Wednesday, 29 August 2018

उसके स्माइली फेस पर आज गहरी गंभीरता थी

पिछले कुछ दिनों से जय और नेहा के बीच राहुल आ गया था। नेहा लगातार उसके किस्से सुनाए जा रही थी और जय उन्हें सुनता जा रहा था। उसने महसूस किया कि नेहा की रूह के किसी कोने में राहुल ठहर गया था। तमाम घटनाएं जिनका वो जिक्र कर रही थी, बीते काफी अरसा गुजर गया था... लेकिन जब वो ये सब सुनाती तो लगता जैसे वो आज भी उन्हें जी रही है।
लेकिन आज सुबह से वो शांत थी। हमेशा खिले रहने वाले उसके स्माइली फेस पर आज गहरी गंभीरता पसरी हुई थी। जय ने समझ लिया कि कुछ तो गड़बड़ है। पता नहीं क्यूं लेकिन, जय को नेहा का ये अवतार अच्छा लग रहा था। वो नेहा की एक फोटो खींच लेना चाहता था। ताकि बाद में इसे दिखाते हुए कह सके- देखो, तुम्हारे इस रूप में जो आकर्षण है उसे दिखाने वाला कोई आइना अब तक नहीं बना है।
फिर भी जय ये जानना चाहता था कि नेहा के मन में आखिर चल क्या रहा है। उसकी चुप्पी तोड़ने के लिए जय ने एक सवाल उसकी ओर उछाल दिया- क्या जीवन में कुछ अधूरा रह जाने या उसके छूट जाने का अफसोस नहीं होना चाहिए? तुमने जेएनयू घूमने के दौरान राहुल से यही बात तो कही थी, ‘कुछ और हो न हो... हमें पढ़ाई तो अच्छी जगह से ही करनी चाहिए।‘ क्या तुम्हें इस बात का अफसोस नहीं है?
सवाल करने के बाद जय कुछ देर चुप रहा। वो जानना चाहता था कि नेहा इस बात से कितना सहमत है लेकिन, उसने कोई जवाब नहीं दिया। वो पहले की तरह ही शांत और गंभीर मुद्रा में अपनी जगह बैठी रही। उसके चेहरे के भाव तक नहीं बदले।
जय ने उसे और कुरेदने की कोशिश की- पता नहीं क्यों... लोग ये मानते हैं कि जो छूट गया, जो बीत गया उस पर अफसोस करना गलत है। जबकि सच तो ये है कि जिंदगी की असल सीख उस छूट जाने में ही छिपी हुई है। चलते-चलते अगर हम किसी गलत रास्ते पर आ गए हैं और सही रास्ता पीछे छूट गया है तो क्या हमें पीेछे नहीं जाना चाहिए। गतल रास्ते पर ही जिंदगी भर चलते रहने से तो अच्छा है कि हम थोड़ा पीछे चले जाएं और सही रास्ते को पकड़ लें।
अफसोस करने वाली बात नेहा को हजम नहीं हुई। राहुल ने जब इस बात पर ज्यादा जोर दिया तो नेहा अपनी कुर्सी से उठी और कमरे के कोने में रखे मनीप्लांट के पौधे के पास खड़ी हो उसकी पत्तियों से धूल साफ करने लगी और बोली- लेकिन, इसे अफसोस करना कैसे कह सकते हैं। जरूरी तो नहीं कि आप जिंदगी में जो कुछ सोचें वो सब आपके साथ हो ही जाए। कुछ न कुछ तो हर किसी की जिंदगी में होने से रह ही जाता है।
जय को अच्छा लगा कि नेहा इस बातचीत को आगे बढ़ाना चाहती है। जय अपनी जगह से उठा और एक कुर्सी ले जाकर नेहा के बगल में रख दी। नेहा को बैठने का इशारा कर वो खुद बगल में ही खड़ा हो गया।
नेहा कुर्सी पर बैठ गई तो जय ने कहा- हां, शब्दों का मेरा चुनाव गलत हो सकता है लेकिन, भाव ये है कि जब भी जिंदगी में चुनाव करने का वक्त आता है तो हम मजबूती से खड़े क्यों नहीं हो पाते? ऐसा तो नहीं था कि अगर तुम घरवालों का थोड़ा विरोध करती और थोड़ा सा धैर्य रखती तो तुम्हें वो नहीं मिलता जो तुम पाना चाहती थी।
नेहा इस बात का जवाब देना चाहती थी लेकिन, जय ने उसे रोकते हुए कहा- तुम अपनी बात कह लेना लेकिन, पहले मेरी बात पूरी हो जाने दो।
जय ने थोड़ा तेज आवाज में उत्तेजित होते हुए कहा- पता नहीं क्यूं... लेकिन मुझे ये लगता है कि तुम वो पा सकती थी और तुम्हारी जगह जिसे वो मिला, तुम उससे कहीं ज्यादा बेहतर उस मौके का इस्तेमाल कर सकती थी। हम मोटी फीस चुका कर किसी दोयम दर्जे के संस्थान में पढ़ना स्वीकार कर लेते हैं। मुझे समझ में नहीं आता कि इस तरह के समझौते लोग क्यूं कर लेते हैं। क्या ये हमारी कमजोरी नहीं है?
