Wednesday, 29 August 2018

दोनों के बीच झगड़ा तो आम बात थी

पिछले डेढ़ सालों में बहुत कुछ हुआ। जय और नेहा के बीच।

दोनों के बीच झगड़ा तो आम बात हो गई थी। महीने के 15 दिन तो मुंह फुलाकर और बिना किसी बातचीत के ही बीतते। अक्सर बहुत छोटी-छोटी बात पर दोनों की बातचीत बंद हो जाती।

एक दिन तो जय सिर्फ इस बात पर गुस्सा हो गया कि नेहा ने उसके साथ चाय पीने जाने से मना कर दिया। उसने कई दिन तक नेहा से बात नहीं की।

जय का न बोलना नेहा को परेशान करता था लेकिन, वो कभी कहती न थी। हां, जय को मनाने की कोशिश वो जरूर करती।

आखिर, नेहा की किसी न किसी बात पर जय हंस पड़ता और दोनों की फिर से दोस्ती हो जाती।

बच्चों की तरह दोनों का रूठना-मनाना यूं ही चलता रहा और वक़्त गुजरता रहा।

इंसान ने अपने इर्द-गिर्द लोक-लाज, तहज़ीब, शर्म-हया, रिश्ते-नाते, पद-प्रतिष्ठा की ऐसी दीवारें खड़ी कर ली हैं जिनमें दरवाज़ा तो दूर, खिड़की बनाने की सोच भी उसे अपराधबोध से भर देती है।

शायद, ये अपराधबोध ही जय और नेहा के बीच एक कॉमन चीज है। पिछले डेढ़ सालों में इस अपराधबोध ने कई बार दोनों को दूर भी किया और पास आने को मजबूर भी।

कई पीढ़ियों ने सदियों से चले आ रहे जिस रिवाज़ के आगे मुंह तक नहीं खोला उसे दो इंसान चुनौती दे दें.... क्या इतनी हिम्मत करना ही किसी लड़की के मर्दानी होने का सबूत नहीं है। एक प्यारी सी लड़की के इस फौलादी इरादे ने ही जय को नेहा का मुरीद बना दिया है।

अब दोनों का मिलना-जुलना ना के बराबर रह गया है। इंसानी रिश्तों को रीति-रिवाज़ों की चुनौतियां मिलना कोई नई बात नहीं है।

जय उससे मिलना चाहता है लेकिन, नेहा टालने की हर कोशिश करती है।
फिर भी जय को अगली मुलाकात का इंतज़ार है...

...उस एक डर के चलते खुद को व्यक्त नहीं होने देती मैं

प्रोफेसर की स्पीच सुनने के बाद उसने बस इतना ही कहा- क्या जरूरी है कि कंटेंप्रेरी वुमन ऐसी ही होनी चाहिए जो मर्दाें की तरह जिंदगी जीना चाहे? यानि वो सबकुछ जो मर्द कर सकते हैं या करते हैं वही सबकुछ एक औरत भी करना चाहती है। तुम्हारे प्रोफेसर के हिसाब से कंटेंप्रेरी वुमन की ये परिभाषा हो सकती है लेकिन, मुझे लगता है कि अपनी परंपराओं से जुड़ी हुई लड़की भी कंटेंप्रेरी हो सकती है।
जय ये सब ध्यान से सुन रहा था और देखना चाहता था कि नेहा इस मसले पर किस तरह रिएक्ट करती है। असल में नेहा को प्रोफेसर के पास ले जाने का उसका मकसद भी यही था। नेहा ने भले ही प्रोफेसर की बात से सहमति नहीं जताई लेकिन, कुछ बातों पर वो सहमत भी थी। उसने माना कि महिलाओं को किसी बात के लिए मनाना या कनविंस करना बहुत मुश्किल होता है जबकि, मर्दाें के साथ ऐसा नहीं है।
नेहा ने अपनी बात के पक्ष में तर्क रखते हुए कहा- औरतों को हर एक बात याद रहती है। वो कोई बात भुलती नहीं। बात कितनी भी पुरानी क्यों न हो समय आने पर वो उसे सुना ही देती हैं। यानि एक बार कोई बात अगर उनके दिमाग में घुस गई तो वो उसे भुला नहीं पातीं।
शायद नेहा ये कहना चाहती थी कि ऐसी कोई भी बात जो औरतों की भावनाओं को छू जाए या उन्हें हर्ट कर जाए वो उसे कभी भुला नहीं पातीं। भले ही कुछ समय के लिए वो उसे दबा लें।
असल में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर ने हाल ही में एक नॉवेल लिखी थी जिसे ऑक्सफोर्ड प्रेस ने प्रकाशित किया था। अंग्रेजी में लिखी अपनी किताब के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि समकालीन औरत यानी कंटेंप्रेरी वुमन का व्यक्तित्व बहुत कुछ मर्द से ही मिलता-जुलता होता है।
