Sunday, 22 January 2012

कहानी एक साइकिल वाले की, जिस पर बनीं एक नहीं तीन-तीन फिल्में


...'सुपारी किलर' एपिसोड - 4

गुजरात के सबसे बड़े स्मगलर 'सुकुर नारायण बखिया' के संपर्क में आने के बाद 'मस्तान मिर्जा' ने स्मग्लिंग की दुनिया में काफी नाम कमाया और अब मुंबई की काली दुनिया में उसका नाम 'ब्लैंक चेक' बन चुका था. इस नाम की रसीद पर जितने रुपये जिससे चाहे लिए जा सकते थे.


केन्द्रीय मंत्री ने किया अनशन, तब गिरफ्तार हुआ हाजी


जब दिल्ली में सरकार का तख्ता हिला तो इसका असर स्मग्लिंग के काले कारोबार पर भी पड़ा. आपातकाल की कड़ाई ने मस्तान मिर्जा को भी सलाखों के पीछे पहुंचा दिया. हालांकि ऐसा भी कहा जाता है कि जब एक केन्द्रीय मंत्री ने अनशन किया तब जाकर मस्तान मिर्जा को गिरफ्तार किया जा सका. इस बात से मस्तान मिर्जा के प्रभाव का अंदाजा लगाया जा सकता है.


इस वक़्त तक मस्तान भले ही स्मग्लिंग की दुनिया का बड़ा नाम बन चुका था, लेकिन आम लोगों या मुंबई के गुंडों के लिए अभी भी ये नाम अनजान बना हुआ था. इसका बड़ा कारण था कि मस्तान तमिलनाडु का रहने वाला था और उसे 'हिंदी' बोलना नहीं आता था.


जेल में सीखी आम आदमी की जुबान और बन गया 'हाजी मस्तान'


जेल में बिताए गए उसके 18 महीनों ने उसके जबान में रह गई इस कमी को भी पूरा कर दिया. यहां उसने हिंदी बोलना भी सीख लिया. जेल से निकलने के बाद मस्तान का अंदाज और उसका मकसद बदल चुका था.


इसका कारण जेल की सलाखें थीं या कुछ और, कहना मुश्किल है. यहां से निकलने के बाद वह मक्का की यात्रा पर गया और वहां से लौटने के बाद उसने खुद को 'मस्तान मिर्जा' की जगह 'हाजी मस्तान' कहलाना शुरू कर दिया.


कहते हैं जेल से आने के बाद मस्तान ने अपने सारे काले धंधों से नाता तोड़ लिया और फिल्मी दुनिया में कदम रखा. 'मेरे गरीब नवाज' उसकी पहली फिल्म थी, जिसमे उसने पैसा लगाया. कहते हैं यह फिल्म हाजी मस्तान की जिंदगी का ही फिल्मी रूपांतरण थी.


डॉन ने बदल दिया अपना रास्ता क्योंकि...


अपने रुतबे और पैसे के बल पर जल्द ही वह फिल्मी दुनिया के बड़े-बड़े लोगों के साथ उठने-बैठने लगा. एक ओर जहां वह दिलीप कुमार और शशि कपूर के साथ फिल्मों पर चर्चा करता वहीं दूसरी ओर अंडरवर्ल्ड की दुनिया के दो बड़े दादा (करीम लाला और वरदराजन मुदलियार) उसे अपने साथ मीटिंग करने के लिए बुलाते थे.


जल्द ही 'हाजी मस्तान' का नाम देश के बड़े और सफल फिल्म डिस्ट्रीब्युटर्स में गिना जाने लगा. उस जमाने के सफल फिल्मी सितारों धर्मेन्द्र, फिरोज खान, राज कपूर और संजीव कुमार के साथ उसके काफी नजदीकी सम्बन्ध बन चुके थे. कहा ये भी जाता है कि जब सलीम खान फिल्म 'दीवार' बना रहे थे तो उनका और अमिताभ बच्चन का हाजी के घर अक्सर जाना-आना होता था.


दरअसल, फिल्म दीवार एक माफिया पर केन्द्रित फिल्म थी जिसमे 786 नंबर का बिल्ला पहना हुआ व्यक्ति (अमिताभ बच्चन) तब तक जिन्दा रहता है जब तक बिल्ला उसके साथ होता है. इसके अलावा 'मुकद्दर का सिकंदर' और 'once upon a time in mumbai ' के बारे में भी ये माना जाता है कि ये फिल्में भी हाजी मस्तान की जिंदगी से ही प्रभावित थीं.