ये कहते-कहते जय थोड़ा भावुक सा हो गया। नेहा इस बात को समझ गई। उसने हंसते हुए कहा- अरे, तुम तो सेंटी हो गए। इतना टेंशन क्यूं ले लेते हो तुम? जिंदगी खत्म थोड़े ही हो गई है कि अब कुछ हो ही नहीं सकता।
नेहा की इस बात पर जय और भी भड़क गया। उसने गुस्से में कहा- बस... तुम लड़कियों की यही तो प्राॅब्लम है कि जब भी तुम्हारे साथ कुछ गलत होता है तो उसे या तो चुप होके सह लेती हो या आंसू बहा कर निकाल देती हो। उस गुस्से को पालती ही नहीं हो ताकि, वो आग बनके निकले और दूसरों को डरा दे। यही तो कारण है कि लड़कियों को हमेशा दबाया जा सका।
क्यों दुनिया के महान साइंटिस्ट से लेकर आर्टिस्ट या इनोवेशन के किसी भी फील्ड में महिलाओं का नाम रत्ती भर के बराबर है? क्योंकि इस जेंडर ने हमेशा अपनी भावनाओं को दबाने या छिपाने में ही अपनी बहादुरी समझी... कुछ व्यक्त होने ही नहीं दिया, उसे निकलने ही नहीं दिया कहीं।
अब तक जय का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच चुका था। चेहरा तमतमा रहा था और आखों से जैसे आग निकल रही थी। वो और भी बहुत कुछ बोलना चाहता था लेकिन, अचानक चुप हो गया।
नेहा अपनी कुर्सी से उठी और उसकी आंखों में आंख डाल कर देखने लगी। नेहा के चेहरे पर जिस गंभीरता को देख कर जय ने ये बातचीत शुरू की थी वो अब गायब हो चुकी थी। जय को देखकर नेहा मुस्कुरा रही थी... उसकी आंखें फिर से चमकनें लगी थीं।

पीले सलवार-सूट को बैन क्यों नहीं करती सरकार

कपड़े पहनने का नेहा का स्टाइल औरों से थोड़ा अलग है। हालांकि ज्यादातर मौकों पर राहुल ने उसे ट्रेडिशनल ड्रेस में ही देखा है। उसे सलवार कुर्ता पहनना शायद सबसे ज्यादा पसंद है। उस दिन उसने पीले रंग का काॅटन का सूट पहन रखा था। दुपट्टे का रंग भी पीला ही था। माथे पर हरे रंग की छोटी सी बिंदी भी लगा रखी थी।
पीले सूट में उसका गोरा रंग ऐसे चमक रहा था जैसे साफ उजले पानी की लहरों पर सूरज की रोशनी पड़ते ही उसकी चमक दोगुनी हो जाती है। उसे देखने के बाद कुछ देर तक तो राहुल को समझ में नहीं आया कि आखिर आज नेहा इतनी खुबसुरत क्यों लग रही है। उसका चेहरा ऐसे खिल रहा था जैसे उसमें से हजार वाट के कई बल्ब की रोशनी निकल रही हो। राहुल ये बात उससे कहना चाहता था लेकिन, समझ में नहीं आ रहा था कि वो कहे तो क्या कहे। पता नहीं ऐसा क्यूं होता है कि जब आप कुछ कहने के लिए सबसे ज्यादा बेताब होते हैं उसी वक्त शब्दों की सबसे ज्यादा कमी हो जाती है।
आते ही नेहा अपनी सीट पर गई और मोबाइल चेक करने लगी। राहुल लगातार उसे ही निहार रहा था। वो चीख-चीख कर कहना चाहता था कि आज दुनिया की हर खुबसूरत चीज तुम्हारे सामने फीकी पड़ गई है, लेकिन चाह कर भी वो ऐसा कह नहीं सका। उसके मुंह से बस इतना ही निकला- आखिर सरकार पीले रंग के सूट को बैन क्यों नहीं कर देती? खासतौर से गोरी चमड़ी वालों को तो इसे पहनने ही नहंी देना चाहिए।
अपने वाट्सऐप में व्यस्त नेहा को ये बात समझ में आई या नहीं कहना मुश्किल है लेकिन, उसने राहुल से बस यूं ही पूछ दियाा- क्यूं... पीले सूट से तुम्हें क्या परेशानी है?
राहुल- मुझे कोई परेशानी नहीं है लेकिन, किसी को भी परेशानी हो सकती है।
राहुल से सवाल करते हुए नेहा की आखें ऐस चमकी रहीं थीं, जैसे वो कुछ कह देना चाहती हैं। उसके होंठ भी हिल रहे थे लेकिन, वहां से कोई शब्द नहीं निकल रहे थे। पता नहीं ये उसके आंखों और होठों की शैतानी थी या कुछ और लेकिन, राहुल इनके जादू में आज पूरी तरह कैद था।
राहुल का मन कर रहा था कि उसे कहीं घुमाने ले जाए लेकिन, उसे पता था कि ये नहीं हो सकता। फिर भी वो कुछ वक्त नेहा के साथ बिताना चाहता था। उसने चाय के लिए पूछा तो नेहा ने अनमने मन से जवाब दिया- अरे....ये कौन सा वक्त है चाय पीने का। ठीक है... तुम्हें पीनी है तो जाओ, मुझे कोई शौक नहीं है।
राहुल नेहा के नजदीक चला गया और धीमी आवाज में कहा- प्लीज, चलो ना.... दस मिनट में वापस आ जाएंगे।
नेहा अपने मोबाइल में लगी रही और बिना कुछ बोले इनकार करते हुए उसने गर्दन हिला दी। राहुल फिर भी नहीं माना और उसने नेहा के हाथ से मोबाइल छीनने की कोशिश की। दोनों में थोड़ी छीना-झपटी भी हुई। नेहा ने राहुल से अपना हाथ छुड़ाते हुए गुस्से में कहा- क्या है... कोई जबरदस्ती है क्या?
राहुल उसके और नजदीक चला गया। उसने फिर कहा- प्लीज चलो न... बस दस मिनट की तो बात है। फिर आ जाना और करती रहना दिन भर अपना काम।
अब तक नेहा समझ चुकी थी कि इनकार करने से कोई फायदा नहीं है। उसने कहा- अच्छा दस मिनट सब्र करो। मुझे एक मेल करने दो, फिर चलती हूं।
काम निपटाने के बाद नेहा ने गुस्से में राहुल को देखा और ताना मारने के अंदाज में बोली- चलिए, चाय पीने....नहीं तो आप बीमार पड़ जाएंगे अभी।
नेहा का गुस्सा देख राहुल को समझ में नहीं आ रहा था कि उससे क्या कहे और कैसे बात करे। इस सोच में कुछ दूर तक दोनों बिना कुछ बोले ही चलते रहे। आखिर राहुल ने ही चुप्पी तोड़ी और बोला- अच्छा तुम्हें क्या लगता है... लड़कियां इतना डरती क्यूं हैं लड़को पर भरोसा करने से?
नेहा- अब किसी के चेहरे पर तो लिखा नहीं होता कि वो क्या है और उसके दिमाग में क्या चल रहा है। और सच ये है कि लड़कियां समझ जाती हैं कि कोई उन्हें किस निगाह से देख रहा है या लड़की को टच करने का उसका मकसद क्या है?
राहुल को ये बात थोड़ी बुरी लगी लेकिन, वो जानना चाहता था कि नेहा के दिमाग में क्या चल रहा है। उसने बात आगे बढ़ाते हुए कहा- अच्छा, मैं एक बात कहूं।
नेहा- हां...