प्रोफेसर की इसी बात पर नेहा को आपत्ति थी। जय जानना चाहता था कि आखिर नेहा को इस बात से परेशानी क्यों है कि एक औरत भी मर्द की ही तरह जिंदगी जीना चाहती है। वो सब करना चाहती है जो एक मर्द करता है।
उसने नेहा को कुरेदते हुए कहा- अच्छा तुम्हें नहीं लगता कि लड़कियों को लाड़-दुलार किया जाना बहुत पसंद आता है?
नेहा- हां, लेकिन तुम उसे लाड़-दुलार नहीं कह सकते। असल में उन्हें लोगों का अटेंशन पसंद होता है। वो चाहती हैं कि लोग उसे देखें, उसके बारे में बात करें, उसकी तारीफ करें...
जय- लेकिन तुम्हें नहीं लगता कि औरतों, लड़कियों या कंटेंप्रेरी वुमन के बारे में प्रोफेसर के विचार असल में एकतरफा हैं क्योंकि, किसी औरत या उसके व्यक्तित्व का सबसे सही आकलन खुद एक औरत ही कर सकती है? आखिर कोई मर्द ये दावा कैसे कर सकता है कि वो औरत या कंटेंप्रेरी वुमन को समझता है और वो ऐसी ही होती है जैसा प्रोफेसर साहब बता रहे हैं?
नेहा इस बात को गौर से सुन रही थी और ये समझने की भी कोशिश कर रही थी कि आखिर जय इस बात पर इतना जोर क्यों दे रहा है। क्योंकि अक्सर बातचीत में जय ये बात कह चुका था कि लड़कियों को अपनी बात खुद कहनी चाहिए। अपनी फीलिंग्स और तजुर्बे को दुनिया के सामने रखना चाहिए ताकि लोग ये समझ सकें कि औरत चीजों को किस तरह से देखती है। हालांकि, जय के लाख कहने के बावजूद नेहा उसकी बात टाल ही देती।
आज इसी बहाने नेहा की इस झिझक को वो तोड़ने की एक बार फिर से कोशिश कर रहा था। अपनी बात जारी रखते हुए उसने कहा- अब तुम अपनी ही बात ले लो। मेरे लाख पूछने के बावजूद कुछ सवालों का जवाब तुम कभी नहीं देती। आखिर लड़कियों का कैरेक्टर इतना कॉम्प्लीकेटेड क्यों होता है? आखिर क्यों तुम अपनी भावनाओं को व्यक्त नहीं करती...
नेहा- औरों के बारे में मुझे नहीं पता लेकिन, अपने बारे में मैं ये कह सकती हूं कि मैं दूसरों को अपनी बात ठीक से समझा नहीं पाती... बस इस उलझन के चलते मैं चुप रहना ही बेहतर समझती हूं।
इस जवाब के बावजूद जय को लगा कि नेहा वो बात नहीं कह पा रही है जो वो कहना चाहती है। उसने दूसरे ढंग से वही सवाल दोहराया- लेकिन जब तक तुम कहोगी नहीं तो ये पता कैसे चलेगा कि तुमने सही कहा या गलत?
नेहा- पता नहीं लेकिन मुझे डर लगता है।
नेहा के इस जवाब ने जय को चौंका दिया। वो समझ नहीं पाया कि आखिर इस डर का क्या मतलब है। नेहा के इस जवाब ने जय को सोच में भी डाल दिया। वो ये जानने के लिए बेचैन हो गया कि आखिर कौन सा डर है जो नेहा जैसी पढ़ी-लिखी और सेल्फडिपेंडेंट लड़की को खुद को व्यक्त करने से रोकता है।
अपनी बेचैनी को संभालते हुए उसने खुद को संयत किया फिर हल्के अंदाज में उसने नेहा से पूछा- ये किस तरह का डर है जो तुम्हें अपनी फीलिंग शेयर करने से रोकता है?
जय के इस सवाल को सुन नेहा मुस्कुरा दी लेकिन, उसने कोई जवाब नहीं दिया। जय ने कई बार पूछने की कोशिश की।
उस पूरी रात जय इस बात को लेकर परेशान रहा कि आखिर नेहा को किस बात से डर लगता है। क्या वो इस बात से डरती है कि जय उसकी भावनाओं से खेल सकता है? या शायद नेहा को डर है कि जय उसके बारे में ऐसा-वैसा न सोच ले? या शायद ये कि आखिर जय भी तो एक मर्द ही है... वो ये कैसे मान ले कि जय उन मर्दाें से अलग है जो औरत को सिर्फ एक शरीर मानते हैं...

