Wednesday, 29 August 2018

कुछ-कुछ बदलने लगी वो

पिछले दो दिन से जय को न जाने क्यों ये लग रहा था कि नेहा किसी बात पर उससे नाराज है। कहने को वो दोनों रोज वैसे ही मिल रहे थे जैसे मिलते थे लेकिन, अचानक कुछ बदल सा गया था दोनों के बीच। जय इस बात को लेकर बेचैन था लेकिन, नेहा को जैसे कोई फर्क ही नहीं पड़ता था इन बातों का। किसी बात पर ओवर-एक्साइटेड हो जाना या बहुत खुश हो जाने की नेहा की आदत बहुत आम है जिसे उसके साथ काम करने वाले सभी जानते हैं। लेकिन, कौन सी बात उसे बुरी लगी या किस बात पर वो हर्ट हुई है, इसे समझना बहुत मुश्किल था।
इतने दिनों से साथ रहते-रहते जय उसकी इस आदत को थोड़ा-थोड़ा समझने लगा था। लोग भले ही कहें कि लड़कियों के नखरे बहुत होते हैं लेकिन, नेहा में नखरे जैसी कोई बात नहीं थी। अगर उसे कोई बात बुरी लगती तो रिऐक्ट करने की जगह वो उसे ऐसे इग्नोर कर देती जैसे उसने कुछ सुना ही नहीं। जबकि, नेहा के उलट जय किस बात पर खुश है ये जानना मुश्किल होता। हाँ, कुछ भी बुरा लगने पर वो इतना आग-बबूला हो जाता कि फिर उसे ब्रह्मा भी नहीं संभाल सकते। नेहा ने कई बार उसे समझाया भी कि इतना टेंशन क्यों लेते हो। वो मजाक में जय से ये भी कहती कि टेंशन लेने से बाल जल्दी सफ़ेद हो जाते हैं और मोटापा भी बढ़ता है क्योंकि, जय इन दोनों समस्याओं से परेशान था।
हालांकि, नेहा की संगत का असर जय पर दिखने लगा था। अब वो अपने गुस्से पर काबू करना या उसे इग्नोर करना सीखने लगा था। उसे ये बात बुरी लगती कि नेहा किसी बात पर नाराज नहीं होती लेकिन, वो छोटी-छोटी बातों पर बच्चों की तरह मुंह फुला लेता है। लेकिन इस दौरान अजीब बात ये हुई कि पिछले कुछ दिनों से नेहा का स्वभाव बदलने लगा था। अक्सर वो जय को किसी न किसी बात पर डांट देती या उसे चुप करा देती। इसका असर ये हुआ कि अब जय कुछ भी बोलने से पहले ये जरूर सोचता कि कहीं ये बात उसे बुरी न लग जाए। पता नहीं क्यों, लेकिन अब वो नेहा से थोड़ा-थोड़ा डरने लगा था।
इसलिए आज दोपहर में जब दोनों चाय पी रहे थे तो जय ने पहले नेहा को टटोलने की कोशिश की कि कहीं वो नाराज तो नहीं है। इत्मीनान होने के बाद उसने कहा- पता है इंसान के साथ दिक्कत क्या है? वो हर जगह अपना दिमाग लगा देता है। लोगों को ये गलतफहमी रहती है कि गाड़ी में हैंडल या स्टेयरिंग ही सबसे जरूरी होती है क्योंकि, वही तय करती है कि गाड़ी किस दिशा में जाएगी जबकि, इंजन के बिना गाड़ी के किसी पार्ट का कोई महत्व नहीं है। ठीक वैसे ही जैसे दिमाग के बिना तो शरीर जिंदा रह जाता है लेकिन, दिल के बंद होते ही इंसान को मरा हुआ घोषित कर दिया जाता है। अच्छा तुम बताओ, जब शरीर का इंजन (दिल) चलेगा ही नहीं तो हम दिशा देंगे किसे? लेकिन लोग न जानें क्यों कुछ अच्छा होने पर दिमाग की दाद देते हैं और बुरा होते ही इंसान को जज़्बाती कह दिया जाता है।
नेहा ने जय की इस बात का जवाब देने की बजाए पलट कर उससे सवाल कर दिया- तुम कहना क्या चाहते हो? सीधा-सीधा क्यों नहीं कहते, इतना घुमाते क्यों हो बात को?
जय- मैं कहां घुमा रहा हूँ। तुम्हीं कल से मुझे घुमाए जा रही हो। मैंने तुमसे कहा है कि दिमाग वहां लगाया करो जहां लगाना चाहिए। लेकिन तुम्हें तो ये दिखाना है कि तुम्हारे पास किसी से कम दिमाग थोड़े ही है।
ये सुनते ही नेहा के चेहरे पर तनाव पसर गया। उसने खीजते हुए कहा- देखो, मुझे नहीं पता तुम क्या सोचते हो लेकिन, तुम्हे कोई कहानी नहीं मिली तो उसके लिए मैं क्या करूँ। मुझे जो समझ में आया मैंने वो कहा... क्या कोई जबरदस्ती है कि मैं वही कहूं जो तुम्हें अच्छा लगे या तुम्हारे काम का हो। मैं इंसान हूँ, कोई मशीन नहीं।
नेहा की आवाज में आए इस तीखेपन को जय ने भांप लिया। वो समझ गया कि दिल और दिमाग वाली बात नेहा को बुरी लगी है। इससे पहले कि जय बात को संभालता नेहा ने इशारा कर दिया कि वो बातचीत को और आगे नहीं बढ़ाना चाहती। उसने जय से बोला- मैं निकल रही हूँ, मुझे कुछ काम है इसलिए जल्दी जाना होगा।
इतना कहते हुए वो सीढ़ियों की ओर बढ़ी और तेजी से नीचे उतर गई। जय कुछ देर तक वहीं खड़ा रहा, उसने जेब से सिगरेट निकाली, सुलगाया और कुछ सोचने लगा...