राहुल- क्या ऐसा नहीं होता कि जब हमें कोई बहुत प्यारा या अच्छा लगता है तो हम उसे चूम लेना चाहते हैं या उसे बांहों में भरना चाहते हैं। कई बार भावनाओं को सिर्फ शब्दों से बयां करना मुश्किल हो जाता है या शायद शब्दों की अपनी सीमा होती है इसलिए जब वो कम पड़ने लगते हैं तो इंसान की आंखों से आंसू छलक पड़ते हैं या सीने से लग जाने या लगा लेने का मन करता है?
नेहा- हां, हो सकता है... लेकिन इसका फैसला कैसे होगा कि किसी की भावना क्या है?
राहुल- अच्छा, एक चीज तुम्हें अजीब नहीं लगती कि पश्चिमी देशों में किसी से मिलते ही उसे गले लगाने और किस करने की प्रथा है। तुम्हें नहंी लगता कि अभिवादन का ये तरीका एक छटके में ही आपको ये एहसास करा देता है कि अगले की आपके प्रति क्या भावना है?
नेहा ने इस बात को थोड़ा गंभीरता से लिया। उसे लगा इस बात को आगे बढ़ाया जाना चाहिए- हां, हमारे यहां तो ठीक इसके उल्टा है। अगर आप नजदीकी रिश्ते में भी कुछ ज्यादा हंसी-ठिठोली करने लगे और थोड़ा नजदीक चले गए तो तुरंत ही डांट लग जाती है कि इतना चिपक-चिपक के बतियाने की क्या जरूरत थी उससे?
राहुल- तुम्हें नहीं लगता कि शायद इसी वजह से हमारी बहुत सी भावनाएं सही होते हुए भी व्यक्त नहंी हो पातीं और आगे चलकर वो गलत दिशा में चली जाती हैं?
नेहा थोड़ा सोच में पड़ गई। कुछ सोचने के बाद उसने कहा- हां, शायद ऐसा होता हो लेकिन ऐसा होगा ही ये कहना थोड़ा मुश्किल है...
राहुल- पता नहीं, लेकिन... इंसान अगर अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए शब्दों का कम इस्तेमाल करे तो शायद अविश्वास, डर और कुंठाओं से उसे मुक्त करना ज्यादा आसान होगा। शायद नैतिक शिक्षा की किताबें पढ़ाने की बजाए ये तरीका किसी को ज्यादा मानवीय बना सकता है।
नेहा- हां, शायद तुम्हारी बात सही हो सकती है लेकिन हर इंसान का मानसिक स्तर एक जैसा नहीं होता... और सच तो ये है कि इस मानसिकता को बदलने की ही ज्यादा जरूरत है।
जब नेहा ये बोल रही थी तो राहुल एक टक उसे देख रहा था। वो अब और भी खुबसुरत दिखने लगी थी... शायद इतनी खुबसुरत कि राहुल उसे शब्दों में बयां नहंी कर सकता था। उससे रहा नहीं गया और उसने नेहा के बाएं बाजू पर हल्के से दो मुक्के मारे और कहा- कभी-कभी तुम बहुत समझदारी की बात करने लगती हो। लेकिन जिस दिन पीला ड्रेस पहना करो उस दिन ऐसा मत किया करो, प्लीज....
इतना कहते-कहते राहुल ने फिर से नेहा के बाजू पर मुक्का मारने की कोशिश की। नेहा ने खुद को बचाते हुए कहा- बिहेव योर सेल्फ...

'मेट्रो तक का साथ'

आज सुबह से ही दिल्ली में खूब बारिश हो रही थी, इसलिए कम ही लोग काॅलेज आए थे। राहुल ने नजदीक ही रूम ले रखा था इसलिए बारिश शुरू होने से पहले ही वो काॅलेज पहुंच गया था। नेहा भी किसी तरह आ गई थी।
दिल्ली में कुछ देर की भी बारिश जी का जंजाल बन जाती है। हर चैराहे पर जाम और हर मोड़ पर वाटर लाॅगिंग आम बात है। काॅलेज के आॅफिस स्टाफ के लोगों के अलावा टीचर्स भी जाम में फंसे हुए थे। बारिश की वजह से बाहर मौसम ठंडा हो गया था जिसका असर क्लास रूम में भी था। एसी रोज की ही तरह चल रहा था, लेकिन क्लास रूम काफी ठंडा हो गया था। आते वक्त नेहा थोड़ी बहुत भीग गई थी तो उसे ठंड लगने लगी। उसने राहुल से कहा- यार, आज कुछ ज्यादा ही ठंडा नहीं कर रहा एसी? प्लीज इसे बंद करा दो ना।
राहुल- हां, ठंड तो मुझे भी लग रही है लेकिन अभी तो कोई दिख नहीं रहा जिससे बंद करने के लिए बोलूं। चलो हम लोग बाहर बालकनी में बैठते हैं। आज बाहर का मौसम भी अच्छा ही है।
दोनों क्लास रूम के बाहर बालकनी में आ गए और कुछ देर तक बिना बातचीत किए बारिश की बूंदों को देखते रहे। कुछ देर बाद राहुल ने कहा- यार, आज कहीं घूमने चलें। देख न मौसम कितना अच्छा है और आज तो क्लास भी चलने से रही। चल आज जामिया चलते हैं। मेरा असाइनमेंट भी पूरा हो जाएगा और तफरी भी हो जाएगी। क्या कहती हो?
नेहा- तुम हमेशा अपने काम के लिए मुझे यहां-वहां ले जाते रहते हो, मैं कब से कह रही हूं कि मुझे एक बार जेएनयू जाना है। हम वहां नहीं चल सकते आज?
राहुल- हां, चल सकते हैं। पहले जामिया चलते हैं, वहां कुछ देर का काम है। निपटा कर सीधे जेएनयू चल देंगे। शाम होने से पहले दोनों काम निपट जाएगा।
नेहा को प्लान पसंद आया। दोनों ने काॅलेज बंक करने का प्लान बनाया और आॅटो कर जामिया चल दिए। बारिश भले ही हुई थी लेकिन उमस की वजह से गर्मी में कोई कमी नहीं थी। कुछ दूर चलने के बाद ही राहुल को प्यास लग आई। उसने नेहा से पूछा- तुम्हारे पास पानी है क्या?
नेहा- नहीं।
राहुल- इतने बड़े-बड़े दो बैग लेकर चलती हो, एक बाॅटल पानी नहीं रख सकती इसमें।
नेहा- तुम भी इतना बड़ा बैग लेकर चलते हो, तुम नहीं रख सकते पानी? और मेरा बैग पहले से ही बहुत भारी है, इसमें और कोई सामान नहीं रख सकती मैं।
राहुल- आखिर रखती क्या हो तुम इस बैग में कि इतना भारी हो जाता है?