मंज़िल पर पहुंचने वाले भी तो सफर के बारे में यही कहते हैं...

⁠⁠⁠बारिश के बाद की धूप जितनी साफ होती है उतनी ही तीखी भी लगती है। तीन-चार दिन से लगातार हो रही बरसात के बाद आज निकली तेज धूप ने एक झटके में ही फिर से गर्मी के साथ उमस पैदा कर दी। आसमान में बादलों के झुंड इधर-उधर घुमड़ने से बाज नहीं आ रहे थे लेकिन, सूरज भी आज हार मारने के मूड में नहीं था।
जय और श्रेय खाना खा कर कमरे में आए ही थे कि जय ने चाय पीने की इच्छा जाहिर की। धूप की हालत देखकर श्रेय ने साफ इनकार कर दिया।
जय फिर भी माना नहीं। उसने श्रेय की कमीज उठाकर उसके मूंह पर फेंकते हुए कहा- अबे, मर नहीं जाएगा धूप खाके तू। वैसे तो बड़ा गांव वाला बताता फिरता है सबको, अब क्या हुआ... घुस गई तेरी गंवई...
शर्ट का बटन बंद करते हुए श्रेय ने कहा- देख साले, मुझे पता है तू मानेगा नहीं बिना चाय पीये... मैं चल तो रहा हूं तेरे साथ लेकिन चाय नहीं पियूंगा, सिगरेट पिलाएगा तो बता?
जय- हां, चल पी लेना सिगरेट।
जय जिस भी इलाके में रहा वहां उसकी एक फिक्स चाय की दुकान जरूर होती थी। इसलिए इलाका छोड़ने के बाद उसे कोई और पहचाने या नहीं, चाय वाले शायद ही उसे भूल पाते होंगे। एक चाय वाले को तो उससे इतना लगाव हो गया कि मोहल्ला छोड़ने के बाद कई महीनों तक फोन करके जय से हाल-चाल पूछता था।
अपनी आदत के मुताबिक यहां भी उसने ऐसी ही एक दुकान ढूंढ ली थी। हां, ये अलग बात थी कि वो इस इलाके की सबसे घटिया चाय पिलाता था। असल में, जय को चाय के टेस्ट से ज्याद इस बात में दिलचस्पी होती कि दुकान में आराम से बैठने और कुछ घंटे गप्प करने की सुविधा है या नहीं। इस लिहाज से भाटिया टी स्टाॅल उसके लिए सबसे मुफीद जगह थी।
जय को आता देख दुकान के मालिक ने दूर से ही आवाज लगाई- अरे सर, आज इस टाइम कैसे आना हुआ। छुट्टी है क्या?
जय- अरे नहीं, भाटिया जी। छुट्टी तो नहीं है लेकिन आज गया नहीं काम पर... और सुनाइए, सब खैरियत तो?
भाटिया- माता रानी का आशीर्वाद है सर। दो चाय दूं?
जय- अरे नहीं, चाय तो मुझे पिलाइये। ये साहब तो सिगरेट लेंगे।
ये कहते हुए जय और श्रेय दुकान के अंदर चले गए। भाटिया की दुकान मोहल्ले के सबसे व्यस्त सड़क पर तिराहे के ठीक सामने थी। इस वजह से यहां हर समय चहल-पहल बनी रहती। जय ने चाय का प्याला लिया और अंदर लगी स्टूल पर बैठ गया। श्रेय खड़े-खड़े सिगरेट के कश मारता रहा और सड़क से गुजर रहे खूबसूरत चेहरों के साथ नजरों की वर्जिश करने लगा।
सिगरेट का कश छोड़ते हुए उसने कहा- जय... तुझे नहीं लगता चाय की दुकान के साथ अगर भाटिया जी गोल-गप्पे खिलाने लगें तो इनके यहां चाय पीने वालों की संख्या बढ़ जाएगी और इनकी आमदनी भी?
ये सुनते ही भाटिया हंस पड़ा। बोला- अरे भाई साब, कहां लफड़ों में फंसा रहे हैं... चाय से इतना मिल जाता है कि घर-परिवार आराम से चल जाता है। पांव पसारने के साथ परेशानी भी तो बढ़ती है सर, वो कौन झेलेगा।
श्रेय- हां, वो तो है भाटिया जी। वैसे भी परेशानी बढ़ाने से मिलता ही क्या है जिंदगी में... है के नहीं?
भाटिया- बिल्कुल भाई साब।
इन दोनों की बातचीत से बेखबर जय अपने मोबाइल में लगा हुआ था। श्रेय ने उसे आवाज लगाते हुए पूछा- क्या भाई साब, चलें अब... कि यहीं पूरा दिन बिताने का इरादा है।
जय ने कोई जवाब नहीं दिया। हाथ से इशारा करते हुए पांच मिनट रुकने को बोला। तब तक श्रेय उसके पास पहुंच गया और पालथी मार कर जय के बगल में बैठ गया।
दोपहर होने की वजह से चाय की दुकान पर इन दोनों के अलावा कोई और कस्टमर नहीं था। भाटिया भी अपनी कुर्सी पर बैठा ऊंघ रहा था।
श्रेय ने जय से पूछा- यार देख तेरे पास न तो प्रेमिका है और न पत्नी लेकिन, मेरे पास कम से कम एक चीज तो है और मुझे उसका ख्याल रखना पड़ता है। शादी जो की है। तो, मैं तो चला अपने घर.... तू रह अपनी इस चाय और भाटिया की दुनिया में।
जय ने मोबाइल बंद किया और श्रेय की ओर देखते हुए बोला- देख भाई, तू दुनिया का पहला मर्द तो है नहीं जिसके पास पत्नी है। न ही मैं दुनिया का अकेला ऐसा इंसान जिसके पास प्रेमिका या पत्नी में से कोई नहीं है। हम दोनों में से अनोखा तो कोई नहीं है....ये तो तू मानेगा, बोल हां या ना?
श्रेय- हां, चल मान लिया फिर...
जय- रही बात मेरे पास क्या है क्या नहीं ये तूझे कैसे पता... जब तक मैं ढ़िढोरा न पीटूं, उसके साथ सेल्फी लेकर मोबाइल में सेव न करूं, या फेसबुक प्रोफाइल में ये न लिखूं कि ‘आई एम इन लव‘ तब तक तू या तेरे जैसे दुनियादार ये मानेंगे नहीं कि मेरी जिंदगी में भी प्यार है... क्योंकि प्यार की तो यही परिभाषा है तेरी?
श्रेय- अच्छा चल मान लिया कि ये मेरी परिभाषा है, तो तेरी क्या है भाई... ये भी बता दे तू।
जय- मेरी कोई परिभाषा नहीं है। बस इतना समझ कि इंतजार में जिंदगी गुजारने का अपना मजा है। आखिर में कम से कम ये अफसोस तो नहीं रहेगा कि कुछ दिन और सब्र कर लिया होता... वैसे भी मंज़िल पर पहुंचने वाले यही कहते हैं कि असली ख़ुशी तो सफर में ही है।
इतना कहते हुए जय उठा और भाटिया को पैसे देते हुए श्रेय से बोला- जल्दी चल, तेरी जिम्मेदारी तेरा इंतज़ार कर होगी...

यार बीवी ही तो है, प्रेमिका थोड़े ही है...