लड़कों को ये सब कहां झेलनी पड़ता है

जय- तुम्हे रोज-रोज एक ही काम करते हुए ऊब नहीं होती?
नेहा- होती तो है पर क्या करूं।
जय- कभी सोचती नहीं कि इससे छुटकारा मिलना चाहिए?
नेहा- सोचने से थोड़े ही छुटकारा मिल जाता है।
जय- फिर...
नेहा- असल में तुंम्हारे पास तो और कोई काम है नहीं। ऑफिस से फ्री होने का बाद भी तुम इन्हीं बातों में उलझे रहते हो, क्योंकि तुम्हे घर, बीवी-बच्चे या किसी और काम का टेंशन लेना नहीं पड़ता।
तुम्हे पता है यहां से निकलने के बाद मैं घर भले ही पहुंच जाऊं लेकिन, ग्यारह बजे रात के पहले अपने कमरे में नहीं जा पाती। तो फिर ये ऊल-जलूल सोचोगे कब? बड़ी मुश्किल से पांच-छह घंटे की नींद मिल पाती है, आंख खुलते ही ऑफिस जाने का टेंशन। लड़कों को ये सब परेशानी कहां झेलनी पड़ती है।
तुम्हे क्या है? रूम पर पहुंचे, खाना ऑर्डर किया और पसर गए। फिर तुम चाहे रोज एक कहानी लिखो, दो मैग्जीन पढ़ो, यू-ट्यूब पर गुलज़ार का इंटरव्यू सुनो या ग़ालिब के शेर पढ़ो। तुम्हें तो कोई बोलने या रोकने वाला है नहीं?
यहां तो ऑफिस से जाने के बाद भी अगर कुछ पढ़ने की कोशिश करो तो लगता है पता नहीं कौन सा गुनाह कर रहे हैं? आपके सामने आपसे बड़ा काम करे और आप बैठ कर किताब पढ़ो ये भी तो अच्छा नहीं लगता।
जय- हां, बात तो तुम्हारी सही है। अच्छा तुम्हें ये क्यों लगता है कि मेरे पास फैमिली नहीं है इसलिए मुझे काम से ऊबने का खयाल आता है? या मैं कुछ नया करने की सोचता हूं।
नेहा- हां, क्योंकि अगर फैमिली होती तो इतना वक्त ही नहीं मिलता तुम्हें कि ये सब तुम सोच पाते?
जय- तो क्या तुम ये कहना चाहती हो कि फैमिली में उलझे रहना ही ठीक है। ताकि करियर, प्रोफेशन, इनोवेशन इन सब के लिए कोई जगह ही न बचे जीवन में? यानी जो लोग इन चीजों में अपना समय लगाते हैं वो बेकार लोग होते हैं?
नेहा- लेकिन ऊबने से क्या होगा? मैं ऊब के नौकरी छोड़ दूं और घर बैठ जाऊं। मुझे वक़्त बर्बाद करना बिल्कुल पसंद नहीं है। और घर पर बैठने से क्या होगा? दिन भर वही सब... घर साफ करो, चाय बनाओ, मेहमान आएं तो उनकी आवभगत करो... बस।
छोड़ने से पहले कुछ करने का प्लान भी तो होना चाहिए। जिनके पास कोई प्लान होता है वो उलझते या सोचते नहीं, बल्कि छोड़ देते हैं। न ही इस तरह की बहस में अपना टाइम खराब करते हैं।
जय- लेकिन प्लान, आइडिया या कोई नया रास्ता आसमान से तो टपकता नहीं। जिन्हें मिलता होगा वो भी तो इसी तरह की उलझन से गुजरते होंगे और इससे निकलने के रास्ते के बारे में इस हद तक सोचते और करते होंगे कि उन्हें कुछ न कुछ मिल ही जाता होगा। कहा भी तो जाता है कि खोजने से तो भगवान भी मिल जाते हैं।
नेहा- हां, शायद तुम ठीक कह रहे हो। मुझे भी पहली नौकरी ऐसे ही मिली थी। मेरी पढ़ाई खत्म हो गई थी और घर वालों ने साफ कह दिया था कि अगर नौकरी नहीं मिल रही है तो घर वापस आ जाओ। यहीं रह कर नौकरी ढूंढना, ऐसा नहीं है कि यहां नौकरी नहीं मिलेगी। लेकिन मैं घर वापस नहीं जाना चाहती थी, इसलिए नौकरी पाने के लिए मैंने अपनी ताकत लगा दी और मुझे नौकरी मिल ही गई दिल्ली में।