डॉन और स्मगलर के साथ-साथ हाजी मस्तान एक रोमांटिक इंसान भी था. हाजी के फिल्मी दुनिया में कदम रखने की बड़ी वजह कुछ ख़ास फिल्मी नायिकाओं के प्रति उसका लगाव भी माना जाता है. 'सुपारी किलर' की अगली कड़ी में हम आपको हाजी मस्तान के प्रेम संबंधों और उसकी आलिशान लाइफ स्टाइल से रूबरू कराएंगे.

Tuesday, 10 January 2012

'अंडरवर्ल्ड' में जब उभरा ये 'नाम' तो बड़े-बड़े माफियाओं को भी करना पड़ा सलाम!


...'सुपारी किलर' एपिसोड-3

वरदराजन मुदलियार उर्फ़ 'वर्धा भाई' के चेन्नई चले जाने के बाद मुंबई अंडरवर्ल्ड की दुनिया में जो नाम डॉन का पर्याय बन गया वो था 'हाजी मस्तान'.


तमिलनाडू के पनैकुलम में 'हैदर मिर्जा'के घर 1 मार्च 1926 को एक लड़का पैदा हुआ. हैदर मिर्जा एक बेहद मेहनती किसान था लेकिन उसकी गरीबी ने उसे अपनी जमीन और अपना गांव छोड़ने को मजबूर कर दिया.



1934 में वह अपने बेटे के साथ मुंबई आ गया, इस उम्मीद में कि यहां उसे कुछ बेहतर जिंदगी दे पाएगा. कई धंधों में हाथ आजमाने के बाद भी जब उन्हें कोई रास्ता बनते न दिखा तो अंत में मुंबई के बंगाली टोला में उन्होंने साइकिल रिपेयर की एक दुकान खोल ली. इसके बावजूद उनकी रोज की कमाई 5 रूपए से ज्यादा न बढ़ सकी.


सपनों को सच करने के शॉर्टकट ने बनाया स्मगलर


गरीबी के बावजूद हैदर मिर्जा का लड़का 'मस्तान मिर्जा'क्राफोर्ड मार्केट की अपनी दुकान से अपने घर (घेट्टो बस्ती) तक जाने के रास्ते में बनी बड़ी-बड़ी इमारतों, आलिशान होटलों, लंबी-लंबी कारों और मालाबार हिल्स में बनी खूबसूरत कोठियों को निहारता रहता था. उसे उम्मीद थी कि एक न एक दिन उसके पास भी ये सब होगा.


सपनों को सच करने की 'मस्तान' की चाहत जैसे-जैसे बढ़ रही थी, वैसे-वैसे सही रास्तों पर चलने का उसका हौसला कमजोर होता जा रहा था. जा रहे बचपन और आ रही जवानी की दहलीज पर खड़ा 'मस्तान मिर्जा' किसी भी तरह अपनी गरीबी से छुटकारा चाहता था.


कशमकश के इसी दौर में उसे पता चला कि ब्रिटेन से आने वाले सामान को अगर कस्टम ड्यूटी से बचा लिया जाए (या कस्टम टैक्स दिए बिना सामान पार कर दिया जाए) तो उस पर बड़ा मुनाफा कमाया जा सकता है.


उस दौरान फिलिप्स के ट्रांजिस्टर और ब्रांडेड घड़ियों का बेहद क्रेज था. माल चुराने की फिराक में उसकी मुलाकात 'शेख मुहम्मद अली ग़ालिब'नामक व्यक्ति से हुई. जबकि 'ग़ालिब'को भी ऐसे ही एक मजबूर लेकिन होशियार लड़के की तलाश थी.


गलत रास्ते पर बढ़े एक कदम ने खोल दिए हजारों रास्ते


आजादी के तुरंत बाद जब देश में स्मग्लिंग की शुरुवात हो रही थी तब यह बेहद छोटे पैमाने पर होता था. उस वक्त कुछ घड़ियां, सोने के बिस्कुट और एकाध ट्रांजिस्टर सामान के साथ या शरीर में छुपा कर लाना ही स्मग्लिंग कहलाता था.


ग़ालिब ने मस्तान को ये लालच दिया कि अगर वह कुली बन जाए तो अपने कपड़ों और झोले में वो इस तरह के सामान चुरा कर आसानी से बिना कस्टम ड्यूटी के बाहर ला सकता है. इसके बदले में शेख ने उसे अच्छा इनाम भी दिया.