पिछले दो दिन से लगातार हो रही बारिश ने दिल्ली का मौसम खुशनुमा बना दिया था। भीषण गर्मी से मिली इस राहत का मजा लेने के लिए जय ने बालकनी में अपनी आराम कुर्सी और एक टेबल डाल दी थी। रात के लगभग ग्यारह बज रहे थे। कुर्सी पर लगभग लेटे हुए जय ने सामने पड़ी टेबल पर अपने दोनों पैर टिका रखे थे। बारिश बंद हो चुकी थी और धीरे-धीरे बह रही ठंडी हवा का मजा लेते हुए जय आसमान को निहार रहा था। तभी डोर बेल बज उठी।
कुर्सी से उठने का उसका बिल्कुल मन नहीं कर रहा था। घंटी बजाने वाले से वो कह देना चाहता था कि भाई अभी चले जाओ, अभी मैं किसी और दुनिया में खोया हुआ हूं। कम से कम कुछ घंटे तो वहां बिता लेने दो। मगर दिल की बात को कानों से थोड़े ही सुना जा सकता है। इस बीच तीन-चार बार डोर बेल बजाई जा चुकी थी।
जय ने लेटे-लेटे ही आवाज लगाई- आ रहा हूं भाई, इतनी घंटी भी मत बजाओ कि पड़ोसी की रात भी खराब हो जाए।
जय ने किसी तरह खुद को आराम कुर्सी से निकाला और दरवाजा खोलने पहुंच गया। दरवाजे के उस पार उसके परम मित्र श्रेय सिंह खड़े थे। दरवाजा खुलते ही श्रेय ने कहा- अबे मर गया था क्या? साला पिछले दस मिनट से घंटी बजाए जा रहा हूं, कोई सुनने वाला ही नहीं है जैसे...
ये बड़बड़ाते हुए श्रेय बालकनी में पहुंच गया और आराम कुर्सी पर पसर गया। जय दरवाजा लगा कर सीधे किचन में चला गया। दो गिलास और पानी की बोतल लेकर वो भी बालकनी में आ गया। टेबल पर सामान रख कर उसने कमरे में से एक कुर्सी खिंची और श्रेय के बगल में ही बैठ गया।
श्रेय- क्या भाई, सुना है आजकल बड़ी राइटिंग-वाइटिंग कर रहा है तू। साले टाइम पास के लिए और काम नहीं मिला तुझे।
श्रेय अपनी बात कहते-कहते थोड़ा सीधा होकर बैठ गया और टेबल पर रखे दोनों गिलास में पानी भरने लगा। एक गिलास जय को बढ़ाने के बाद उसने पानी पीया और जय की ओर देखने लगा।
जय ने पानी का गिलास वैसे ही वापस टेबल पर रख दिया और सिगरेट जलाने लगा। सुलगती हुई सिगरेट उसने श्रेय की ओर बढ़ा दी।
श्रेय ने सिगरेट का कश छोड़ते हुए कहा- खैर, छोड़ तू ये फालतू की बातें। तुझे एक खुशखबरी सुनाता हूं... मेरा प्रमोशन हो गया है और सैलरी भी डबल हो गई है मेरी।
ये सुन के जय ने कुछ खास रिएक्शन नहीं दिया तो श्रेय को बुरा लगा। उसने कहा- साले, जल गया ना। लेकिन तू घबरा मत, तेरा भी कुछ कराता हूं मैं।
इस बीच जय कुर्सी से उठ कर बालकनी में टहलने लगा। हल्की-हल्की बूंदा-बांदी फिर से शुरू हो गई थी। जय अभी नौकरी और इस तरह की बातचीत के बिल्कुल मूड में नहीं था। वो चाह रहा था कि श्रेय कुछ और बात करे लेकिन, उसे तो आज अपने प्रमोशन की खुशी के आगे कुछ सूझ ही नहीं रहा था।
अपनी खुशी में मदमस्त श्रेय आराम कुर्सी छोड़ खड़ा हो गया और जय के साथ टहलने लगा। कुछ मिनट तक दोनों सिगरेट के कश मारते रहे और सामने वाली छत पर खड़ी उन लड़कियों को देखते रहे जो हल्की-हल्की हो रही बारिश का मजा ले रही थीं।
इस बीच श्रेय ने जय के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा- यार, पता है तूझे... मैं आज भी मुखर्जी नगर वाले उस घर को मिस करता हूं जिसमें तू, मैं और अमित रहते थे। साला छोटे से उस घर में सिर्फ अमित कमाता था और हफ्ते के आखिर में पार्टी का खर्चा भी बेचारा वही उठाता था। और पार्टी भी क्या... किसी दिन मटर पनीर तो किसी दिन मुर्गे की शामत। साला आज सब कुछ होने के बावजूद उन रातों को भूल नहीं पाता। देख ना... आज भी अपने प्रमोशन की असली खुशी मुझे तभी मिली जब तूझे ये बात बताई।
श्रेय ने जय को रोकते हुए पूछा- तू नहीं मिस करता उन दिनों को?
जय ने जवाब देने की बजाए श्रेय से ही सवाल पूछ दिया- अच्छा चाय पियेगा तू... मेरा तो बहुत मन कर रह है?
श्रेय- हां, पी लूंगा। तेरे साथ रहने वाला कभी चाय पीने से बच सका है, जो मैं बच जाऊंगा।
दोनों किचन की ओर चल दिए। जय के फ्लैट में दो कमरे थे और दोनों के बीच छोटी सीे लाॅबी और उसके ठीक सामने किचन। किचन के दरवाजे के सामने ही श्रेय कुर्सी डाल कर बैठ गया। जय ने चाय चढ़ा दी और प्लेट में बिस्कुट निकालने लगा।
श्रेय ने शिकायती अंदाज में जय से कहा- इतनी रात में घर से निकला तो भी पत्नी ताना देने से बाज नहीं आई। कहने लगी, चल दिए अपनी असली प्रेमिका के पास...
इतना कहते हुए श्रेय का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। उसने दांत पीसते हुए कहा- साला पत्नियों को पता नहीं क्या खुन्नस रहती है अगर आप अपने दोस्तों के साथ टाइम पास करो तो।
जय ने चाय की प्याली श्रेय को पकड़ाते हुए कहा- क्यों नहीं परेशानी होगी उसे... आखिर तेरी बीवी है। उसका हक बनता है तुझ पर... और तू है कि अपनी खुशी बांटने के लिए यहां चला आया।
श्रेय अब तक गंभीर हो चुका था। उसने चाय खत्म कर प्याला टेबल पर रखा और गहरी सांस लेते हुए कहा, हां, यार बीवी ही तो है... प्रेमिका थोड़े ही है वो मेरी...
ये सुनते ही जय को लगा जैसे किसी ने उसे जोर से धक्का दिया हो। उसके प्याले से चाय छलक कर जमीन पर जा गिरी। जब तक जय खुद को संभालता श्रेय जा चुका था...

अपनी मां को इतना परेशान क्यों करते हो तुम...

