वह अक्सर समन्दर को निहारता रहता था. शौक़ीन मिजाज हाजी को पढने का शौक था या नहीं ये कह पाना तो मुश्किल है, लेकिन उसके कमरे में तमिल के सभी बड़े अखबार और पत्रिकाएं जरुर आते थे. दरअसल, यही एक भाषा थी जिसे वह पढ़ सकता था.





हाजी मस्तान ने न सिर्फ बम्बई के पॉश इलाके में एक बड़ी कोठी खरीदी बल्कि, वह जब भी अपने बंगले से निकलता तो उस जमाने में स्टेटस सिम्बल कहलानी वाली 'मर्सिडीज बेंज' कार और महंगी ब्रांडेड सिगरेट और सफ़ेद डिजाइनर पोशाक में ही दिखाई देता.





जुर्म से कमाए पैसे के बल पर बनना चाहता था 'मसीहा'





हाजी मस्तान को जब यह लगने लगा कि अब जुर्म की दुनिया में उसके प्रभाव के गिरने का वक़्त आ गया है, ठीक तभी उसने इस दुनिया से नाता तोड़ने और राजनीति की दुनिया में कदम रखने का फैसला किया.





दक्षिण मुंबई के मुस्लिम बहुल इलाकों में उसने अपना प्रभाव बढ़ाना शुरू किया. इलाके के लोगों के साथ उठने-बैठने और त्योहारों, शादी-विवाह के मौकों पर लोगों की आर्थिक मदद करने की वजह से जल्दी ही हाजी इन लोगों के बीच काफी लोकप्रिय हो गया. इसके साथ ही उसने ऐसी संस्थाओं की भी मदद करनी शुरू कर दी जो युवाओं को नशे की लत से छुटकारा दिलाने में लगे थे.





80 के दशक में उसने सार्वजानिक सभाएं करना शुरू कर दिया और इसी दौरान उसने दलित नेता 'जोगेंद्र कावडे' के साथ मिलकर 'दलित मुस्लिम सुरक्षा महासंघ' नाम की पार्टी का गठन किया. जुर्म की दुनिया से बनाई काली कमाई से मसीहा बनने का उसका सपना केवल सपना ही रह गया.





अपराध की दुनिया का बेताज बादशाह बनकर भी हाजी मस्तान फिल्म और राजनीति की दुनिया में एक खोटा सिक्का ही साबित हुआ. चमकने (या चलन में आने) की लाख कोशिशों के बाद भी उसे चलन से बाहर होना पड़ा.





शायद यहां मिली असफलता उसके दिल में बैठ गई और उसे दिल की बीमारी हो गई. 1994 में दिल की बीमारी की वजह से ही उसका देहांत हो गया. कहते हैं जिंदगी के अंतिम दिनों में उसे अपने परिवार की काफी चिंता होने लगी थी, जिसकी उसने काफी उपेक्षा की थी.





जुर्म की दुनिया से भले ही एक और नाम मिट गया लेकिन, उसे आगे बढ़ाने के लिए हाजी मस्तान के गैंग में से एक लड़का तैयार हो चूका था जिसे लोग 'दाउद इब्राहीम' के नाम से जानते हैं. अगली कड़ी में मिलिए गुनाहों की दुनिया के इस नए 'सुपारी किलर' से...