ये धंधा अभी तेजी पकड़ने ही वाला था कि 50 के दशक में दो बड़े बदलाव हुए जिन्हने 'मस्तान मिर्जा' को बड़ा खिलाड़ी बनने में मदद दी. 1950 में 'मोरारजी देसाई' मुंबई प्रेसिडेंसी के मुख्यमंत्री बने और उन्होंने शराब के व्यापार पर प्रतिबन्ध लगा दिया.


जिसका नतीजा हुआ कि स्मगलर्स को इन चीजों की तस्करी का भी मौका मिला, जिसमे काफी मुनाफा था. दूसरी घटना थी 1956 में मस्तान की मुलाकात गुजरात के सबसे बड़े स्मगलर 'सुकूर नारायण बखिया'से होना.


समंदर की लहरों ने फिर बनाया एक 'डॉन'


'बखिया'समुद्र के रास्ते आने वाले सामान की स्मग्लिंग करता था. उसने मस्तान मिर्जा के सामने शर्त रखी कि अगर वो मुंबई में आने वाले उसके सामान को बाहर लाने में उसकी मदद करे तो वो भी 'दमन पोर्ट' पर आने वाले मिर्जा के सामान की सुरक्षित निकासी करा सकता है.


इस धंधे से मस्तान मिर्जा ने काफी पैसे बनाए. लेकिन आपातकाल के दौरान की गई कड़ाई ने न सिर्फ इस धंधे को बड़ा नुकसान पहुँचाया बल्कि, मस्तान मिर्जा पुलिस की गिरफ्त में आ गया.


इस तरह के धंधे में लगे लोगों के लिए जेल जाना आम बात होती है, लेकिन मस्तान मिर्जा का जेल जाना उसकी जिंदगी का एक ऐसा पड़ाव बना जिसने उसकी जिंदगी को हमेशा के लिए बदल कर रख दिया...


जेल में 18 महीने रहने के बाद जब मस्तान बाहर निकला, तो अब वह केवल मस्तान मिर्जा नहीं रहा बल्कि, 'हाजी मस्तान'बन चुक था. नाम के साथ अब उसकी जिंदगी के सपने और मंजिलें भी बदल चुकीं थीं....'सुपारी किलर' की अगली कड़ी में हम आपको रुबरु कराएंगे 'हाजी मस्तान' से.


अंडरवर्ल्ड की दुनिया के ऐसे ही दिलचस्प और अनछुए पहलुओं को जानने के लिए क्लिक करें

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हिंदुस्तान के पहले डॉन की सच्चाई उसकी पत्नी की जुबानी


...'सुपारी किलर' एपिसोड-2

...'सुपारी किलर' की पिछली कड़ी में आपने पढ़ा कि कैसे वरदराजन मुदलियार ने मुंबई की काली दुनिया (अंडरवर्ल्ड) पर अपना शिकंजा कसा लेकिन उसके दबदबे को पुलिस से लेकर उसके बाकी दुश्मनों ने ख़त्म करने की कोशिश की. मजबूर होकर वर्धा भाई को मुंबई छोड़ना पड़ा और उसकी जगह जो नाम तेजी से अंडरवर्ल्ड की दुनिया में छा गया वो था 'हाजी मस्तान'.


साइकिल रिपेयर की दुकान चलाने वाले से मुंबई के डॉन बनने की उसकी कहानी ने सिर्फ आम लोगों को प्रभावित किया बल्कि, फ़िल्मी दुनिया ने भी इस नाम और उसके काम को लोकप्रियता दिलाई. कहते हैं हाजी मस्तान के फ़िल्मी दुनिया से लेकर राजनीति के धुरंधरों से भी ताल्लुकात थे.



हाजी मस्तान पर बनने वाली पहली फिल्म 'दीवार' थी जिसमे अमिताभ बच्चन और शशि कपूर ने मुख्य भूमिका अदा की. इसके अलावा 'मुकद्दर का सिकंदर' और 'once upon a time in mumbai' जैसी फिल्मो ने भी लोगों में इस डॉन के प्रति दिलचस्पी पैदा की.



इस कड़ी में हम आपको एक ऐसा वीडियो दिखा रहे हैं जिसमे हाजी मस्तान की पत्नी अपनी व्यथा सुना रही है. गौरतलब है कि हाजी मस्तान ही वह शख्स था जिसके लिए शायद सबसे पहले 'डॉन' शब्द का इस्तेमाल हुआ. उसके लिए इस शब्द को गढ़ने में फ़िल्मी दुनिया का भी कहीं न कहीं बड़ा हाथ है.