'मैं किसी के सामने हाथ नहीं फैला सकती'

जय - अच्छा तुमने ये फैसला क्यों लिया कि तुम्हें दिल्ली में ही पढ़ाई करनी है। जो पढ़ाई तुम यहां कर रही थी उसे तो तुम अपने शहर में रहकर भी कर सकती थी।

नेहा - क्या करती, करना तो मैं एमबीए चाहती थी लेकिन, उस साल यूपीटीयू के किसी कॉलेज में मुझे एडमिशन नहीं मिला और घर वाले शादी का प्रेशर बढ़ाते जा रहे थे।
मैंने सोच रखा था कि ये चाहे जितना प्रेशर डालें जब तक मैं नौकरी नहीं कर लेती शादी नहीं करूंगी, लेकिन अब तो एमबीए होने से रहा और अगर घर में खाली बैठती तो दो-चार महीने में ही घर वाले शादी करा देते।
नौकरी पाने के सपने पर भी पानी फिरने वाला था और दूसरा कोई रास्ता सूझ नहीं रहा था। मैं किसी भी तरह यहां से निकलना चाहती थी। तभी एक दिन अखबार में मुझे दिल्ली के इस इंस्टीट्यूट के बारे में पता चला। बस मैंने अप्लाई कर दिया और किस्मत से एग्जाम भी पास कर गई। जैसे ही मुझे दिल्ली जाने का रास्ता मिला मैंने ठान लिया कि यहां तो एडमिशन लेना ही है चाहे उसके लिए कुछ भी करना पड़े।

जय - तो क्या तुम्हारे घर वाले मान गए? एक छोटे शहर की लड़की को एकदम से इतने बड़े शहर में भेजने के लिए, वो भी अकेले?

नेहा - तुम्हे क्या लगता है इतना आसान था ये सब। लाख समझाने के बाद भी पापा ने साफ मना कर दिया। आखिर में मैंने ही उनसे कहा कि मैं अकेली नहीं रहूंगी। मामा तो दिल्ली में रहते ही हैं उन्हीं के यहां रह लूंगी। फिर भी पापा तैयार नहीं थे लेकिन, मम्मी ने उन्हें किसी तरह समझाया।

जय - फिर...

नेहा - फिर क्या... मुझे तो पता ही था कि ये कोर्स करके छोटी-मोटी नौकरी पाना मेरा मकसद नहीं है। मुझे लगा कि इस पढ़ाई से मेरी राइटिंग स्किल कुछ ठीक हो जाएगी और दिल्ली में रहकर सिविल सर्विस की तैयारी करने का रास्ता भी खुल जाएगा।
लेकिन एडमिशन लेने के बाद एक नया ही लोचा सामने आया। पता चला कि जिस कॉलेज में एडमिशन लिया है वो तो हमारे स्कूल से भी गया-गुजरा है। सुबह एक बार कैंपस में घुसे तो शाम के पहले बाहर निकलना असंभव।
क्लास भी मिस नहीं कर सकते थे, क्योंकि एग्जाम में बैठने के लिए 75% अटेंडेंस जरूरी थी। सिविल की तैयारी वाले प्लान पर खतरा दिखने लगा। फिर भी मैंने तय किया कि शाम के वक्त सिविल की कोचिंग ज्वाइन कर लूंगी तो दोनों मैनेज हो जाएगा, लेकिन...

जय - लेकिन क्या...

नेहा - तुम तो जानते ही हो, किसी दूसरे के घर की लड़की को अपने घर में रखने में लोग कितना डरते हैं, चाहे वो कितने भी क्लोज रिलेशन में क्यों न हों। मेरे साथ भी वही हुआ।
यहां आते ही रोज-रोज ताने सुनने का सिलसिला शुरु हो गया। इसके बावजूद सुबह तो मैं किसी तरह कॉलेज पहुंच जाती लेकिन, सिविल की कोचिंग शाम को ही हो सकती थी। अब रोज वहां लाता ले जाता कौन? अकेले जाने की परमिशन मिलने से रही। सो, धरा रहा गया सबकुछ...

