Wednesday, 29 August 2018

मैं उड़ नहीं पा रही हूं...

आज शाम से ही जय बहुत परेशान था। नेहा ने उससे साफ कह दिया था कि अब वो किसी भी कीमत पर उसके साथ नहीं रहेगी क्योंकि वो उसे जितना कमजोर समझ रहा है वो उतनी कमजोर नहीं है।
जय इस बात से और भी पेरशान हो गया कि इतने दिन साथ रहने के बाद भी वो उस लड़की को नहीं समझ पाया जिसे समझने का वो दावा करता फिरता था। वो सबसे ये कहता था कि मैं उसे जानता हूं, वो आसमान में उड़ना चाहती है... वगैरह-वगैरह। जबकि नेहा कह रही है कि अगर वो उड़ नहीं पा रही है तो ये सिर्फ उसकी कमजोरी है क्योंकि, वो खुद आगे नहीं बढ़ रही है।
नेहा ने कहा कि अगर उसने अच्छे से पढ़ाई की होती तो आज वो भी किसी ऐसी नौकरी में होती जिसमें उसे ज्यादा पैसे मिलते। उसे रोज नए-नए लोगों से मिलने का मौका मिलता। लेकिन जब उसने अच्छे से पढ़ाई ही नहीं की तो फिर वो समाज या अपने घरवालों को कैसे दोष दे सकती है?
आज भी जबकि मेरे पास सारी सुविधाएं मौजूद हैं मैं अपने मन मुताबिक बहुत सी चीजें नहीं कर पा रही हूं क्योंकि मैं उस हद तक नहीं जा पा रही हूं जिस हद तक मुझे जाना चाहिए। इसके लिए मैं समाज को कैसे जिम्मेदार ठहरा सकती हूं।
इतना कहते-कहते नेहा का गुस्सा और भी बढ़ गया और उसने तमतमाते हुए कहा- पिछले छह महीने से मैं गाड़ी चलाना सीखने की सोच रही हूं लेकिन, ये छोटा सा काम भी नहीं कर पा रही हूं तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है? अब मैं कहूं कि इसके लिए भी मेरे घर वाले ही जिम्मेदार हैं या समाज जिम्मेदार है....
जय- नेहा, देखो मैं कुछ और बात कह रहा हूं और तुम उसे कमजोरी और मजबूती पर ले जा रही हो। तुम कह रही हो कि नहीं मैं उतनी कमजोर नहीं हूं जितनी तुम सोचते हो। असल में मैं किसी दूसरी कमजोरी की बात कर रहा हूं, तुम इस बात को क्यों नहीं समझती?
नेहा- तुम किस कमजोरी की बात कर रहे हो फिर....
जय- मैं ये कह रहा हूं कि हमारे आस-पास ऐसा माहौल है जो हमें कमजोर बनाता है और हम इस बात को समझ नहीं पाते। तुम गाड़ी चलाना सिखना चाहो या वो पढ़ाई जो तुम करना चाहती थी नहीं कर पाई, इन दोनों बातों के लिए तुम खुद को जिम्मेदार मानती हो? लेकिन मैं ऐसा नहीं मानता....
नेहा- अच्छा, तो आप क्या मानते हैं?
जय- मैं ये कह रहा हूं कि हमारे सिस्टम में ऐसी कोई व्यवस्था ही नहीं है जो व्यक्ति को समझ सके या उसके असली हुनर को पहचान सके। मुझे पता है कि मैं कोई अनोखी या नई बात नहीं कह रहा हूं लेकिन, इस बात को हम केवल सुनते हैं महसूस नहीं करते।
हम बड़ी आसानी से ये मान लेते हैं कि तुम जो पढ़ाई करना चाहती थी वो इसलिए नहीं कर पाई क्योंकि तुममे वो क्षमता ही नहीं थी। जबकि सच ये है कि हममें से ज्यादातर लोग किसी पढ़ाई को इसलिए चुनते हैं क्योंकि उसमें अच्छे करियर की संभावना होती है।
हमारे सिस्टम में कोई भी बच्चा कौन सी पढ़ाई करेगा वो इस बात से डिसाइड किया जाता है कि उसे दसवीं या बारहवीं में कितने अंक मिले थे। ठीक इसी तरह करियर का फैसला भी इस आधार पर किया जाता है कि उस प्रोफेशन का स्कोप कितना है। कितने का पैकेज मिलेगा वगैरह वगैरह...
मैं बस इतना कहना चाहता हूं कि तुम अगर किसी काम को करने के लिए बिस्तर नहीं छोड़ पा रही हो या उसके लिए कुछ भी कर गुजरने का रिस्क नहीं ले पा रही हो तो उसका कारण बस इतना है कि वो तुम्हारा पैशन या जुनून है ही नहीं। उसे पाने के लिए तुममें पागलपन नहीं है। अगर आप आकर्षक करियर बनाने या ज्यादा पैसे कमाने का सपना देखते हैं और इसे न पाने के बावजूद रोज रात को आपको चैन की नींद आती है तो ये तय है कि वो आपका गोल नहीं है और ये बात हमें हमारा सिस्टम नहीं सिखाता...कमजोरी यहां है, समझी तुम।
ये सुनने के बाद नेहा का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया लेकिन, वो इस बहस को और आगे नहीं बढ़ाना चाहती थी इसलिए वो चुप हो गई। जय ने भी सोचा इतनी रात को इसे और परेशान करना ठीक नहीं है, सो उसने भी कमरे की लाइट आॅफ कर दी।