'सुपारी किलर'की अगली कड़ी में हम आपको न सिर्फ हाजी मस्तान के फ़िल्मी दुनिया से रिश्तों की कहानी कहेंगे बल्कि इस सच्चाई से भी रुबरू कराएंगे कि कैसे इस 'डॉन' ने राजनीति में अपने कदम रखे और कौन बना उसका राजनितिक गुरु...

इस शख्स ने रखा था मुंबई में अंडरवर्ल्ड की नींव का पहला पत्थर...


...'सुपारी किलर' एपिसोड-1


नया भारत या कहें आजाद भारत जब अपने पैरों पर खड़े होने की कोशिश कर रहा था, लगभग उसी वक्त देश के युवाओं के लिए एक शहर उनके सपनो में अपनी जड़े जमा रहा था. इस शहर में पसरा समंदर हर नौजवान को जैसे ये यकीन दिला रहा था कि उसकी किस्मत पर कितना भी बड़ा ताला क्यों न लगा हो, इस महासागर की गहराई में उसे खोलने वाली हर चाबी मौजूद है. किसी भी सपने को सच कर दिखाने की इसी जादूगरी ने ही शायद इस शहर मुंबई को 'मायानगरी' का तमगा दिला दिया.



'अयूब लाला' था पहला बड़ा गैम्बलर






मुंबई अपनी रंगीनियत और चकाचौंध से लेकर अपने दामन में समेटे काले धंधों (अंडरवर्ल्ड) की वजह से भी मशहूर (या शायद बदनाम भी) होती जा रही थी. माना जाता है कि इस शहर में संगठित अपराध की शुरुआत गैम्बलिंग और नशीले पदार्थों की तस्करी से हुई जिसमे पहला बड़ा नाम पठान अयूब खान पठान उर्फ़ 'अयूब लाला'का था. कहते हैं अफगानिस्तान से आकर मुंबई में बसे लगभग 13000 अफगानियों के एक संगठन 'पख्तून जिरगा-ए-हिंद' का संस्थापक प्रमुख भी अयूब लाला ही था.



मुंबई में चलने वाले तमाम गैम्बलिंग क्लब जिसे यहां के मारवाड़ी, मराठी या मुसलमान चलाते थे, उन सब पर अयूब लाला का नियंत्रण था. अयूब भले ही माफिया के तौर पर बदनाम था, लेकिन उसके बारे में एक दिलचस्प बात कही जाती है कि उसने कभी किसी को एक तमाचा भी नहीं मारा. अपने बेटे कश्मीरी लाला की हत्या के बाद उसने मुंबई छोड़ने का फैसला कर लिया और 40 के दशक में अपना सारा कारोबार करीम लाला को सौंप दिया जो डोंगरी (साउथ मुंबई) में शराब का व्यापार करता था.



'वर्धाभाई' ने चलाई थी अंडरवर्ल्ड के दुनिया की पहली हुकूमत!






मुंबई (उस वक्त के बम्बई) में भले ही संगठित अपराध की शुरुआत हो चुकी थी, लेकिन इस दुनिया के बेताज बादशाह के तौर पर जिस एक नाम ने आने वाले लगभग दो दशकों तक (1960-80) राज किया वो नाम था 'वरदराजन मुदलियार' का. मुदलियार के समय में ही करीम लाला और हाजी मस्तान भी मुंबई में सक्रीय थे लेकिन, इन तीनों में मुदलियार की पहचान गरीबों के बीच एक मसीहा की बन चुकी थी. वरदराजन की अपनी एक समानान्तर न्याय-व्यवस्था चलती थी जिसमे वह अपने लोगों के लिए फैसले करता था.



'वर्धाभाई' के नाम मशहूर वरदराजन मुदलियार पैदा भले ही तमिलनाडु के 'तूतीकोरिन' (1926) में हुआ था, लेकिन उसने रोजी-रोटी की शुरुआत बम्बई के विक्टोरिया टर्मिनल स्टेशन से एक कुली के तौर पर की. जल्दी ही उसने जुएखोरी और नशीले पदार्थों की तस्करी के धंधे में अपने कदम रखे. यहां उसका दबदबा तेजी से बढ़ने लगा और जल्द ही उसने गोदी में चोरी (डॉक थेफ्ट), कान्ट्रैक्ट कीलिंग, और स्मग्लिंग का काम भी शुरू कर दिया.