जय - लेकिन, तुम नौकरी के बाद ही शादी क्यों करना चाहती थी? ये काम तो शादी के बाद भी हो सकता था?

नेहा - हां, लेकिन मैं अपनी जरूरतों के लिए किसी के सामने हाथ नहीं फैलाना चाहती थी... बस इसलिए।

मेरे सारे बेस्ट फ्रेंड मुझे छोड़ गए

नेहा - दिल्ली आने के बाद जब पहली बार मैं क्लास में गई तो मुझे कुछ अजीब सा लगा। हमारे शहर में स्कूल हो या कॉलेज क्लास में एक तरफ लड़के बैठते हैं और दूसरी तरफ लड़कियां। लेकिन यहां तो लड़के-लड़कियां एक ही सीट पर बैठ रहे थे।

जय - तो तुम्हें एडजेस्ट करने में परेशानी नहीं हुई?

नेहा - नहीं... असल में जल्द ही मुझे समझ में आ गया कि इस सिस्टम से फायदा ज्यादा है। लड़के-लड़कियों की एक-दूसरे को लेकर फैंटेसी या कहो गलतफहमी को इस माहौल में पनपने का ज्यादा मौका ही नहीं मिलता।

जय - ऐसा कैसे कह सकती हो तुम?

नेहा - हां, क्योंकि मैं खुद बहुत कुछ उल्टा-पुल्टा सोचती थी, लेकिन...

जय - लेकिन क्या...

नेहा - यही... कि सिगरेट या शराब पीने वाले लड़के अच्छे नहीं होते, ऐसे लोगों से दूर ही रहना चाहिए.... वगैरह-वगैरह। हालांकि, मैं अभी भी यही मानती हूं कि ये चीजें अच्छी नहीं होती लेकिन, धीरे-धीरे मुझे पता लगा कि ये चीजें सोशल गेदरिंग का एक बहाना भर हैं.... बस।

जय - लड़कों के बारे में और भी कोई भ्रम टूटा तुम्हारा.... यहां आने के बाद?

नेहा - बल्कि... लड़कियों के बारे में भी टूटा... (इतना कह के वो ज़ोर से हंस पड़ी)
मैंने देखा कि कुछ लड़कियों के ढेर सारे दोस्त लड़के भी थे। जब वो लड़कों के बीच होती तो बिल्कुल उनके ही स्टाइल में बात करती, सिगरेट पीती और कभी-कभी तो शराब भी। ऐसी लड़कियों के कॉन्टैक्ट्स अच्छे थे और वो बहुत कॉन्फिडेंट भी थीं।

जय - अच्छा, कॉलेज छूटने के बाद कोई ऐसी चीज है जो तुम अब भी मिस करती हो?

नेहा - हां, (उसके चेहरे पर अचानक से उदासी आ जाती है, बल्कि आंखों में थोड़ी नमी भी)... मेरे जो भी अच्छे दोस्त होते वो बाद में किसी और के बेस्ट फ्रेंड बन जाते थे। मेरी एक फ्रेंड जिसे मैं सबसे ज्यादा मानती थी वो भी किसी और की दोस्त बन गई और मुझसे दूर हो गई।

जय - ये भी तो हो सकता है कि तुम्हारे वो सारे दोस्त तो लगातार चलते रहे लेकिन, तुम रास्ते में ही कहीं रुक गई....आराम करने लगी?

नेहा ने इस बात का कोई जवाब नहीं दिया.... बस आसमान की ओर देखती रही और अचानक वहां से चली गई।

उसका बाइक पर बैठना लोगों को खटक गया

नेहा के घर से कॉलेज की दूरी इतनी थी कि उसे दो जगह बस बदलनी पड़ती थी। उस रास्ते से तमाम लड़के-लड़कियां आते-जाते थे जिनमें से एक राहुल भी था। वो बाइक से कॉलेज आता-जाता था और नेहा की ही क्लास में पढ़ता था। जल्द ही दोनों में जान-पहचान हो गई। कॉलेज छूटने के बाद नेहा बाइक पर उसके साथ ही बस स्टॉप तक जाने लगी लगी।

दोनों के बीच अच्छी बनने लगी थी। एक दिन बातों-बातों में राहुल ने नेहा से पूछा - यार आज कहीं घूमने चलें क्या? देख न मौसम कितना अच्छा हो रहा है।