जय और नेहा लंच के लिए तैयार ही हो रहे थे कि तभी जय का फोन बज उठा। स्क्रीन पर ‘घर‘ लिखा हुआ था। जय ने घर के लैंड लाइन का फोन नंबर इसी नाम से सेव किया हुआ है। ऐसा कम ही होता है कि जय को इस वक्त घर से फोन आए क्योंकि, उसने घर वालों को बोल रखा है कि दिन में उसे तभी फोन किया जाए जब कुछ बहुत अर्जेंट या जरूरी हो।
जय ने फोन उठाया। उधर लाइन पर जय के कोई रिश्तेदार थे, जय ने जैसे ही हैलो किया उन्होंने कहा- तुम्हारे मां की तबियत ठीक नहीं है, कल से ही तुम्हें बुला रही हैं।
इतना सुनते ही जय फोन लेकर नेहा से थोड़ा दूर चला गया। उसने कहा- मां से बात कराइए मेरी।
मां के हैलो बोलते ही जय की आंख भर आई। आवाज सुनते ही वो समझ गया कि उनकी तबियत काफी खराब है, वो ठीक से बोल भी नहीं पा रहीं थीं। जय उन्हें नमस्ते भी नहीं बोल पाया। उधर से मां ने ही कहा- बेटा अगर आॅफिस में कोई परेशानी न हो तो एकाध दिन के लिए आ जा, तुझे देखने का बहुत मन कर रहा है।
इतना कह कर मां ने फोन फिर से जय के रिश्तेदारर को पकड़ा दिया। शायद उन्हें रोना आ गया। जय ने फोन पर कहा- मैं आज रात ही चल रहा हूं। सुबह तक आ जाऊंगा।
फोन काटते हुए उसने नेहा को इशारा करके खाने के लिए बुलाया। खाने की मेज पर जय कुछ न कुछ बोलता ही रहता है लेकिन, आज शांत था। नेहा को लगा कुछ गड़बड़ है। कुछ देर बाद उसने ही पूछा- क्या हुआ, घर पर सब ठीक तो है न?
जय खाते-खाते ही बोला- नहीं... मां की तबियत ठीक नहीं है। मुझे आज ही घर निकलना पडे़गा।
नेहा- ठीक है... निकल जाओ।
जय- अरे यार, तुम तो देख ही रही हो आजकल यहां क्या-क्या पंगे फैले हुए हैं।
नेहा- तो क्या हुआ, तुम्हारे न जाने से वो पंगे खतम थोड़े ही हो जाएंगे... अभी जो जरूरी है वो करो।
जय- हां, मैं आज शाम को ही निकलता हूं।
खाना खत्म करने के बाद जय ने कहा- यार एक सिगरेट पीने का मन कर रहा है... चलोगी तुम?
नेहा- हां, चलो.... वैसे भी मेरे मना करने से कहां मानने वाले हो तुम।
नेहा के इस तंज पर जय अक्सर कुछ न कुछ बोलता ही था लेकिन, आज उसका मन कुछ उखड़ा-उखड़ा सा था। वो चुपचाप चलता रहा। नेहा भी बिना कुछ बोले उसके साथ चली जा रही थी।
चाय की दुकान पर पहुंच कर उसने एक सिगरेट ली और सुलगा ही रहा था कि नेहा ने पूछा- तुम्हारी मां तुम्हें देख कर काफी परेशानी होती होंगी.... क्यों?
जय ने आसमान में देखते हुए सिगरेट के कश को ऊपर की ओर छोड़ा। उसने तुरंत जवाब नहीं दिया, कुछ रुक कर बोला- तुम्हें पता है... मैं अपनी मां का सबसे दुलारा बेटा हूं। पिछले आठ साल से मैं घर से बाहर हूं और अकेले ही जिंदगी जी रहा हूं। मेरी मां को लगता है अकेले रहने में बहुत परेशानी होती है, खाना-पीना ठीक से नहीं हो पाता। नौकरी से लेकर घर तक का सारा काम अकेले ही करना पड़ता है.... और न जाने क्या-क्या।
इतना कहने के बाद जय फिर कुछ देर शांत ही रहा। नेहा जय के बाईं ओर खड़ी थी और हवा भी उसी ओर बह रही थी। जय के हाथ में सुलग रही सिगरेट का धुंआ नेहा के चेहरे से होता उसके नाक में जा रहा था। तंग होते हुए उसने कहा- यार, खतम करो इसे और फेंको जल्दी से.... पता नहीं क्या मजा मिलता है इसमें।
जय ने नेहा को अपनी दायीं ओर आने का इशारा किया और खुद उससे थोड़ा दूर हो गया। वो धीरे-धीरे कश लेता रहा और कुछ सोचता रहा। इस चुप्पी को तोड़ते हुए नेहा ने सवाल किया- तो अपनी मां को इतना परेशान क्यों करते हो तुम.... शादी क्यों नहीं कर लेते?
जय ये बात सुनकर हंस दिया। जब उसने कोई जवाब नहीं दिया तो नेहा ने कहा- मैंने कुछ पूछा है तुमसे...
जय- तुम्हें पता है कि हमारे यहां शादियां कैसे होती हैं? बहुत सीधा सिस्टम है... लड़की वाले रिश्ता लेकर आते हैं या लड़के वालों को ही कहीं से पता चलता है। दोनों परिवारों में बातचीत होती है, फिर लड़का-लड़की एक-दूसरे को देखते हैं। कई बार ये पूरा प्राॅसेस दोहराया या तिहराया भी जाता है लेकिन, साल छह महीने के अंदर कहीं न कहीं बात फाइनल हो ही जाती है।
ये कहने के बाद जय रुक गया। उसने सिगरेट का आखिरी कश लिया और बाकी बचे हिस्से को जमीन पर डाल जूते से रगड़ दिया। इस बीच नेहा जय की ओर ऐसे देख रही थी जैसे वो कह रही हो कि अपनी बात पूरी कीजिए।
जय को हंसी आ गई। उसने बात जारी रखते हुए कहा- तुम अगर मुझे गौर से देखो तो ऐसी कोई खास कमी नहीं नजर आएगी मुझमें, जो बाहर से दिख जाए। शादी के समय तो यही देखा जाता है ना। पिछले कई साल से नौकरी में भी हूं और पढ़ा-लिखा भी ठीक-ठाक ही हूं.... अब बताओ, अगर मेरी शादी नहीं हो रही तो इसके लिए मैं कहां से जिम्मेदार हूं? और हां, इससे पहले कि तुम अपना एक्पर्ट कमेंट दो, एक बात और बता दूं... मैंने किसी से ये भी नहीं बोला है कि मैं शादी नहीं करुंगा। आई मीन... मैं स्ट्रेट हूं।
नेहा को जय की इस बात पर हंसी आ गई लेकिन, वो कुछ बोली नहीं। जय ने सिगरेट के पैसे दिए और दोनों वहां से चल दिए। कुछ दूर चलने के बाद जय ने कहा- यार, हम लोगों के यहां ये भी तो मान्यता है न... कि जोड़ियां तो भगवान बनाता है। फिर मेरी वाली कहां चली गई...
नेहा ने मुस्कुराते हुए कहा- हां, लेकिन भगवान जो भी करता है अच्छे के लिए ही करता है...
जय ने हंसते हुए कहा- हां, अब ये मानने के सिवा कोई दूसरा आॅप्शन भी तो नहंी बचता.... आखिरी डेस्टिनी भी तो कोई चीज है.... क्यों?
दोनों एक-दूसरे को देख कर मुस्कुरा दिए।