एक पुलिसवाले ने हिला कर रख दी थी इस माफिया की सत्ता






80 के दशक में वह मुंबई की काली दुनिया (अंडरवर्ल्ड ) का सबसे बड़ा नाम बन चुका था. अपने इलाके (माटुंगा) में हर साल वह बड़े ही भव्य तरीके से गणेश पूजा का आयोजन भी करवाता था. लेकिन इसी समय मुंबई पुलिस के एक अधिकारी 'वाई सी पवार' ने मुदलियार को अपना टार्गेट बनाया और एक-एक कर उसके सभी गुर्गों को या तो मार गिराया या जेल में डाल दिया. अपनी जमीन खिसकती देख मुदलियार ने मुंबई छोड़ने का फैसला कर लिया. यहां से निकल कर उसने चेन्नई में शरण ली जहां 62 साल की उम्र (1988) में उसकी मौत हो गई.






कहते हैं उसने अपने अंतिम समय में 'बड़ा राजन' नाम से मशहूर गैंगेस्टर 'राजन नायर' से मदद मांगी. मुदलियार के जाने से अंडरवर्ल्ड की दुनिया के सरताज की जगह खाली हो गई थी जिसपर जल्द ही हाजी मस्तान ने कब्ज़ा जमा लिया.



वरदराजन की जिंदगी उसके मौत के बाद तब और भी दिलचस्प बन गई जब दक्षिण के मशहूर फिल्म निर्देशक मणिरत्नम ने उसपर 'नायकम' नाम से फिल्म बनाई जिसमें कमल हासन ने मुख्य भूमिका अदा की. फिरोज खान ने 1988 में इसी पात्र को ध्यान में रखते हुए 'दयावान' का निर्माण किया.






'सुपारी किलर' की अगली श्रृंखला में जानिए कैसे हाजी मस्तान बना अंडरवर्ल्ड का पहला डॉन और किसने ख़त्म किया उसका साम्राज्य...

Monday, 28 November 2011

प्रतिद्वंदिता,पत्रकारिता, हत्या, जेल कहीं ये किसी बड़े खतरे का संकेत तो नहीं?


गत 11 जून 2011 को मुंबई में अंग्रेजी अखबार में काम करने वाले एक वरिष्ठ पत्रकार ज्योतिर्मय डे (जे डे) की दिनदहाड़े गोली मारकर हत्या कर दी गई. जांच में पता चला कि इस हत्या को छोटा राजन के गुर्गों ने अंजाम दिया है क्योंकि राजन लगातार अपने खिलाफ लिखे जाने की वजह से जे डे से नाराज था.

जांच और आगे बढ़ी तो पता चला कि छोटा राजन के गुर्गों को जे डे की टाइमिंग और लोकेशन बताने में मुंबई की ही एक महिला पत्रकार का हाथ था. एशियन एज के लिए काम करने वाली 37 वर्षीय पत्रकार थी 'जिगना वोरा'. पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया है.

अभी तक जो तथ्य सामने आये हैं उनसे पता चला है कि जिगना वोरा और जे डे दोनों ही क्राइम बीट पर काम करते थे और कमोबेश ख़बरों के लिए दोनों ही अंडरवर्ल्ड के लोगों से लेकर पुलिस के लोगों तक अपनी पहचान रखते थे. इन्हीं सूत्रों में एक नाम था फरीद तानशा जिसे छोटा राजन का आदमी माना जाता था. हालाँकि जून 2010 में उसकी भी हत्या हो गई.

ऐसा माना जाता है कि तानशा के घर पर ही इन दोनों का आमना-सामना हुआ और अपने सूत्रों के इस्तेमाल को लेकर दोनों में काफी कहासुनी हुई. तभी से जिगना ने छोटा राजन को जे डे के खिलाफ भरना या भड़काना शुरू कर दिया. जे डे की ख़बरों और जिगना के फीडबैक से छोटा राजन का दिमाग घुमा और गुस्से में उसने जे डे को ख़त्म करने का फरमान जारी कर दिया.

हालाँकि हत्या के बाद मीडिया में ये खबरे आईं कि छोटा राजन ने माना है कि जे डे की हत्या कराना गलत था और एक पत्रकार के तौर पर वह जो कुछ भी लिख रहा था वो उसकी ड्यूटी थी न कि राजन से कोई व्यक्तिगत खुन्नस.

एक्सक्लूसीव और ब्रेकिंग न्यूज लेने कि जल्दबाजी और रातोरात बड़ा पत्रकार बन जाने की चाहत ने एक गंभीर और वरिष्ठ पत्रकार की जान ले ली और एक दूसरे वरिष्ठ और गंभीर पत्रकार को अपराधी बना सलाखों के पीछे पहुंचा दिया.