उस परफ्यूम की खुशबू आज तक नहीं भूल पाई वो

नेहा कुछ सोचते हुए बार-बार अपनी उंगलियों में दुपट्टा लपेटते और सुलझाते इधर-उधर टहल रही थी। रोज की तरह आज भी जय ने ही बात शुरू की- अच्छा तुम्हे क्या लगता है, तुम्हारे मार्क्स दसवीं में तो कम थे फिर बारहवीं में तुमने क्या कर डाला कि तुम फर्स्ट क्लास में पास हो गई?
नेहा - क्या बताऊं.... बस ये समझो कि किसी का जादू था, जो बस छा गया।
ये कहते हुए नेहा का चेहरा खिल उठा। ऐसे, जैसे अचानक किसी ने उसे गुदगुदी कर दी हो। और फिर उसने खुद ब खुद बोलना शुरू कर दिया - मैं गर्ल्स स्कूल में पढ़ती थी। वहां सारी टीचर्स भी फीमेल ही थीं। हम कॉमर्स के क्लास में टीचर का इंतजार कर रहे थे कि तभी एक हैंडसम से शख्स ने क्लास में एंट्री की।
हम सब खड़े हो गए। उन्होंने बड़े ही सलीके से हमें बताया कि आज से वही हमें कॉमर्स पढ़ाएंगे।
जिस वक़्त नेहा ये बात कह रह थी उसे देख के लगा जैसे वो खुद को उन लम्हों में धकेल देना चाहती है। उसकी आंखें चमकने लगीं थीं चेहरा सुर्ख लाल हो गया था।
तभी जय ने उसे कुरेदते हुए चुटकी ली - तुम्हारा चेहरा इतना खिल क्यों गया, अपने कॉमर्स टीचर का नाम लेते ही?
नेहा - क्या बताऊं... अगर तुम मेरी जगह होते तो तुम्हारा भी यही हाल होता। वो थे ही ऐसे। एक-एक टॉपिक को ऐसे समझाते जैसे नर्सरी के बच्चों को कोई अल्फाबेट पढ़ा रहा हो। इसके बाद भी एक-एक लड़की से पूछते, समझ में आया या नहीं?
न जाने कैसे उन्हें ये पता लग ही जाता कि बच्चों को कहीं न कहीं परेशानी है। फिर से उसी टॉपिक को दूसरे ढंग से समझाते। इन सबके बीच न जाने कैसे मैं उनकी फेवरेट स्टूडेंट बन गई।
जब भी कोई टॉपिक रिपीट करना होता या दोबारा समझाना होता तो वो मुझे बुलाते और कहते, अब तुम समझाओ पूरे क्लास को। उनकी पढ़ाने की स्टाइल इतनी अच्छी थी कि जल्द ही गर्ल्स कॉलेज के वो सबसे फेवरेट मेल टीचर बन गए। यहां तक कि जब वो क्लास के बाहर भी किसी को कुछ समझाते तो लड़कियां उन्हें चारों तरफ से घेर लेतीं।
स्टूडेंट्स के उलट कॉलेज की फीमेल टीचर्स को नए कॉमर्स टीचर खटकने लगे। कई बार मैंने अपनी टीचर्स को ये कहते सुना कि देखो, कन्हैया जी कैसे अपनी गोपियों से घिरे हुए हैं।