नेहा- तुम्हें हर बात बताना जरूरी नहीं है मेरे लिए। अपना काम करो तुम, समझे।
अब तक आॅटो डीएनडी फ्लाईओवर के पास पहुंच गई थी। इस रास्ते में महारानी बाग तक जाम लगना आम बात है। अगर आप एम्स तक जा रहे हैं तो पीक आॅवर में आश्रम तक जाम का सामना करना ही पड़ता है। नेहा-राहुल की आॅटो भी पिछले दस मिनट से महारानी बाग वाले कट पर जाम में फंसी हुई थी। गर्मी से दोनों का बंुरा हाल था। गर्मी में आते ही नेहा का गुलाबी चेहरा लाल हो जाता। पसीने की बूंदें उसे भले ही परेशान करती हों लेकिन, उसके चेहरे पर आई लालिमा उसे और भी आकर्षक बना देती। राहुल ने नेहा की नजर बचा के कई बार पसीने और गर्मी से लाल हो चुके उसके चेहरे को देखने की कोशिश की। लाल हो चुके उसके चेहरे पर उसकी बड़ी-बड़ी आंखें ऐसे चमकतीं जैसे उसके चेहरे को किसी ने सुर्ख लाल गुलाबों से ढंक दिया हो और आखों की जगह दो चमकते हुए मोती रख दिए हों।
राहुल अपनी दुनिया में खोया हुआ था तभी आॅटो वाले ने आवाज लगाई- भाई साब, झुलेना वाली रोड पर चलना है या मथुरा रोड पर ले लूं आॅटो?
राहुल अचानक जैसे नींद से जागा और बोला- नहीं... नहीं, झुलेना की ओर ले लो। जामिया मेन गेट पर पहुंच कर उन्होंने आॅटो छोड़ दिया और अपने काम में लग गए।
दो बजे के करीब काम खत्म होने के बाद दोनांे ने आॅटो किया और जेएनयू चल दिए। राहुल ने 24x7 ढाबे पर आॅटो रुकवाई और वहां से दोनों पैदल ही कावेरी हाॅस्टल की ओर चल दिए। बाहर की तुलना में जेएनयू कैंपस में गर्मी कुछ कम महसूस हो रही थी। चारों ओर हरियाली और पेड़-पौधों की वजह से कैंपस में घूमना वैसे भी अच्छा ही लगता है।
कुछ दूर चलने के बाद नेहा ने राहुल से कहा- पता है... और कुछ हो न हो लेकिन पढ़ाई हमेशा अच्छे काॅलेज से ही करनी चाहिए।
राहुल ने उसकी बात पर सहमति में सिर हिला दिया फिर कुछ दूर तक दोनों बिना कुछ बोले ही चलते रहे।
कावेरी हाॅस्टल के सामने पहुंचते ही राहुल सामने बने लाॅन में जाकर लेट गया। नेहा भी उससे कुछ दूरी पर जाकर बैठ गई। राहुल ने कहा- इतनी दूर क्यों बैठी हो, थोड़ा नजदीक भी आ सकती हो। मैं कुछ गलत नहीं करूंगा तुम्हारे साथ।
नेहा- मैं ठीक हूं... तुम अपना काम करो, ज्यादा बकवास करने की जरूरत नहीं है, समझे।
राहुल लेटे-लेटे नेहा को निहारता रहा। कुछ देर बाद नेहा ने ही पूछा- अच्छा, तुमने शादी के बारे में क्या सोचा है?
राहुल- सोचना क्या है? जो अच्छी लगेगी उससे कर लूंगा।
नेहा- तुम्हारे घर वाले दबाव नहीं डाल रहे तुम पर... शादी के लिए?
राहुल- हां, डाल तो रहे हैं लेकिन, पता नहीं कुछ तय हो नहीं पा रहा। वो तो कहते हैं अगर कोई पसंद है तो कर लो।
नेहा- हुम्म.....तो कोई पसंद है?
राहुल- अब क्या कहूं.... तुम्हे तो पता है कि हमारे यहां शादी का एक फुल प्रूफ सिस्टम है जिसमें आप एक भी स्टेप इधर-उधर नहीं कर सकते। लड़के की जाति, घर-बार, उम्र, नौकरी, आमदनी और शक्लो-सूरत के हिसाब से लड़की खोजी जाती है। मैच होने पर ही बात आगे बढती है।
नेहा- तो तुम क्या चाहते हो?
राहुल- मेरे चाहने से क्या होगा। यहंा तो प्यार होने नहीं दिया जाता, क्योंकि बचपन से ही बताया जाता है कि ये एक गुनाह है और ऐसा करने वालों को इज्जत-प्रतिष्ठा सहित रिश्ते-नातों से हाथ धोना पड़ता है। पहले तो डर के मारे कोई प्यार करता नहंी और अगर कर भी लेता है तो किसी से बताता नहीं। जब तक शादी के लिए घर वाले दबाव नहीं डालते चोरी-चुपके प्यार चलता रहता है और शादी तय होते ही लड़की कह देती है- मैं सिर्फ अपनी खुशी के लिए घर वालों को बदनाम नहीं कर सकती। फिर मेरी छोटी बहन भी तो है, उसका क्या होगा। हर राम कहानी का यही अंत होता है।
नेहा- तो तुम्हें क्या लगता है कि ऐसा सिर्फ लड़कों के साथ ही होता है?
राहुल- मैं ऐसा कहां कह रहा हूं। लड़कियों का भी यही हाल है। लड़की के रूप-रंग, उसकी पारिवारिक हैसियत के मुताबिक घर वाले जिस वर को चुनते हैं वो खुशी-खुशी उसे स्वीकार करती है। मां-बाप द्वारा चुने गए पति के घर को अपना संसार मानकर जीवन गुजार देती है, क्योंकि दुनिया का यही नियम है और दुनिया ऐसे ही चलती है। ये भी निश्चित कर दिया गया है कि शादी के बाद जीवन में प्यार की सारी संभावना खत्म हो जाएगी, क्योंकि पति को पत्नी से और पत्नी को पति के अलावा अब किसी और से प्यार हो ही नहीं सकता। और अगर होता है तो इससे बड़ा कोई पाप नहीं।
इतना बोलते-बोलते राहुल की आंखें लाल हो गईं। वो गुस्से में आ गया। तभी उसे महसूस हुआ कि वो कुछ ज्यादा ही बोल गया। वो एकदम से चुप हो गया और नेहा की ओर देखने लगा। उसने पाया कि नेहा तो अपने मोबाइल में उलझी हुई है और वाट्सऐप पर किसी के चैट का जवाब दे रही है। राहुल को नेहा का ये व्यवहार बुरा तो बहुत लगा लेकिन, बिना कुछ बोले वो फिर से लाॅन की घास पर लेट गया।
राहुल के चुप होने के चंद सेकेंड बाद नेहा ने अपना मोबाइल बंद करते हुए पूछा- तो.... अब क्या करोगे तुम? प्यार किया नहीं और सिस्टम वाली शादी तुम्हें पसंद नहीं। ऐसे तो अकेले ही रह जाओगे?