खुद मै भी इसी पेशे से जुड़ा हूँ. कॅरियर के पहले दिन से ही मैंने अपने आस-पास ख़बरों के लिए लोगों को आपस में लड़ने-झगड़ने से लेकर फब्तियां कसते, बुराई करते, नीचा दिखाने के मौके तलाशते देखा. शुरू में लगा कि शायद इसे ही पेशेवर और प्रतियोगी माहौल (professional and competetive enviroment) कहते हैं.

न जाने क्यों मुझे ऐसा लगता है कि इस पेशेवराना और प्रतियोगी माहौल को निर्मित करने वाली शक्तियों और उनके मकसद को स्पष्ट किया जाना चाहिए. अन्यथा बिना गोली चले भी कई प्रतिभाशाली लोगों का कत्ल हो सकता है या शायद रोज हो ही रहा हो, क्या पता?

Friday, 25 November 2011

एक सवाल जो तीन साल बाद भी कर रहा है अपने जवाब का इंतजार...


आज से ठीक तीन साल पहले मुंबई में समुद्र के रास्ते दस आतंकी आए और पूरे शहर में आतंक का घिनौना खेल खेला. इस हमले ने अगले 60 घंटों तक पूरे देश को एक तरह से बंधक सा बना लिया. दिल्ली से लेकर देश के गांव-गांव तक लोग यही सोच रहे थी कि आखिर इस खूनी खेल का अंत क्या होगा?



29 नवम्बर की सुबह जब एन एस जी कमांडो ताज होटल से बाहर निकले तब जाकर पूरे देश को इस बात का यकीन हो सका कि 164 निर्दोष लोगों को मौत कि नींद सुला चुके दस में से नौ आतंकी मारे जा चुके हैं और एक को गिरफ्तार कर लिया गया है.



हमले के बाद सारे देश की निगाह दोषी या जिम्मेदारी तय करने के सरकारी खेल पर थी. लोग यह जानना चाहते थे कि आखिर इतनी बड़ी मात्रा में गोले-बारूद के साथ ये आतंकी देश में घुसे कैसे? आखिर क्यूँ सिर्फ दस आतंकियों पर काबू पाने में 60 घंटे का वक्त लग गया? सुरक्षा की इतनी बड़ी नाकामी के बाद इसे दूर करने के लिए सरकार क्या कदम उठाने वाली है?



सकते में आई सरकार ने माना कि इस हमले को पाकिस्तान में बैठे कुछ आतंकी संगठनों ने अंजाम दिया है. इसके बाद दिल्ली में यह घोषणा की गई कि जब तक पकिस्तान इन आरोपियों को देश को नहीं सौंपता दोनों देशों के बीच कोई वार्ता नहीं होगी. अमेरिका से लेकर ब्रिटेन तक ने इस हमले की घोर आलोचना की और पाकिस्तान को इस मामले में भारत का सहयोग करने की हिदायत दी.



हमारी सरकार ने जिम्मेदार संगठनो से लेकर आतंकियों तक का नाम पाकिस्तान को सौंपा. इनमे से कुछ को पाकिस्तानी सरकार ने हाउस अर्रेस्ट तक किया जिनमे सबसे बड़ा नाम था जमात-उद-दावा प्रमुख हाफिज़ मुहम्मद सईद का.



कुछ ही दिनों बाद यह साबित हुआ कि पाकिस्तानी सरकार कि यह कार्यवाही सिर्फ एक दिखावा मात्र है, क्यूंकि लाहौर कोर्ट के आदेश पर सरकार ने सईद को आजाद कर दिया है और भारतीय सरकार पर आरोप मढ़ दिया कि हम उनके खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं दे पाए हैं.



हमारी सरकार ने माना कि समुद्र की सीमा पर्याप्त सुरक्षित नहीं है लेकिन आज भी इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है. न तो हमने मार्च 1993 में हुए मुंबई बम धमाकों से कोई सीख ली थी और न ही 26 /11 की घटना से. तभी तो 1993 के बाद भी 26 /11 जैसी घटना हुई और इसके बाद 13 जुलाई 2011 को मुंबई के व्यस्ततम इलाकों (झवेरी बाजार, दादर और ओपेरा हाउस में 8 मिनट में तीन बम धमाके में ३१ लगों की मौत) में फिर से वही हुआ जिसका डर था.