पिछले एक महीने से पड़ रही जला देने वाली गर्मी के बीच आज सुबह से बादल मेहरबान थे। बारिश तो नहीं हो रही थी लेकिन, हवा में मौजूद खुशनुमा नमी बता रही थी कि आस-पास बादल जम के बरसे हैं। मौसम देखने के बाद मन तो नेहा का भी बहुत था लेकिन, वो ये बात कह नहीं पा रही थी। जैसे ही राहुल ने उसके सामने प्रस्ताव रखा वो एकदम से चहक उठी। लेकिन फिर तुरंत ही उसने खुद को संभाल लिया और अनमने मन से बोली - यार, आज तो मुझे जल्दी घर पहुंचना है। घर पर कुछ मेहमान आने वाले हैं और मम्मी अकेले परेशान हो रहीं होंगी। तुम निकल जाओ, मैं आज पैदल ही बस स्टॉप तक चली जाउंगी, मौसम भी तो अच्छा ही है अभी।

राहुल ने नेहा के चेहरे से एक ही पल में गुजरे कई भावों को देख लिया था। उसने थोड़ा गंभीर हो के पूछा - क्या कोई दिक्कत है? कम से कम अपनी परेशानी तो तुम मुझे बता ही सकती हो। हां... हो सकता है कि मैं तुम्हारी उलझन सुलझा न सकूं लेकिन, तुम्हारे दिल का बोझ तो हल्का हो ही जाएगा।

लड़कियों में न जाने ऐसी कौन सी खासियत होती है कि उनके दिमाग के अंदर और चेहरे पर दिख रहे भावों के गैप को वो इतनी तेजी और आसानी से मैनेज करती हैं कि सामने वाला बस देखता ही रह जाता है। नेहा ने खुद को संभालते हुए जवाब दिया - अरे यार, इतना सीरियस होने की कोई जरूरत नहीं है। वैसे भी फैमिली के मामले मैं बाहर वालों के साथ डिस्कस नहीं करती।

नेहा के इस जवाब ने राहुल को एक पल के लिए सकते में डाल दिया, लेकिन उसने भी खुद को तुरंत ही संभालते हुए बोला - अरे यार मुझे क्या पड़ी है तेरे फैमिली मैटर में पड़ने की, मैंने तो बस यूं ही तुझसे पूछ लिया लेकिन तू तो भाव ही खाने लगी। चल कोई नहीं, तू अपने मेहमान संभाल, मैं तो चला तफरी पर।

राहुल की ये बेरुखी नेहा को बुरी तो लगी लेकिन, असल में उसकी परेशानी की वजह दो दिन पहले बस स्टॉप पर कॉलेज की लड़कियों की वो बातचीत थी जिसे चुपके से उसने सुन लिया था।

उस दिन लड़कियां गॉसिप में ऐसी मशगूल थीं कि उन्हें नेहा के बस स्टॉप पर आने का पता ही नहीं चला। लड़कियों के झुंड में से ही किसी ने कहा - यार आजकल तो नेहा की चांदी ही चांदी है। कॉलेज से निकलते ही मैडम के लिए गेट पर ही बाइक लगी रहती है। मैडम बैठती हैं और फुर्र हो जाती हैं।

तभी दूसरी लड़की ने कहा - हां भाई, सबकी किस्मत कहां इतनी तेज होती है कि कॉलेज से निकलते ही एंटरटेनमेंट का सामान खुद चलकर आए और आपकी हर सेवा करे।

इतना सुनते ही लड़कियों का पूरा झुंड इतनी जोर से हंसा कि बस स्टॉप पर खड़ा हर शख्स उनकी ओर ही देखने लगा। नेहा, ने समझ लिया कि इस बात को तिल का ताड़ बनते देर नहीं लगेगी। वो किसी भी हालत में अपनी पढ़ाई पर आंच नहीं आने देना चाहती थी, बस इस फैसले ने ही आज अचानक नेहा को इतना कठोर बना दिया कि उसने अनजाने में ही राहुल से वो सब कह दिया जो वो कहना नहीं चाहती थी। राहुल के जाने के बाद काफी देर तक नेहा अकेली ही बस स्टॉप पर खड़ी रही।