राहुल ने नेहा की आंखों में देखा और कुछ सोचने लगा। कुछ देर चुप रहने के बाद राहुल ने कहा- चलो, अब चलते हैं। कम से कम मेट्रो स्टेशन तक तो तुम साथ दोगी ही मेरा... आगे की जिंदगी के बारे में फिर कभी बात करेंगे...

न जाने क्यों अगले स्टेशन पर वो मेरा इंतजार करती रही...

राहुल को अपना असाइनमेंट दो दिन में जमा करना था। उसने नेहा से अपने साथ चलने की जिद की। नेहा ने साफ मना कर दिया। उसने कहा- असाइनमेंट तुम्हारा है, मैं क्यों जाउं तुम्हारे साथ।
असल में वो राहुल को इग्नोर करने की कोशिश कर रही थी लेकिन, वो लगातार नेहा से चलने की जिद कर रहा था। पता नहीं क्यों पर, कुछ सोचने के बाद नेहा ने हामी भर दी।
अगले दिन दोपहर में मेट्रो से जाने का फिक्स हुआ। वर्ल्ड फूड फेस्टिवल का आखिरी दिन होने के कारण दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम में उस दिन काफी भीड़ थी। नेहा को वहां का क्राउड पसंद आया। देश-विदेश से आए लोगों का जमघट और दुनिया भर के अजीबो-गरीब खान-पान, उनकी सजावट और खुशबू ने माहौल को किसी त्योहार सा बना दिया था। स्टेडियम में घुसते ही राहुल ने आयोजक से बात की और अपने काम में लग गया। नेहा उसके पीछे-पीेछे चलती रही। कई स्टाॅल से गुजरने के बाद राहुल ने नेहा से कहा कि जब वो किसी से बात कर रहा हो तो उसकी कुछ तस्वीरें खींच ले ताकि, असाइनमेंट में उनका इस्तेमाल किया जा सके।
यहां आते वक्त दोनों ने सोचा था कि घंटे दो घंटे में काम निपटा कर निकल जाएंगे लेकिन, काम के बीच कब पूरा दिन निकल गया पता ही नहीं चला।
पांच बजे के करीब नेहा ने राहुल को इशारे में बताया कि उसे देर हो रही है। राहुल को भी तभी एहसास हुआ कि शाम होने वाली है। उसने जल्दी-जल्दी काम निपटाया और छह बजे के करीब दोनों वहां से चल दिए। स्टेडियम से चंद कदमों की दूरी पर ही जवाहर लाल नेहरू मेट्रो स्टेशन है। दिन भर स्टेडियम के चक्कर लगाते हुए नेहा थक गई थी, उसे तेज प्यास लग रही थी। उसने राहुल से एक बोतल पानी खरीदने को कहा। पानी पीते हुए जैसे ही दोनों मेट्रो स्टेशन में पहुंचे, राहुल प्लेटपफाॅर्म के लिए जाने वाली सीढ़ियों पर बैठ गया। तब तक नेहा आगे निकल गई थी। उसने इशारा किया कि ट्रेन आ गई है जल्दी नीचे आओ। राहुल ने इशारे में ही नेहा से पांच मिनट रुक जाने को कहा। असल में राहुल भी चलते-चलते थक गया था। नेहा को घर जाने की जल्दी तो थी लेकिन, उसने ट्रेन छोड़ दी और आकर राहुल के बगल में बैठ गई।
नेहा- अब बैठो क्यों हो यहां, मुझे देर हो रही है।
राहुल- अरे बाबा, दस मिनट तो बैठ सकती हो ना। अब घर ही तो जाना है तुम्हें, ऐसी कौन सी ड्यूटी है जो लेट हो जाओगी।
नेहा ने कुछ जवाब नहीं दिया और चुपचाप बैठी रही। इस बीच कई ट्रेनें निकल जाने के बाद नेहा ने राहुल से कहा- देखो अगर अगली ट्रेन से तुम नहीं चले तो मैं निकल जाउंगी।
नेहा की बात को राहुल ने अनसुना कर दिया। ट्रेन आने पर जैसे ही नेहा चलने के लिए उठी, राहुल ने उसका बैग पकड़ लिया। नेहा ने बैग छुड़ाने की कोशिश की लेकिन राहुल ने उसे जाने नहीं दिया। नेहा को समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर राहुल ऐसा क्यों कर रहा है। बार-बार बैग पकड़ के रोकने और नेहा की जाने की जिद अगले दस-पंद्रह मिनट तक चलती रही। इस दौरान कई ट्रेनें निकल गईं। प्लेटफाॅर्म पर खड़े लोग भी अब इन दोनों की ओर देखने लगे थे। अब तक नेहा का पारा चढ़ चुका था। उसने गुस्से भरी आंख से राहुल की ओर देखा और कहा- देखो, अगर इस बार तुमने मुझे रोकने की कोशिश की तो मैं बैग यहीं छोड़ दूंगी।
नेहा के गुस्से को राहुल ने भांप लिया। उसने नेहा का बैग छोड़ दिया। इस बार मेट्रो का दरवाजा खुलते ही नेहा झट से चढ़ गई लेकिन, जब तक राहुल भीड़ को ढकेलता हुआ अंदर जाता दरवाजा बंद हो गया। ये देख कर नेहा को जोर की हंसी आ गई। उसने बंद होते दरवाजे के पीछे से राहुल को चिढ़ाते हुए बाय का इशारा किया। दरवाजा बंद हुआ और मेट्रो धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगी। नेहा की बोगी राहुल से दूर खिसकती हुई उसकी आंखों से ओझल हो गई।
राहुल कुछ मिनट तक प्लेटफाॅर्म पर गुमसुम सा खड़ा रहा। फिर अचानक जैसे उसे कुछ याद आया और उसने तुरंत जेब से मोबाइल निकाला और नेहा को फोन लगा दिया। फोन उठते ही उसने कहा- अगले स्टेशन पर उतर जाना, मैं पीछे वाली मेट्रो से आ रहा हूं।
उधर से नेहा ने कहा- ठीक है...