ज्यादा लाग-लपेट के बिना मूल बात अब भी वही है कि क्या आज भी हमारे समुद्र से लेकर हवाई रास्ते या सीमाएं इतनी सुरक्षित है कि हम बिना भय दिल्ली के चावड़ी बाजार से लेकर मुंबई की झवेरी बाजार या वाराणसी के घाटों पर निश्चिन्त होकर घूम सकते हैं?

Tuesday, 15 November 2011

इम्तियाज़ अली की गंभीरता और फेसबुकिया गपशप


प्रीव्यू, रिव्यू और फेसबुक पर लोगों के कमेंट पढ़ने के बाद मैंने ये फिल्म देखी. फिल्म की स्क्रिप्ट से लेकर सिनेमेटोग्राफी और म्यूजिक पर सैकड़ों आर्टिकल तो आपको इंटरनेट पर ही पढ़ने को मिल जाएंगे और वो भी उन लोगों के जिनका नाम उनके किसी भी काम पर भारी पड़ता है.

हालांकि उनमे से किसी एक का भी नाम मुझे याद नहीं है, नहीं तो मै यहां पर लिखता जरुर. कम से कम आपको ये एहसास दिलाने की पूरी कोशिश करता कि मै भले ही इनके जैसा ब्रांड नहीं बन सका हूँ लेकिन इन्हें जानता और पढता जरुर हूँ. शायद इससे आपको मेरे 'टेस्ट' और मेरी 'क्लास' का अंदाजा लग जाता. खैर, इतना पढ़ने के बाद आप मेरा क्लास तो समझ ही गए होंगे.

सो, अगर आप मेरे क्लास से मैच करते हैं तभी आगे बढें वरना, इससे पहले कि आप पूरा पढ़ने के बाद फेसबुक पर मेरे मित्रों जैसा कमेंट करें और वहां से मुझे पता चले कि मै 'क्लासलेस' हूँ. प्लीज आप मुझे यहीं छोड़ दें!

अगर अभी भी आप पढ़ रहे हैं तो जाहिर है कि आपकी क्लास भी मुझ से ज्यादा बेहतर नहीं है. तो फिर 'क्लासमेट' से क्या शर्माना, जो भी कहना है खुल कर कहता हूँ...

'रॉकस्टार' फिल्म देखते हुए मुझे लगा कि आज के जमाने में अगर आपको कोई गंभीर बात कहनी है तो जितना हो सके उसमे कॉमेडी घुसाओ. तब हो सकता है कि लोग तुम्हारी बात सुन लें, वरना, अगर गंभीर बात को तुमने गंभीरता से कहा तो पक्का समझो कि सामने नहीं तो पीछे मुड़ते ही लोग तुमपर कस कर हंसने वाले हैं.

खासकर के किसी 'इंटैलिजेंट टाइप' के आदमी के सामने तो कभी भी कोई बात गंभीरता से कहना ही मत. क्योंकि गंभीरता यानि seriousness एक class होता है और क्लास सिर्फ इंटैलिजेंट टाइप के लोगों में होता है. हम जैसे फर्जी ब्लॉगरों या फेसबुकियों में नहीं.

और सही भी है भाई. जब तक तुम किसी बड़े अखबार या मैग्जीन में नहीं छपे तब तक कोई भला कैसे मान ले कि तुम भी कोई गंभीर बात कर सकते हो? और ऐसा भी नहीं है कि तुम किसी बड़ी हस्ती से ताल्लुक रखते हो या उनके खानदान से हो. अगर ऐसा होता तो जेनेटिक तौर (वंशानुगत आधार ) पर हममे गंभीरता का तत्व हो सकता था. लेकिन चूंकि, हमारे में इनमे से कोई लक्षण विद्यमान नहीं है सो, एक बात तो पक्की है कि हममे गंभीरता नामक कोई रोग नहीं है.

सो, इस फिल्म (रॉकस्टार) पर हम कोई गंभीर टिप्पणी करें और फेसबुक पर ही हमें क्लासलेस होने का अवार्ड मिल जाए इतना बड़ा सदमा सहकर 'रांझा'(फिल्म की नायिका) की तरह हम 'कोमा' में जाने का रिस्क नहीं उठा सकते. क्योंकि रांझा तो बड़े घर वाली थी और वो भी प्राग जैसे विदेश में थी, तो उसके घर वलों ने तो उसे किसी हाई-फाई अस्पताल के आईसीयू में भर्ती करा दिया. लेकिन अगर हमें आईसीयू में जाना पड़ा तो आपको तो पता ही है कि अपनी क्लास के मुताबिक हमें किसी सरकारी अस्पताल का आईसीयू ही नसीब होगा. जहाँ ज्यादातर मरीज या तो लावारिस होते हैं या ऐसे जिनके घर वालों के पास इतने पैसे भी नहीं होते कि फ्री में मिली दवा से पहले मरीज को ढंग का नाश्ता भी करा सकें.