आंसुओं से दिया उसने जवाब

पिछले कई दिनों से जय हर बार ये साबित करने की कोशिश कर रहा था कि नेहा या नेहा जैसी लड़कियां जो छोटे शहरों से आती हैं वो कोई कठोर फैसले नहीं ले पातीं क्योंकि वो अंदर से कमजोर होती हैं या उनमें अपने दायरे को तोड़ने की हिम्मत नहीं होती। 
बार-बार कमजोर शब्द सुन कर नेहा परेशान हो गई थी लेकिन, वो कोई जवाब नहीं दे पा रही थी क्योंकि जय की तरह वो मजबूत तर्क नहीं गढ़ पा रही थी। भले ही नेहा का दिमाग जय की बातें स्वीकार कर ले रहा था लेकिन, उसका दिल इसे मानने को कतई तैयार नहीं था।
आज सुबह जब दोेनों की मुलाकात हुई तो जय ने नेहा से कहा- तुम्हें नहीं लगता कि जिंदगी में जब तक रहस्य बना रहता है तब तक जिंदगी में उर्जा और उत्साह भी बना रहता है? 
जैसे खिलाड़ियों को ही ले लो। वो पूरे करियर में उतने ही उर्जावान और उत्साहित दिखते हैं जितने कि वो पहले मैच में होते हैं क्योंकि हर मैच जीत जाने की उम्मीद के साथ हार जाने का डर ले कर आता है। यही रहस्य, रोमांच या एडवेंचर उन्हें हर मैच में अपना सौ फिसदी देने को मजबूर करता है।
अपनी बात कहने के बाद जय ने नेहा से फिर सवाल किया- क्या तुम बता सकती हो कि हाल ही में ऐसा कौन सा पल था जब तुमने एडवेंचर या रोमांच महसूस किया, क्या तुम्हें याद है?
नेहा- हां, अभी जब मैं मनाली गई थी तो वहां मैंने स्काई डाइविंग की, मुझे अजीब सा रोमांच महसूस हुआ वहां।
ये कहते हुए उसकी आंखें चमकने लगी और उसका चेहरा खिल उठा।
लेकिन नेहा की ये बात जय को उत्साहित नहीं कर सकी। उसने नेहा की इस खुशी पर अगले ही पल पानी फेर दिया। उसने कहा- इसमें रोमांच वाली कौन सी बात है। 
इस तरह के रोमांच तो बच्चों को उत्साहित कर सकते हैं, कोई मेच्योर इंसान इसमें रोमांच का अनुभव कैसे करेगा जबकि उसे पता है कि वो चाहे जितनी भी ऊंचाई से छलांग क्यों न लगाए आखिर में वो सेफ ही नीचे उतरेगा क्योंकि वहां कई स्तर के सुरक्षा इंतजाम पहले से किए गए होते हैं। 
बल्कि, जैसे ही इन जगहों पर कोई दुर्घटना होती है लोग तुरंत ही वहां न जाने या उससे बचने की कोशिश करने लगते हैं। जहां परिणाम की अनिश्चितता ही न हो वहां रोमांच का अनुभव कैसे हो सकता है?
नेहा- ऐसा तुम्हारे जैसे इंसान को लग सकता है कि इसमें कोई रोमांच नहीं है। कभी करके देखना। इतनी ऊंचाई से कूदने के बाद जब दिल की धड़कन बढ़ती है और सांसें थमीं रह जाती हैं तो पता चलता है कि रोमांच क्या होता है।
जय ने फिर से नेहा को काटते हुए कहा- लेकिन, अंत में तो मुझे इस खेल का नतीजा पता है कि मुझे कुछ नहीं होगा, मैं सेफ बच जाऊंंगा। ये तो वैसे ही हुआ कि हम मैच देख रहे हों और हमें पहले से ये पता हो कि कौन सी टीम जीतने वाली है। 
बल्कि मैं तो कहूंगा कि इससे ज्यादा रोमांच तो लूडो और शतरंज जैसे खेल में होता है जिसमें आखिर तक पता नहीं होता कि जीतेगा कौन। शायद इसीलिए स्काई डाइविंग जैसे एडवेंचर से कहीं ज्यादा लोकप्रियता क्रिकेट या शतरंज जैसे खेल की होती है क्योंकि इसमें अंतिम परिणाम अनिश्चित होता है।
नेहा तुरंत इस बात का कोई जवाबी तर्क नहीं ढूंढ पाई तो उसने कहा- जरूरी तो नहीं कि जिसमें तुम रोमांचित महसूस करो दूसरा भी उसी में रोमांच का अनुभव करे।
ये कहते-कहते नेहा के चेहरे पर तनाव आ गया। उसने ये जताने की कोशिश की कि उसे जय से बात करने में कोई इंट्रेस्ट नहीं है। बहस के बीच अचानक से सन्नाटा पसर गया। 
कुछ देर तक दोनों बिलकुल चुप रहे। जय ने महसूस किया कि कोई बात है जो नेहा को बुरी लगी है इसलिए, उसका मूड आॅफ हो गया है।