आमतौर पर एक से दूसरे मेट्रो स्टेशन की दूरी तीन से चार मिनट की होती है, लेकिन राहुल को ऐसा लगा जैसे जानबूझकर इन दो स्टेशनों की दूरी को आज अचानक बढ़ा कर कई घंटो का कर दिया गया है। अगले स्टेशन पर पहुंचते ही राहुल तेजी से बोगी से बाहर आया और चारों ओर देखने लगा। नेहा उसी बोगी के ठीक सामने खड़ी थी...

इस कैरेक्टर को समझने में उसे मजा आने लगा था

पिछले दो दिनों से जय की परेशानी बढ़ती ही जा रही थी, क्योंकि नेहा कुछ भी साफ-साफ नहीं कह रही थी। जय ने तय कर लिया कि आज वो जवाब लेकर ही मानेगा। दोनों दोपहर का खाना खा रहे थे कि तभी जय ने रोटी उठाते हुए जल्दी से कहा- खाने के बाद चाय पीने चल सकते हैं क्या?
नेहा खाने में व्यस्त थी। अचानक ये सवाल सुन उसे थोड़ा अजीब सा लगा लेकिन उसने कुछ जवाब नहीं दिया। वो खाने में लगी रही। इस दौरान जय की थाली में रोटियां खत्म हो गई थीं। उसने बिना पूछे नेहा की थाली में से एक रोटी उठा ली। नेहा ने गुस्से में उसकी ओर देखा और बोली- रोटी मांग भी सकते थे, मेरी थाली में से क्यों उठाई।
जय कुछ बोला नहीं, बस मुस्कुराते हुए रोटी खाता रहा। नेहा को भी हंसी आ गई। नेहा ने जय की ओर सब्जी का डब्बा बढ़ाते हुए कहा- बींस की सब्जी लाई हूं, चटपटी बनी है, चाहो तो टेस्ट कर सकते हो।
जय ने उसका टिफिन उठाया और पूरी सब्जी अपने प्लेट में उड़ेल ली। इससे पहले कि नेहा उसे रोकती टिफिन खाली हो चुका था। नेहा ने नाराज होने का सा चेहरा बनाया और बोली- तुम्हें कुछ समझ मंे भी आता है, अब मैं बाकी बची रोटी कैसे खाउंगी...सूखा?
जय- मुझे क्या पता कि तुम्हें और सब्जी चाहिए। अगर ऐसा था तो देते वक्त ही बता देती, फिर तुमने मुझे रोका क्यों नहीं।
नेहा- अच्छा, तो आपको अगर कोई कुछ आॅफर करे तो उसे पूरा चट कर जाइए। यही सीखा है आपने।
जय ने मुस्कुराते हुए कहा- क्या करू... गांव से हूं ना, शहर के तौर-तरीके सीखने में थोड़ा वक्त तो लगेगा ही।
जय की बात सुन नेहा को हंसी आ गई। अगले दो मिनट तक दोनों बिना कुछ बोले खाना खाते रहे। नेहा ने निगाह बचाते हुए जय की ओर देखा। वो खाने में तल्लीन था। नेहा फिर से खाने में ऐसे लग गई जैसे उसने जय को देखा ही नहीं। निवाला मुंह में डालते हुए उसने जय से पूछा- आज खाना खाने के बाद ही चाय क्यूं पीनी है?
जय- बस, यूं हीं... तुमसे कुछ बात करनी है।
नेहा- बात तो रोज ही होती है... आज ऐसा क्या अर्जेंट आ गया कि चाय पर चर्चा करने की नौबत आ गई?
जय- देखो अगर तुम्हें चलना है तो बताओ, अगर नहीं चलना चाहती तो मैं कोई जबरदस्ती तो कर नहीं सकता तुम्हारे साथ।
नेहा- हम्म....ऐसा कुछ करने की कभी सोचना भी मत। अच्छा रोओ मत... चलते हैं। अब खाना निपटाओ पहले।
जय ने थोड़ी राहत महसूस की क्योंकि उसे लग नहीं रहा था कि नेहा इतनी आसानी से तैयार हो जाएगी। हाथ धुलने के बाद दोनों चाय पीने चल दिए।
रास्ते में जय ने कहा- अच्छा, ये बताओ.... राहुल में ऐसी क्या बात थी कि तुम उस पर इतना भरोसा करने लगी थी?
सवाल सुनने के बाद भी नेहा चलती ही रही... उसने कोई जवाब नहीं दिया। चाय की दुकान पर पहुंच कर जय ने दो कप चाय ली और दोनों नीम के पेड़ के नीचे खड़ी एक कार की टेक लेकर खड़े हो गए। तेज धूप और उमस के चलते गर्मी अपने चरम पर थी। नेहा का पूरा चेहरा लाल हो गया था। पसीने के चलते उसके सिर के बाल माथे पर चिपक रहे थे। चाय पीने का उसका बिल्कुल भी मन नहीं था, लेकिन पता नहीं क्यों मना नहीं कर पाई।
जय ने बात छेड़ते हुए कहा- अगर जवाब नहीं देना चाहती हो तो कह दो.... आगे से मैं कुछ पुछूंगा ही नहीं।
नेहा को इस बात पर गुस्सा आ गया। उसने कहा- तुम्हारे साथ यही प्राॅब्लम है। तुम्हें ये क्यों लगता है कि कोई बोल नहीं रहा है तो वो तुमसे नाराज ही है। क्या किसी के पास दुनिया में और कोई परेशानी नहीं हो सकतीा?
जय को नेहा की इस बात पर हंसी आ गई। उसने कहा- अच्छा, ये सब छोड़ो... तुम तो मेरे सवाल का जवाब दो अब...