चूंकि मेरा पाला ऐसे अस्पतालों से पड़ा है तो एक राज की बात और बताता चलूं कि इन अस्पतालों में डॉक्टर मरीज को बचाने की जगह इस फिराक में ज्यादा रहते हैं कि वो जल्दी से मरे. क्योंकि उन्हें पता होता है कि इस हालत के बाद अगर वो बच गया तो उसकी जिंदगी मौत से भी ज्यादा बदतर हो जाएगी.

सो, इम्तियाज अली साहब इस फिल्म के जरिए शायद कोई गंभीर बात कहना चाहते थे. इसीलिए उन्होंने फिल्म की शुरुआत कॉमेडी से की है. शायद उनका इरादा अपने दोनों तीर निशाने पर बिठाने का था. एक तो इंटैलिजेंट टाइप के लोगों को बुरा भी न लगे और दूसरा हमारे जैसे क्लासलेस टाइप के लोगों का मनोरंजन भी हो जाए.

इंटरवल के पहले तक मुझे ये बात समझ में नहीं आई कि इसके बावजूद इंटैलिजेंट टाइप के लोगों ने फिल्म को 'गा...' क्यों दी है और उसे फेसबुक पर जाहिर भी कर दिया है?

दरअसल, उनके गुस्से की वजह फिल्म का अगला हिस्सा है जहां पर इम्तियाज साहब ने गलती की है. उन्होंने आगे की बात को बेहद गंभीरता से कह दिया है. क्योंकि जब तक झाला भाई (कॉलेज कैंटीन का मालिक) जे जे को यह समझाते हैं कि बड़ा कलाकार बनने के लिए 'पेन' का होना जरुरी है तब तक तो बात सही लगती है लेकिन, जब पेन की वजह से जे जे जैसा क्लासलेस आदमी 'जॉर्डन' जैसा रॉकस्टार बनने लगता है तो इंटैलिजेंट टाइप के लोगों को गुस्सा आना और उसे फेसबुक पर जाहिर करना लाजिमी हो जाता है.

यानि आप लोगों को ये दिखाकर बरगलाना चाह रहे हैं कि प्यार में इतनी ताकत होती है कि जे जे जैसा ठेठ जाट भी जॉर्डन बन सकता है? बात अगर यहीं खत्म हो जाती तो भी ठीक था. अली साहब ने बात को और गंभीर बना दिया, और दिखा दिया कि इतना नाम,पैसा कमाने के बाद भी जे जे जैसा आदमी पगलाता नहीं है. बल्कि, अभी भी उसे उस प्यार की तलाश है जो जॉर्डन बनने के पहले उसे घर वालों से या रांझा से मिलता था.

भाई ये मामला तो साहब, गजब का गंभीर है. इस गजब की गंभीर बात को इम्तियाज साहब ने गंभीरता से कहने की भूल की है. शायद कहानी लिखने के चक्कर में वो इतने मशगूल हो गए कि ये बात भूल ही गए कि इस देश में इंटैलिजेंट टाइप के लोग भी हिंदी फिल्मे देखते हैं.

लेकिन इस फिल्म को देखने के बाद मुझे जे जे का कैरेक्टर और गुलाम अली की एक गज़ल दोनों एक साथ याद आ रहे हैं जिसे मै नीचे लिख रहा हूँ...

यही आगाज था मेरा, यही अंजाम होना था,
मुझे बर्बाद होना था, मुझे नाकाम होना था,
मुझे तक़दीर ने तक़दीर का मारा बना डाला,
चमकते चाँद को टूटा हुआ तारा बना डाला,
मेरी आवारगी ने मुझको आवारा बना डाला.

(मैंने आज ही 'रॉकस्टार' फिल्म देखी है)

बहरहाल, मैंने ये फैसला किया है कि जल्द ही इस फिल्म को दोबारा देखूंगा. लेकिन मै अपने किसी भी जानने वाले को इस फिल्म को न देखने की सलाह दूंगा. क्योंकि इम्तियाज साहब ने फिल्म में गंभीरता कुछ ज्यादा ही उड़ेल दी है.