आर्ट्स और साइंस की लड़कियां तो न जाने क्या-क्या बातें करतीं उनके बारे में। ये तक कहा जाने लगा कि देखो वो लड़की तो अपना दुपट्टा भी ठीक से नहीं रखती उनके सामने। मुझे ये बातें बिल्कुल भी अच्छी नहीं लगती थीं। मुझसे रहा नहीं गया और एक दिन मैंने ये सारी बातें उन्हें बता दीं।
ये कहते हुए नेहा अचानक रुक गई और दुपट्टे को जोर से अपनी उंगलियों में लपेटने लगी। कॉलेज छोड़ने के दस साल बाद भी समाज की उस बेरुखी से वो अब तक आहत थी। उसे बिल्कुल बर्दाश्त नहीं हो रहा था कि जो इनसान दिमाग के रास्ते होते हुए दिल तक में जगह बना ले उसके बारे में कोई इतनी खराब बात कैसे कर सकता है।
नेहा का ये दर्द साफ बयां कर रहा था कि कॉमर्स के उस टीचर ने सफेद चॉक से ब्लैक बोर्ड पर न जाने ऐसा क्या लिखा जिसके निशान अट्ठारह साल की एक युवा और कोमल लड़की के दिल पर ऐसे पड़े कि मिटाने की तमाम कोशिशों के बावजूद आज भी वो जस के तस मौजूद थे। यहां तक कि उस टीचर के परफ्यूम की खुशबू भी उसकी नाकों में अब अब तक बसी हुई थी।
नेहा ने खुद ही बताया कि आज भी जब कहीं उस परफ्यूम की खुशबू नाक में पड़ती है तो वो याद आ जाते हैं।
जय ने देख लिया कि नेहा भले ही छत पर उसके साथ खड़ी है लेकिन, उसकी रूह ग्यारहवीं की उस क्लास में पहुंच चुकी थी जहां वो और उसके फेवरेट कॉमर्स के सर के अलावा और कोई नहीं था। जय ने धीरे से आवाज लगाई - नेहा... क्या हुआ, कहां खो गई?
नेहा - क्या कहूं यार, वो दिन मेरी अब तक की जिंदगी के सबसे खूबसूरत दिन थे।
इतना कहते हुए नेहा की आंखें फिर से चमक उठीं और चहकते हुए उसने बोला - तुम्हें पता है... वो ऐसे अकेले टीचर थे जो मेरे घर तक आए थे। एक दिन उन्होंने मुझे अपनी बाइक से मेरे घर तक छोड़ा।
फिर अचानक ही उसके चेहरे पर तनाव पसर गया। नेहा ने भरे मन से कहा - उस दिन मम्मी ने मुझे सर की बाइक से उतरते देख लिया था। जैसे ही मैं घर में घुसी उन्होंने मुझसे कहा - अगर पापा को पता चला कि तू एक लड़के के साथ स्कूल से घर आई थी तो पता है क्या हाल होगा तेरा?
इतना कहते ही नेहा अचानक चुप हो गई। कुछ देर तक जय भी कुछ नहीं बोला, फिर दोनों अपने-अपने कमरे की तरफ चल दिए।

इतने टेंशन में क्यों रहते हैं आप?