नेहा जय की ओर देख कर कुछ सोचने लगी। कुछ मिनट सोचने के बाद उसने कहा- देखो, मैं ये दावा नहीं कर सकती कि मैं उसे पूरी तरह समझ ही गई थी लेकिन, हम दोनों के बीच शुरुआत कुछ अजीब थी।
शुरु में हम शायद ही कभी बात करते। वो हर समय किसी न किसी बात पर मुझे डांटने की फिराक में रहता। लेकिन अचानक पता नहीं क्या हुआ कि उसने मुझे डांटना बंद कर दिया। वो मुझसे बात करने के ज्यादा से ज्यादा मौके तलाशने लगा। पहले चाय से लेकर खाने जाने तक किसी बात के लिए वो मुझसे पूछता तक नहीं था लेकिन, अब जितनी बार भी बाहर जाता मुझे साथ चलने को कहता।
सच कहूं तो मैं थोड़ा डर गई थी। किसी भी लड़की को ऐसे मौके पर जो डर होता है वो मुझे भी था। मैं इतना परेशान रहने लगी कि मैंने कई लोगों से इस बारे में बात भी की और इसे समझने की कोशिश भी की, लेकिन मुझे कहीं से कोई सही जवाब नहीं मिला। या शायद मैं किसी को अपनी बात ठीक से समझाा ही नहीं पाई।
लेकिन मेरा ये डर धीरे-धीरे कम होने लगा, क्योंकि जब भी मैं उसके साथ कहीं गई, मुझे कुछ न कुछ सीखने को ही मिला। वो हमेशा ये कोशिश करता कि मैं ऐसे कामों में ज्यादा से ज्यादा हिस्सा लूं ताकि मेरा एक्सपोजर बढ़े और मैं करियर में कुछ बेहतर कर सकूं।
राहुल से शुरुआती मुलाकात की बात बताते वक्त नेहा के चेहरे पर जो तनाव था वो खत्म हो चुका था। तेज गर्मी के बावजूद अब उसके चेहरे पर सुकून की छांव ने अपना डेरा डाल लिया था। उसकी बातों से ऐसा लगा जैसे राहुल के व्यवहार में आए बदलाव से शुरु में वो भले ही परेशान थी, लेकिन जल्द ही उसे लगने लगा कि इसमें कुछ तो है जो औरों से अलग है। राहुल के इस अजीब से कैरेक्टर को समझने में नेहा को मजा आने लगा था।
नेहा ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा- राहुल अक्सर अपनी बात मुझ पर थोपने की कोशिश करता, ये बात मुझे बुरी लगती लेकिन उसकी बातों को पूरी तरह से काटना या सिरे से खारिज करना आसान नहीं था। कुछ चीजों पर उसका नजरिया मुझे चैंका देता। जैसे, एक दिन उसने कहा- देखो ये जरूरी नहीं कि अगर उम्र में कोई तुमसे बड़ा है तो वो तुमसे ज्यादा समझदार ही होगा। ये बात रिश्तों पर भी लागू होती है, चाहे वो मां-बाप ही रिश्ता क्यों न हो।
ये बात कहते हुए नेहा के होटों को एक चंचल सी मुस्कुराहट छूकर चुपके से निकल गई। इसके बाद नेहा ने एक-एक कर उन घटनाओं को याद करना शुरु किया जिसने राहुल के बारे में उसकी सोच को बदला था...

कुछ-कुछ बदलने लगी वो

पिछले दो दिन से जय को न जाने क्यों ये लग रहा था कि नेहा किसी बात पर उससे नाराज है। कहने को वो दोनों रोज वैसे ही मिल रहे थे जैसे मिलते थे लेकिन, अचानक कुछ बदल सा गया था दोनों के बीच। जय इस बात को लेकर बेचैन था लेकिन, नेहा को जैसे कोई फर्क ही नहीं पड़ता था इन बातों का। किसी बात पर ओवर-एक्साइटेड हो जाना या बहुत खुश हो जाने की नेहा की आदत बहुत आम है जिसे उसके साथ काम करने वाले सभी जानते हैं। लेकिन, कौन सी बात उसे बुरी लगी या किस बात पर वो हर्ट हुई है, इसे समझना बहुत मुश्किल था।
इतने दिनों से साथ रहते-रहते जय उसकी इस आदत को थोड़ा-थोड़ा समझने लगा था। लोग भले ही कहें कि लड़कियों के नखरे बहुत होते हैं लेकिन, नेहा में नखरे जैसी कोई बात नहीं थी। अगर उसे कोई बात बुरी लगती तो रिऐक्ट करने की जगह वो उसे ऐसे इग्नोर कर देती जैसे उसने कुछ सुना ही नहीं। जबकि, नेहा के उलट जय किस बात पर खुश है ये जानना मुश्किल होता। हाँ, कुछ भी बुरा लगने पर वो इतना आग-बबूला हो जाता कि फिर उसे ब्रह्मा भी नहीं संभाल सकते। नेहा ने कई बार उसे समझाया भी कि इतना टेंशन क्यों लेते हो। वो मजाक में जय से ये भी कहती कि टेंशन लेने से बाल जल्दी सफ़ेद हो जाते हैं और मोटापा भी बढ़ता है क्योंकि, जय इन दोनों समस्याओं से परेशान था।
हालांकि, नेहा की संगत का असर जय पर दिखने लगा था। अब वो अपने गुस्से पर काबू करना या उसे इग्नोर करना सीखने लगा था। उसे ये बात बुरी लगती कि नेहा किसी बात पर नाराज नहीं होती लेकिन, वो छोटी-छोटी बातों पर बच्चों की तरह मुंह फुला लेता है। लेकिन इस दौरान अजीब बात ये हुई कि पिछले कुछ दिनों से नेहा का स्वभाव बदलने लगा था। अक्सर वो जय को किसी न किसी बात पर डांट देती या उसे चुप करा देती। इसका असर ये हुआ कि अब जय कुछ भी बोलने से पहले ये जरूर सोचता कि कहीं ये बात उसे बुरी न लग जाए। पता नहीं क्यों, लेकिन अब वो नेहा से थोड़ा-थोड़ा डरने लगा था।
इसलिए आज दोपहर में जब दोनों चाय पी रहे थे तो जय ने पहले नेहा को टटोलने की कोशिश की कि कहीं वो नाराज तो नहीं है। इत्मीनान होने के बाद उसने कहा- पता है इंसान के साथ दिक्कत क्या है? वो हर जगह अपना दिमाग लगा देता है। लोगों को ये गलतफहमी रहती है कि गाड़ी में हैंडल या स्टेयरिंग ही सबसे जरूरी होती है क्योंकि, वही तय करती है कि गाड़ी किस दिशा में जाएगी जबकि, इंजन के बिना गाड़ी के किसी पार्ट का कोई महत्व नहीं है। ठीक वैसे ही जैसे दिमाग के बिना तो शरीर जिंदा रह जाता है लेकिन, दिल के बंद होते ही इंसान को मरा हुआ घोषित कर दिया जाता है। अच्छा तुम बताओ, जब शरीर का इंजन (दिल) चलेगा ही नहीं तो हम दिशा देंगे किसे? लेकिन लोग न जानें क्यों कुछ अच्छा होने पर दिमाग की दाद देते हैं और बुरा होते ही इंसान को जज़्बाती कह दिया जाता है।
नेहा ने जय की इस बात का जवाब देने की बजाए पलट कर उससे सवाल कर दिया- तुम कहना क्या चाहते हो? सीधा-सीधा क्यों नहीं कहते, इतना घुमाते क्यों हो बात को?