उस बारिश में भीगना... रह-रह कर सताता है

आज जय का मूड कुछ ठीक नहीं था इसलिए, शाम को उसने अपने एक दोस्त को घर बुलाया और साथ में बीयर की चार केन लाने को भी बोल दिया। शाम सात बजे से दस बजे तक दोनों ने बीयर पी और इधर-उधर की बातें करते रहे। दोस्त के जाने के बाद जय ने कमरे की लाइट आॅफ की और बिस्तर पर यूं ही लेट गया। कपड़े तक नहीं बदले।
लेटने के बाद उसे एहसास हुआ कि धीरे-धीरे नशा चढ़ रहा है लेकिन, नींद नहीं आ रही। रह-रह कर उसकी आंखों के सामने नेहा का चेहरा घूम जाता। जय ने अपना ध्यान कहीं और ले जाने की पूरी कोशिश की लेकिन वो नाकाम रहा। अपने मोबाइल में पड़ी कुछ क्लिप और घर की तस्वीरें देख कर उसने मन बहलाना चाहा लेकिन, उसे लगता जैसे हर तस्वीर में उसे नेहा ही दिखाई दे रही है। तभी अचानक घड़ी पर उसकी निगाह पड़ी, रात के सवा ग्यारह बज रहे थे।
उससे रहा नहीं गया, उसने नेहा को फोन लगा दिया। जय को पूरी उम्मीद थी कि नेहा फोन नहीं उठाएगी लेकिन, तीन रिंग के बाद ही फोन उठा गया। उधर से आवाज आई- क्या हुआ... इतनी रात में फोन क्यों किया?
जय का दिमाग बुरी तरह घूम रहा था। उसे समझ में नहीं आ रहा था कि जवाब क्या दे। जय ने खुद को संभालते हुए कहा- बस यूं ही... तुम सोई नहीं अब तक?
नेहा- हां, बस सोने ही जा रही थी... तो क्या तुमने ये पूछने के लिए फोन किया है? देखो नाटक मत करो.... साफ-साफ बताओ, क्या बात है?
जय को समझ में नहीं आ रहा था कि वो कहे तो क्या कहे। नशे की वजह से उसका दिमाग भी उतनी तेजी से काम नहीं कर रहा था। कुछ सेकेंड चुप रहने के बाद उसने जवाब दिया- बस, मुझे नींद नहीं आ रही थी... तुमसे बात करने का मन किया इसलिए, लगा दिया।
इस दौरान जय को मौका मिल गया और उसने तुरंत बात पलटते हुए कहा- तुमने खाना खा लिया क्या?
नेहा- हां, खाना तो पौने नौ बजे ही खा लिया था। अब सोने जा रही हूं। मुझे भी थोड़ा काम था इसलिए देर हो गई।
तब तक नेहा को अचानक जैसे कुछ याद आ गया। उसने कहा- अच्छा सुनो, जिन तीन किताबों की सुबह तुम बात कर रहे थे, वो तीनों ही किताबें मेरी एक फ्रेंड ने पढ़ी हैं। उसने भी काफी तारीफ की है उनकी। मैंने आज ही आॅनलाइन उन तीनों किताबों का आॅर्डर दे दिया है।
जय ने बात आगे बढ़ाने के लिए बस यूं ही पूछ दिया- किस राइटर की बात कर रही हो तुम?
नेहा- अरे वही, अनिमेश त्रिपाठी।
ये सुनते ही जय हंस पड़ा। उसने फिर से पूछा- क्या नाम बताया तुमने...
तब तक नेहा समझ गई कि उसने नाम गलत बता दिया है। उसने कहा- हां, पता है नाम गलत बताया है मंैने... मुझे लगा तुम ठीक कर दोगे।
इस दौरान जय जोर-जोर से फोन पर हंसता रहा। उसकी हंसी सुन नेहा से भी रहा नहंी गया और वो भी हंस पड़ी। जय बार-बार उससे राइटर का नाम पूछता और हंसने लगता। कुछ देर तक दोनों फोन पर ही खूब हंसते रहे।
हंसते-हंसते जय के आंख से पानी बहने लगा। उसने नेहा से कहा- यार, तुम तो न.... मुंबई निकल जाओ। तुम्हें पता नहीं है कितना टैलेंट है तुम्हारे अंदर। तुम रातों-रात काॅमेडी किंग.... आई मीन, काॅमेडी क्वीन बन सकती हो।
नेहा ने अपनी हंसी रोकते हुए कहा- मैं जहां हूं ठीक हूं। मुझे काॅमेडी किंग या क्वीन नहीं बनना है, समझे तुम। बहुत हंस चुके तुम.... अब चुप हो जाओ।
जय की हंसी अभी भी नहंी रुक रही थी। उसने कहा- एक बार फिर से बताओ न... राइटर का नाम।
इतना कह के वो फिर जोर से हंस पड़ा। उसने नेहा से कहा- यार, तुमने तो दस मिनट में ही मेरा पूरा नशा उतार दिया।