जय ने बात को बदलते हुए कहा- अच्छा, आजकल मैं कुछ ज्यादा ही पका नहीं रहा हूं तुम्हें? तुम्हें नहीं लगता कि इस तरह के लक्षण सामान्य इंसान में हो ही नहीं सकते। 
क्या तुम्हें नहीं लगता कि मैं सनकी सा हो गया हूं या मुझे डॉक्टर को दिखाना चाहिए क्योंकि मैं डिप्रेशन में हूं और इस तरह की अजीब बातें करता रहता हूं?
नेहा- हो सकता है तुम डिप्रेशन में हो, डॉक्टर को दिखाने में कोई बुराई नहीं है। शायद कुछ फायदा मिल जाए।
जय इस जवाब से संतुष्ट नहीं हुआ क्योंकि, नेहा ने उसके ही सुझाए दो विकल्पों में से एक को चुन लिया था। उसने खुद ये बात नहीं कही थी। जय को अभी तक इस बात का जवाब नहीं मिला था कि नेहा अचानक परेशान क्यों हो गई है।
उसने नेहा को फिर से कुरदते हुए पूछा- अच्छा, तुम्हें ऐसा नहीं लगता कि मैं कुछ ज्यादा ही बोलने लगा हूं आजकल?
अब तक नेहा का गुस्सा अपने चरम पर पहुंच चुका था और ज्वालामुखी के लावे की तरह वो अचानक फट पड़ा। उसने कहा- तुम्हारे साथ प्रॉब्लम ये है कि तुम दूसरों पर अपने विचार थोपने की कोशिश करते हो। 
तुम चाहते हो कि जहां तुम्हें खुशी मिलती है दूसरे इंसान को भी वहीं खुशी तलाशनी चाहिए। अगर कोई दूसरी जगह खुशी तलाश रहा है तो वो तुच्छ है, घटिया है। 
हो सकता है तुम्हें थियेटर देखने में मजा आता हो , लेकिन किसी को अपने परिवार के साथ समय बिताने में उससे ज्यादा मजा आ सकता है। तो क्या दूसरे इंसान को हम तुच्छ मान लेंगे?
जरूरी तो नहीं कि तुम ही ये तय करो कि जिंदगी कैसे जी जाएगी? ये मेरी जिंदगी है और इसे कैसे जीना है इसे तय करने का अधिकार भी मेरा है। मुझे कहां खुशी मिलेगी या मेरे लिए रोमांच क्या है ये मैं तय करूंगी न कि कोई दूसरा।
और मैं डरपोक बिल्कुल नहीं हूं। अगर मैं डरपोक होती तो तुम्हारे साथ कहीं भी, किसी भी समय ऐसे ही नहीं चली जाती। मैं श्याम के साथ अकेले उसकी कार में चली गई, वो कहीं भगा के ले जा सकता था मुझे! राहुल के एक बार कहने पर मैं उसकी बाइक पर उसके साथ चल दी। 
क्या कोई कमजोर लड़की ऐसा कर सकती है? मैं भी काॅलेज टाइम में अपने दोस्तों के साथ पार्टी करने और घूमने फिरने जाती रही हूं। ऐसा तो है नहीं कि मैंने ये सब नहीं किया है?
मुझे जो करना होता है मैं वो करती हूं। मुझे इससे कोई फर्क नहंी पड़ता कि दूसरे को वो अच्छा लगता है या नहीं। मेरे फेसबुक की डीपी मैं इसलिए क्यों बदल दूं कि वो किसी दूसरे को अच्छी नहीं लगती? मुझे अच्छी लगती है इसलिए मैंने उसे लगाया है। किसी के कहने पर तो मैं उसे बिल्कुल नहीं बदल सकती, भले ही दो दिन बाद मैं खुद ही उसे बदल दूं।
ये सब कहते-कहते नेहा की आंख कई बार भर आई थी। जैसे कई दिन से उसने ये सब दबा कर और सहेज कर रखा हुआ था और इसी मौके का इंतजार कर रही थी। नेहा की इस भावुकता ने जय को भी परेशान कर दिया। जय ये सोचने पर मजबूर हो गया कि आखिर उसने ऐसा क्या कह दिया जो नेहा को इतना बुरा लग गया।
जय ने बाद में ये महसूस किया कि जब आप किसी इंसान के उस सिद्धांत को ही चुनौती दे देते हैं जिसके आधार पर वो अब तक जिया है तो उसका द्रवित हो जाना स्वाभाविक है। जीवन में रोमांच और उसकी अनिश्चितता की कमी के जिस मूल बात से ये बहस शुरू हुई थी उसने नेहा के जीवन के अब तक के सारे सिद्धांतों को ही चुनौती दे दी थी।
नेहा इस बात को मानने को बिलकुल तैयार नहीं थी कि वो जिन सिद्धांतों पर अब तक अपनी जिंदगी जीती आई है असल में वो उतने मजबूत नहीं हैं जितने वो सोचती है। यही कारण है कि जब इन सवालों का तार्किक जवाब वो नहीं दे पाई तो उसने भावनाओं में बह कर वो सब कह डाला जो उसे बुरा लगा था, लेकिन जय को मूल सवाल का जवाब अब भी नहीं मिला था, पर नेहा को वो और रुलाना नहीं चाहता था इसलिए चुप रह गया।