नेहा - तो क्या मैं पापा से बात करूं? 
जय - किस बारे में? 
नेहा - अरे शादी के बारे में और किस बारे में? 
जय - कौन, वो तुम्हारे पापा के दोस्त की बेटी? 
नेहा - हां, लड़की बहुत सुंदर है। 
जय - देखो तुम जानती हो कि मुझे सुंदरता में कोई इंट्रेस्ट नहीं है। मुझे पता है मैं कैसा दिखता हूं। और फिर किसी खुबसूरत लड़की को मेरे जैसे कम शक्ल इंसान में इंट्रेस्ट क्यों होगा? 
नेहा - आप एक बार मिल तो सकते हैं उससे। 
जय - तुम्हें पता है कि शादी के इस सिस्टम का मैं समर्थक नहीं हूं। अच्छा, तुम बताओ तुम सबसे ज्यादा प्यार किससे करती हो। 
नेहा - अपने मम्मी-पापा से। 
जय - अच्छा, इन दोनों से तुम्हारा रिश्ता कैसे बना? क्या तुमने अपने मां-बाप को चुना था? मतलब, दुनिया का पहला रिश्ता ही नैचुरल है, स्वाभाविक है, प्राकृतिक है। इसमें चुनाव वाली तो कोई बात ही नहीं है। इसके बाद भाई-बहन, दोस्त-रिश्तेदार, ये सारे रिश्ते तो स्वाभाविक ढंग से ही बनते हैं। हम ये तो नहीं कहते कि वो दिखने में अच्छा नहीं है तो उसे मैं अपना भाई नहीं कहूंगी। फिर, ऐसा रिश्ता जिसे हम जिंदगी भर निभाने की कसम खाते हैं उसे शर्तों पर क्यों तय किया जाता है? क्यों ये शर्त रखी जाती है कि तुम्हारी शादी उसी शख्स से होगी जो तुम्हारे धर्म का हो, तुम्हारी ही जाति का हो, गोत्र एक ही हो.... इस रिश्ते को भी स्वाभाविक ढंग से क्यों नहीं बनने दिया जाता? क्यों इतनी दीवारें खड़ी की जाती हैं? 
नेहा - आपको किसी ने रोका है क्या ऐसा करने से? आपको करना है तो आप कीजिए अपने ढंग से। और अगर होना होता तो हो गया होता अब तक.... अगर आप कोशिश ही नहीं करेंगे तो कैसे होगा वैसा भी जैसा आप चाहते हैं। कोशिश तो कीजिए...किसी से मिलेंगे-जुलेंगे तभी तो होगा वैसा, जैसा आप चाहते हैं। लेकिन आपको तो किसी से मिलना ही नहीं है। 
जय - देखो, मैं मिलने के खिलाफ नहीं हूं लेकिन, ये मिलना भी तो कंडीशनल ही हुआ न? हम किसी से इसलिए मिलेंगे क्योंकि एक-दूसरे में हम शादी की संभावना तलाशेंगे? 
नेहा - तो फिर कैसे मिलेगी वो जिसे आप तलाश रहे हैं? 
जय - किसने कहा कि मैं तलाश रहा हूं? 
नेहा - तो फिर इतने बेचैन क्यों रहते हैं हर वक़्त ? 
जय - तुम्हे ऐसा क्यों लगता है कि मैं इसलिए बेचैन हूं कि मुझे किसी की तलाश है? ये भी तो हो सकता है कि मेरी तलाश पूरी हो गई है इसलिए मेरी बेचैनी बढ़ गई है। क्या बेचैनी का ये कारण नहीं हो सकता कि जिसकी तलाश थी वो मिल गई है, लेकिन मैं उसे ये बता नहीं पा रहा हूं? 
नेहा ने कोई जवाब नहीं दिया...

गुझिया की याद में

ढोल-नगाड़ों की तेज आवाज से अचानक उसकी नींद टूट गई। चादर से मुंह निकाल उसने घड़ी देखने की कोशिश की। साढ़े ग्यारह बज रहे थे। उसने सोचा: बाहर निकलने का भी क्या फायदा, चाय-सिगरेट तो मिलेगी नहीं आज।

मोबाइल पर होली मुबारक वाले नोटिफिकेशन की बाढ़ आई हुई थी। उसने किसी को जवाब नहीं दिया। बिस्तर से उठ जैसे ही उसने दरवाजा खोला तो चटख धूप पूरे कमरे में फैल गई। आंख मिझते हुए बालकनी की ओर बढ़ा ही था कि उसका पांव फिसल गया। नीचे देखा तो पूरी फर्श गीली थी। तभी पानी से भरा एक बड़ा सा गुब्बारा उसके पांव के पास छपाक से गिरा।