उधर से नेहा कुछ बोली नहीं। अचानक कुछ सेकेंड के लिए दोनों चुप हो गए। जय भी अब सीरियस हो गया। गंभीर आवाज में उसने नेहा से पूछा- यार, एक दिन के लिए मैं तुम्हारे यहां आ जाउं क्या....
नेहा- क्यूं... यहां क्या है?
जय- बस, बहुत दिन से नदी किनारे बैठने का मन कर रहा है। सालों हो गए... जब से काॅलेज छूटा, ऐसा मौका मिला ही नहीं दोबारा। आजकल पता नहीं क्यूं फिर से वहां जा कर बैठने और लहरों को निहारने का मन कर रहा है।
इतना कहने के बाद जय शांत हो गया। नेहा ने भी कुछ नहीं कहा। चंद सेकेंड बाद जय ने ही नेहा से पूछा- तुम चलोगी तो अच्छा लगेगा... कुछ देर वहां बैठेंगे। बगल में ही एक चाय की दुकान है, उस इलाके का सबसे फेमस चाय वाला है वो। हिंदी के कई बड़े साहित्यकारों ने अपनी किताब में इस दुकान का जिक्र किया है। वहां चाय पीने का अलग ही मजा है। बोलो.... तुम चलोगी?
नेहा- नहीं, मेरे घर वाले आए हुए हैं। मैं उन्हें छोड़ के नहंी जा सकती।
जय- अरे, दो तीन घंटे की ही तो बात है... बता देना कुछ काम है। मैं कहां पूरा दिन तुम्हें अपने साथ रहने के लिए कह रहा हूं।
नेहा- नहीं, मैं नहंी जा पाउंगी। तुम अकेले क्यों नहीं चले जाते... और तुम मेरे साथ ही क्यों जाना चाहते हो?
नेहा पहले भी कई बार ये सवाल उठा चुकी थी। अक्सर जब भी जय उससे कहीं चलने को कहता तो वो ये सवाल खड़ा कर देती कि मैं ही क्यूं... तुम किसी और के साथ क्यों नहीं जाते?
शायद अगर नेहा सामने होती तो जय इस बात को इग्नोर कर देता लेकिन, फोन पर ये बात सुनकर उसे गुस्सा आ गया। उसने कहा- देखो, तुम बार-बार ये सवाल क्यों करती हो कि मैं तुम्हारे साथ ही क्यों जाना चाहता हूं। आखिर तुम सुनना क्या चाहती हो?
तुम्हें पता है उस इलाके में ही मेरे सबसे अजीज दोस्त का घर है। मैं जब भी वहां जाता वो मेरे साथ होता था। मुझे उसके साथ वक्त बिताना अच्छा लगता है। वो अब किसी दूसरे शहर में जाॅब करता है और अकेले वहां जाना मुझे अच्छा नहीं लगता।
जय की आवाज थोड़ा तेज हो गई थी। वो गुस्स में था। उसने कहा- मैं तुम्हारे साथ जाना चाहता हूं क्योंकि... तुम्हारे साथ जाना मुझे अच्छा लगता है। क्यों जरूरी है कि हर चीज को एक नाम दिया जाए? क्या नाम देने से ही किसी चीज के सही या गलत होने का फैसला होता है।
नेहा ये सब सुनती रही, लेकिन उसने कुछ जवाब नहीं दिया।
जय बोलता ही रहा। उसने गुस्से में कहा- आखिर, तुमने अपना दिमाग लगा ही दिया। इंसान दिमाग लगाने की अपनी आदत से बाज नहीं आता, कहीं भी...
जय की बात सुनकर नेहा को लगा कि वो गलत बोल गई थी। उसने दबी आवाज में भरे गले से कहा- मैंने कोई दिमाग नहीं लगाया है, मैंने भी दिल ही लगाया है... जिद क्यों पकड़ लेते हो तुम, मैंने कहा न... अभी नहीं आ सकूंगी मैं। जिंदगी खत्म हुई जा रही है क्या? फिर कभी भी तो चल सकते हैं हम...
जय ने को कोई जवाब नहीं दिया। वो नेहा से कहना चाहता था- इसी मौसम में पहली बार मैं वहां गया था। उस दिन दोपहर में ही आसमान को काले बादलों ने ढंक लिया था। नदी के उस पार से ठंडी-ठंडी हवा आ रही थी। कुछ देर में ही बारिश शुरू हो गई। किनारे बैठा देर तक मैं भीगता ही रहा था।
जय बताना चाहता था कि उस बारिश को वो बहुत मिस करता है। वो एक बार फिर से उसी बारिश में भीगना चाहता है... लेकिन उसने नेहा से बस इतना ही कहा- ठीक है, अगर तुम्हारा मन नहीं है तो कोई बात नहीं...