आखिर क्यों नहीं ले पाती हो तुम वो फैसला जो लेना चाहती हो!

आज सुबह से ही जय का मूड कुछ उखड़ा-उखड़ा सा था। एक दो बार नेहा ने उससे बात करने की कोशिश की लेकिन जय ने उसे इग्नोर कर दिया। नेहा को समझ में आ गया कि कल बार जाने से मना करने वाली वाली बात से वो नाराज है।
पूरे दिन दोनों में कोई बात नहीं हुई, लेकिन शाम होते-होते जय का गुस्सा कुछ ठंडा हुआ तो उसने ही नेहा से पूछा- अच्छा एक बात बताओ, हमारे समाज में आज भी लड़कियां अपने बारे में फैसला लेने से इतना डरती क्यों हैं? 
मेरी एक भतीजी है जो गाने का शौक रखती है लेकिन, घरवाले हैं कि उसके इस फैलसे के सख्त खिलाफ हैं। मेरे भाई का कहना है कि ये गाने-वाने का काम लड़कियों के लिए ठीक नहीं है। 
मेरी भतीजी ने इस स्थिति को स्वीकार कर लिया है क्योंकि वो मेरे भाई से बहुत डरती है। उसे लगता है अगर पापा गुस्सा हो गए तो घर से निकलना और कोंचिंग जाना भी बंद करवा देंगे।
इतना कहने के बाद जय कुछ सोचने लगा... कुछ देर रुक के उसने नेहा से सवाल किया- क्या तुमने भी जिंदगी के फैसले ऐसे ही किसी दबाव में लिए हैं? आखिर लडकियोंं को इतना एक्सपोजर और इतनी कानूनी ताकत मिलने के बावजूद उनमें कॉन्फिडेंस क्यों नहीं आता?
नेहा ये सब सुने जा रही थी और किसी खयाल में उलझी हुई सी भी थी। जय के सवाल करने के अगले एक मिनट बाद तक वो शांत ही रही...जय ने उससे फिर पूछा- आखिर कुछ बोलती क्यों नहीं तुम ?
नेहा- देखो, तुम्हे ये बात समझनी होगी कि हर लड़की इतनी मजबूत नहीं होती कि वो घर वालों की मर्जी के खिलाफ जाकर फैसला ले सके। 
और हमारी परवरिश से ही बहुत हद तक ये निर्धारित हो जाता है कि हमें किस रास्ते पे जाना है। पढ़ाई से लेकर करियर और शादी तक का सब कुछ तो मां-बाप पहले से ही तय करके रखते हैं, फिर आपके लिए उसमें जगह ही कहां बचती है कोई फैसला खुद से लेने की।
ये बोलते-बोलते नेहा की आंखें कुछ नम हो गईं। लेकिन उसने तुरंत खुद को संभाला और बोली- अब मेरा ही ले लो... उसने मुझसे कहा था कि अगर तुम कहो तो मैं अपने घर वालों से बोलूं तुम्हारे घरवालों से बात करने को लेकिन, मैं इतनी हिम्मत नहीं जुटा पाई कि उससे हां कह पाती। मुझे लगा इससे मां-बाप की भावनाओं को ठेस पहुंचेगी और मैं चुप रह गई।
जय को ये बात खटकी तो कि आखिर अचानक नेहा ये किसके बारे में बात करने लगी लेकिन, उसने उसे रोका नहीं और न ही इस बात को कुरेदने की कोशिश ही की। उसने नेहा को बोलने दिया।
नेहा- देखो, ऐसा कोई भी फैसला जो सिर्फ आपको पसंद है और घर वाले उसके साथ नहीं हैं तो उसे लेने में परेशानी आती ही है। ऐसा फैसला लेने के लिए आपमें इतना कॉन्फिडेंस होना चाहिए कि उसके गलत होने पर आप खुद को संभाल सकें क्योंकि, तब कोई भी आपके साथ नहीं होगा।
जय- और ये कॉन्फिडेंस क्यों नहीं होता लड़कियों में कि वो अकेले भी इस दुनिया का सामना कर सकती हैं। आखिर क्यों हर बार उन्हें किसी फैसले के लिए पिता, भाई, प्रेमी या पति का सहारा चाहिए?
नेहा- क्योंकि हमें शुरू से ही ये बताया जाता है कि लड़की एक खुली तिजोरी की तरह है जिसे अगर संभाल के न रखा जाए तो उसे कोई भी लूट सकता है।
इस बात पर जय जोर से हंस पड़ा और बोला- और शायद दुनिया में यही एक ऐसा अपराध है जिसमें इस तिजोरी को लूटने वाले अपराधी से ज्यादा शिकार होने वाले को सजा भुगतनी पड़ती है। और ये सजा कोई कानून या कोर्ट नहीं बल्कि, वही समाज देता है जो लड़की की इज्जत को उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बता कर उसे हमेशा के लिए मर्दों के आगे कमजोर बना देता है।
जय की इस बात का नेहा कोई जवाब नहीं देती और फिर से कुछ सोचने लगती है...