गुब्बारे में रंग नहीं था, सिर्फ पानी। सामने वाले घर में दो बच्चे गुब्बारों से भरी बाल्टी लिए ये करतब कर रहे थे। उसकी नजर पड़ते ही बच्चे थोड़ा सहम गए। बालकनी में खड़ा वह काफी देर तक गली में लोगों के झुंड और बच्चों की टोली पर पानी, रंगों और गुब्बारों की बौझार को देखता रहा।

उसे अचानक गुझिया की याद आ गई। सामने वाले बच्चों को खाता देख उसे भी जैसे भूख लग आई। मोबाइल की घंटी सुन वह अंदर आ गया।

- हैलो, आपको भी हैप्पी होली। इतना शोर क्यों हो रहा वहां?

- अरे, मत पूछो यार। कल तक तुम्हारी भाभी ने रो-रो कर बुरा हाल कर रखा था। जब तक बेटा घर में आ नहीं गया तब तक गुझिया का सामान लाने तक को तैयार नहीं थीं। अब सारे मिलकर गुझिया बना रहे हैं और एक-दूसरे को परेशान कर रहे हैं। खैर, तुम क्यों नहीं आए होली पर?

- अरे, आप जानते तो हैं... प्राइवेट नौकरी में छुट्टी का ही तो लफड़ा है।

- हां, सो तो है। और... खाना-वाना खा लिया? भगवान को थोड़ा अबीर-गुलाल चढ़ा देना। होली के दिन शुभ करना जरूरी होता है।

- हां, चढ़ा दिया है।

- अच्छा, रखता हूं फोन। पता नहीं किस-किस का मिस कॉल और मैसेज आ चुका है इतनी देर में। उन्हें भी निबटाना जरूरी है यार। चलो तुम होली एंन्जॉय करो। हैप्पी होली!

Sunday, 15 April 2012

...जब एक धामके ने शुरू किया देश का सबसे खतरनाक गैंगवार


...सुपारी किलर एपिसोड- 8



कहते हैं जंग और प्यार में सब जायज है. 1993 (मुंबई) में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों ने दो दोस्तों को एक-दूसरे का सबसे बड़ा दुश्मन बना दिया. इनमें से एक था दुनिया के सबसे खूंखार अपराधियों में शामिल डॉन दाऊद इब्राहीम और दूसरा राजेंद्र सदाशिव निकल्जे उर्फ़ छोटा राजन.

फिल्मों की टिकट ब्लैक करने वाले राजेंद्र सदाशिव निकल्जे की मुलाक़ात एक दिन राजन नैयर उर्फ़ बड़ा राजन से होती है और जल्द ही यह लड़का राजन का ख़ास आदमी बन जाता है.


बड़ा राजन की मौत के बाद राजेंद्र सदाशिव निकल्जे खुद को उसके काले धंधों का नया सरताज घोषित करता है और बन जाता है 'छोटा राजन'. जल्द ही मुंबई के जुर्म की दुनिया में तीन नामों का सिक्का जम जाता है. दाऊद इब्राहीम, अरुण गवली और छोटा राजन की यह तिकड़ी अंडरवर्ल्ड की दुनिया में आतंक का दूसरा नाम बन जाता है. अरुण गवली के भाई की हत्या, इस गैंग से उसके अलग होने की वजह बनी.


अब छोटा राजन और दाऊद, जुर्म की दुनिया के ऐसे सिक्के बन चुके थे जिसमें चित और पट दोनों पर ही डी-कंपनी का नाम लिखा हुआ था. सब कुछ ठीक वैसा ही चल रहा था जैसा दाऊद चाहता था.


जुर्म करने वालों का भले ही कोई धर्म न हो लेकिन, ईमान जरुर होता है. ये बात अगर दाऊद के बारे में गलत थी तो छोटा राजन के बारे में उतनी ही सही. दाऊद और राजन के बीच यह छोटा सा फर्क उस दिन एक बड़ी खाई बनकर सामने आता है जब पैसे और ईमान की लड़ाई में दाऊद पैसों को चुनता है, जबकि छोटा राजन ईमान को.