उसके स्माइली फेस पर आज गहरी गंभीरता थी

पिछले कुछ दिनों से जय और नेहा के बीच राहुल आ गया था। नेहा लगातार उसके किस्से सुनाए जा रही थी और जय उन्हें सुनता जा रहा था। उसने महसूस किया कि नेहा की रूह के किसी कोने में राहुल ठहर गया था। तमाम घटनाएं जिनका वो जिक्र कर रही थी, बीते काफी अरसा गुजर गया था... लेकिन जब वो ये सब सुनाती तो लगता जैसे वो आज भी उन्हें जी रही है।
लेकिन आज सुबह से वो शांत थी। हमेशा खिले रहने वाले उसके स्माइली फेस पर आज गहरी गंभीरता पसरी हुई थी। जय ने समझ लिया कि कुछ तो गड़बड़ है। पता नहीं क्यूं लेकिन, जय को नेहा का ये अवतार अच्छा लग रहा था। वो नेहा की एक फोटो खींच लेना चाहता था। ताकि बाद में इसे दिखाते हुए कह सके- देखो, तुम्हारे इस रूप में जो आकर्षण है उसे दिखाने वाला कोई आइना अब तक नहीं बना है।
फिर भी जय ये जानना चाहता था कि नेहा के मन में आखिर चल क्या रहा है। उसकी चुप्पी तोड़ने के लिए जय ने एक सवाल उसकी ओर उछाल दिया- क्या जीवन में कुछ अधूरा रह जाने या उसके छूट जाने का अफसोस नहीं होना चाहिए? तुमने जेएनयू घूमने के दौरान राहुल से यही बात तो कही थी, ‘कुछ और हो न हो... हमें पढ़ाई तो अच्छी जगह से ही करनी चाहिए।‘ क्या तुम्हें इस बात का अफसोस नहीं है?
सवाल करने के बाद जय कुछ देर चुप रहा। वो जानना चाहता था कि नेहा इस बात से कितना सहमत है लेकिन, उसने कोई जवाब नहीं दिया। वो पहले की तरह ही शांत और गंभीर मुद्रा में अपनी जगह बैठी रही। उसके चेहरे के भाव तक नहीं बदले।
जय ने उसे और कुरेदने की कोशिश की- पता नहीं क्यों... लोग ये मानते हैं कि जो छूट गया, जो बीत गया उस पर अफसोस करना गलत है। जबकि सच तो ये है कि जिंदगी की असल सीख उस छूट जाने में ही छिपी हुई है। चलते-चलते अगर हम किसी गलत रास्ते पर आ गए हैं और सही रास्ता पीछे छूट गया है तो क्या हमें पीेछे नहीं जाना चाहिए। गतल रास्ते पर ही जिंदगी भर चलते रहने से तो अच्छा है कि हम थोड़ा पीछे चले जाएं और सही रास्ते को पकड़ लें।
अफसोस करने वाली बात नेहा को हजम नहीं हुई। राहुल ने जब इस बात पर ज्यादा जोर दिया तो नेहा अपनी कुर्सी से उठी और कमरे के कोने में रखे मनीप्लांट के पौधे के पास खड़ी हो उसकी पत्तियों से धूल साफ करने लगी और बोली- लेकिन, इसे अफसोस करना कैसे कह सकते हैं। जरूरी तो नहीं कि आप जिंदगी में जो कुछ सोचें वो सब आपके साथ हो ही जाए। कुछ न कुछ तो हर किसी की जिंदगी में होने से रह ही जाता है।
जय को अच्छा लगा कि नेहा इस बातचीत को आगे बढ़ाना चाहती है। जय अपनी जगह से उठा और एक कुर्सी ले जाकर नेहा के बगल में रख दी। नेहा को बैठने का इशारा कर वो खुद बगल में ही खड़ा हो गया।
नेहा कुर्सी पर बैठ गई तो जय ने कहा- हां, शब्दों का मेरा चुनाव गलत हो सकता है लेकिन, भाव ये है कि जब भी जिंदगी में चुनाव करने का वक्त आता है तो हम मजबूती से खड़े क्यों नहीं हो पाते? ऐसा तो नहीं था कि अगर तुम घरवालों का थोड़ा विरोध करती और थोड़ा सा धैर्य रखती तो तुम्हें वो नहीं मिलता जो तुम पाना चाहती थी।
नेहा इस बात का जवाब देना चाहती थी लेकिन, जय ने उसे रोकते हुए कहा- तुम अपनी बात कह लेना लेकिन, पहले मेरी बात पूरी हो जाने दो।
जय ने थोड़ा तेज आवाज में उत्तेजित होते हुए कहा- पता नहीं क्यूं... लेकिन मुझे ये लगता है कि तुम वो पा सकती थी और तुम्हारी जगह जिसे वो मिला, तुम उससे कहीं ज्यादा बेहतर उस मौके का इस्तेमाल कर सकती थी। हम मोटी फीस चुका कर किसी दोयम दर्जे के संस्थान में पढ़ना स्वीकार कर लेते हैं। मुझे समझ में नहीं आता कि इस तरह के समझौते लोग क्यूं कर लेते हैं। क्या ये हमारी कमजोरी नहीं है?
ये कहते-कहते जय थोड़ा भावुक सा हो गया। नेहा इस बात को समझ गई। उसने हंसते हुए कहा- अरे, तुम तो सेंटी हो गए। इतना टेंशन क्यूं ले लेते हो तुम? जिंदगी खत्म थोड़े ही हो गई है कि अब कुछ हो ही नहीं सकता।
नेहा की इस बात पर जय और भी भड़क गया। उसने गुस्से में कहा- बस... तुम लड़कियों की यही तो प्राॅब्लम है कि जब भी तुम्हारे साथ कुछ गलत होता है तो उसे या तो चुप होके सह लेती हो या आंसू बहा कर निकाल देती हो। उस गुस्से को पालती ही नहीं हो ताकि, वो आग बनके निकले और दूसरों को डरा दे। यही तो कारण है कि लड़कियों को हमेशा दबाया जा सका।
क्यों दुनिया के महान साइंटिस्ट से लेकर आर्टिस्ट या इनोवेशन के किसी भी फील्ड में महिलाओं का नाम रत्ती भर के बराबर है? क्योंकि इस जेंडर ने हमेशा अपनी भावनाओं को दबाने या छिपाने में ही अपनी बहादुरी समझी... कुछ व्यक्त होने ही नहीं दिया, उसे निकलने ही नहीं दिया कहीं।
अब तक जय का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच चुका था। चेहरा तमतमा रहा था और आखों से जैसे आग निकल रही थी। वो और भी बहुत कुछ बोलना चाहता था लेकिन, अचानक चुप हो गया।
नेहा अपनी कुर्सी से उठी और उसकी आंखों में आंख डाल कर देखने लगी। नेहा के चेहरे पर जिस गंभीरता को देख कर जय ने ये बातचीत शुरू की थी वो अब गायब हो चुकी थी। जय को देखकर नेहा मुस्कुरा रही थी... उसकी आंखें फिर से चमकनें लगी थीं।