जय- मैं कहां घुमा रहा हूँ। तुम्हीं कल से मुझे घुमाए जा रही हो। मैंने तुमसे कहा है कि दिमाग वहां लगाया करो जहां लगाना चाहिए। लेकिन तुम्हें तो ये दिखाना है कि तुम्हारे पास किसी से कम दिमाग थोड़े ही है।
ये सुनते ही नेहा के चेहरे पर तनाव पसर गया। उसने खीजते हुए कहा- देखो, मुझे नहीं पता तुम क्या सोचते हो लेकिन, तुम्हे कोई कहानी नहीं मिली तो उसके लिए मैं क्या करूँ। मुझे जो समझ में आया मैंने वो कहा... क्या कोई जबरदस्ती है कि मैं वही कहूं जो तुम्हें अच्छा लगे या तुम्हारे काम का हो। मैं इंसान हूँ, कोई मशीन नहीं।
नेहा की आवाज में आए इस तीखेपन को जय ने भांप लिया। वो समझ गया कि दिल और दिमाग वाली बात नेहा को बुरी लगी है। इससे पहले कि जय बात को संभालता नेहा ने इशारा कर दिया कि वो बातचीत को और आगे नहीं बढ़ाना चाहती। उसने जय से बोला- मैं निकल रही हूँ, मुझे कुछ काम है इसलिए जल्दी जाना होगा।
इतना कहते हुए वो सीढ़ियों की ओर बढ़ी और तेजी से नीचे उतर गई। जय कुछ देर तक वहीं खड़ा रहा, उसने जेब से सिगरेट निकाली, सुलगाया और कुछ सोचने लगा...

लड़कों को ये सब कहां झेलनी पड़ता है

जय- तुम्हे रोज-रोज एक ही काम करते हुए ऊब नहीं होती?
नेहा- होती तो है पर क्या करूं।
जय- कभी सोचती नहीं कि इससे छुटकारा मिलना चाहिए?
नेहा- सोचने से थोड़े ही छुटकारा मिल जाता है।
जय- फिर...
नेहा- असल में तुंम्हारे पास तो और कोई काम है नहीं। ऑफिस से फ्री होने का बाद भी तुम इन्हीं बातों में उलझे रहते हो, क्योंकि तुम्हे घर, बीवी-बच्चे या किसी और काम का टेंशन लेना नहीं पड़ता।
तुम्हे पता है यहां से निकलने के बाद मैं घर भले ही पहुंच जाऊं लेकिन, ग्यारह बजे रात के पहले अपने कमरे में नहीं जा पाती। तो फिर ये ऊल-जलूल सोचोगे कब? बड़ी मुश्किल से पांच-छह घंटे की नींद मिल पाती है, आंख खुलते ही ऑफिस जाने का टेंशन। लड़कों को ये सब परेशानी कहां झेलनी पड़ती है।
तुम्हे क्या है? रूम पर पहुंचे, खाना ऑर्डर किया और पसर गए। फिर तुम चाहे रोज एक कहानी लिखो, दो मैग्जीन पढ़ो, यू-ट्यूब पर गुलज़ार का इंटरव्यू सुनो या ग़ालिब के शेर पढ़ो। तुम्हें तो कोई बोलने या रोकने वाला है नहीं?
यहां तो ऑफिस से जाने के बाद भी अगर कुछ पढ़ने की कोशिश करो तो लगता है पता नहीं कौन सा गुनाह कर रहे हैं? आपके सामने आपसे बड़ा काम करे और आप बैठ कर किताब पढ़ो ये भी तो अच्छा नहीं लगता।
जय- हां, बात तो तुम्हारी सही है। अच्छा तुम्हें ये क्यों लगता है कि मेरे पास फैमिली नहीं है इसलिए मुझे काम से ऊबने का खयाल आता है? या मैं कुछ नया करने की सोचता हूं।
नेहा- हां, क्योंकि अगर फैमिली होती तो इतना वक्त ही नहीं मिलता तुम्हें कि ये सब तुम सोच पाते?
जय- तो क्या तुम ये कहना चाहती हो कि फैमिली में उलझे रहना ही ठीक है। ताकि करियर, प्रोफेशन, इनोवेशन इन सब के लिए कोई जगह ही न बचे जीवन में? यानी जो लोग इन चीजों में अपना समय लगाते हैं वो बेकार लोग होते हैं?
नेहा- लेकिन ऊबने से क्या होगा? मैं ऊब के नौकरी छोड़ दूं और घर बैठ जाऊं। मुझे वक़्त बर्बाद करना बिल्कुल पसंद नहीं है। और घर पर बैठने से क्या होगा? दिन भर वही सब... घर साफ करो, चाय बनाओ, मेहमान आएं तो उनकी आवभगत करो... बस।
छोड़ने से पहले कुछ करने का प्लान भी तो होना चाहिए। जिनके पास कोई प्लान होता है वो उलझते या सोचते नहीं, बल्कि छोड़ देते हैं। न ही इस तरह की बहस में अपना टाइम खराब करते हैं।
जय- लेकिन प्लान, आइडिया या कोई नया रास्ता आसमान से तो टपकता नहीं। जिन्हें मिलता होगा वो भी तो इसी तरह की उलझन से गुजरते होंगे और इससे निकलने के रास्ते के बारे में इस हद तक सोचते और करते होंगे कि उन्हें कुछ न कुछ मिल ही जाता होगा। कहा भी तो जाता है कि खोजने से तो भगवान भी मिल जाते हैं।
नेहा- हां, शायद तुम ठीक कह रहे हो। मुझे भी पहली नौकरी ऐसे ही मिली थी। मेरी पढ़ाई खत्म हो गई थी और घर वालों ने साफ कह दिया था कि अगर नौकरी नहीं मिल रही है तो घर वापस आ जाओ। यहीं रह कर नौकरी ढूंढना, ऐसा नहीं है कि यहां नौकरी नहीं मिलेगी। लेकिन मैं घर वापस नहीं जाना चाहती थी, इसलिए नौकरी पाने के लिए मैंने अपनी ताकत लगा दी और मुझे नौकरी मिल ही गई दिल्ली में।