1993 के मुंबई बम धमाकों ने छोटा राजन को दाऊद के गैंग का सबसे बड़ा दुश्मन बना दिया, क्योंकि राजन के लिए देश के मासूमों और निर्दोषों की हत्या, पैसे के लिए ईमान बेचने के बराबर था. इस घटना के बाद शुरू हुआ एक ऐसा गैंगवार जिसने मुंबई के साथ पूरे देश को हिला कर रख दिया...


'...सुपारी किलर' की अगली कड़ी में पढ़िए इस गैंगवार का खतरनाक अंजाम.

Friday, 13 April 2012

...और तब सपने आना भी बंद हो जाते हैं


पुस्तक समीक्षा

किताब: आई टू हैड अ लव स्टोरी (अ हार्ट ब्रेकिंग ट्रू लव टेल)
लेखक: रविंदर सिंह
भाषा: अंग्रेजी
पहला प्रकाशन: 2009
पब्लिशर: श्रृष्टि पब्लिकेशन एंड डिस्ट्रीब्यूटर
मूल्य: 100 रूपए

दुनिया देखने के लिए आंखें जरुरी होती हैं, लेकिन सपने देखने के लिए इन आंखों को बंद करना जरुरी होता है.

किसी की भी जिंदगी में सपने देखने और सपनों के टूटने से ज्यादा दर्दनाक होता है, सपनों का खत्म हो जाना.


हम सबका शरीर, मन, आत्मा कभी न कभी ऐसे दौर से गुजरता है जब आंखें बंद होते ही सपनों की फिल्म शुरू हो जाती है. ये सिलसिला तब तक चलता रहता है जब तक की हम किसी भयंकर पीड़ा, दुःख, अवसाद, असफलता या विछोह से नहीं गुजरते. अक्सर और शायद ज्यादातर मामलों में इस तरह के सदमों के बाद सपने गायब हो जाते हैं.


ऐसा नहीं है कि इस तरह का अनुभव हर किसी को होता ही है, लेकिन जिन्हें भी होता है, जिंदगी के प्रति उनका नजरिया बेहद असामान्य (आम लोगों से हट कर) हो जाता है. बदलाव की यह प्रक्रिया इंसान के भीतर ही एक दूसरे इंसान को जन्म देती है. इस दूसरे इंसान का व्यक्तित्व लंबे समय से जी रहे पहले इंसान से बिलकुल अलग हो जाता है.


जीवन को झकझोर देने वाली एक ऐसी ही घटना 26 साल के एक युवक (रविंदर सिंह) के साथ घटती है. ये एक घटना उसे जिंदगी के कई ऐसे पाठ पढ़ा जाती है जो उसकी अब तक की जिंदगी के सरे पाठ और अनुभव को खोखला और बौना साबित कर देती है.


इंटरनेट के इस 'सूचना युग' में एक प्रतिभाशाली युवा(रविंदर सिंह), एक बेहद खूबसूरत लड़की (ख़ुशी) से मिलता है. मिलन का माध्यम बनता है इंटरनेट (शादी डॉट कॉम). बेहद आम भाषा और शैली में लिखी गई यह किताब जीवन के एक बेहद पेचीदा सवाल पर ख़त्म होती है, "क्या बिना किसी मकसद, प्रेरणा और उत्साह के जिंदगी जी जा सकती है? क्या कोई है जो इन सारी चीजों को हमारी जिंदगी में लाता और एकदम से इन्हें हमसे छीन लेता है?


इस किताब को रविंदर सिंह ने ही लिखा है और ये कहानी उनके जीवन में घटी एक घटना पर आधारित है.

Tuesday, 27 March 2012

जब दुनिया के सबसे खूंखार आका का दुश्मन बना उसका ही एक वफादार


'...सुपारी किलर' एपिसोड-7

लालच और गलत संगत ने दाउद को सिर्फ एक अपराधी ही नहीं, बल्कि एक आतंकवादी बना दिया था जिसका मकसद अपने फायदे के लिए किसी को भी नुकसान पहुँचाना था, भले ही वह अपना वतन ही क्यों न हो. उसके इसी लालच ने दाउद गैंग में ही उसके सबसे वफादार साथी को उसका दुश्मन बना दिया.

'राजेंद्र सदाशिव निखालजे' उर्फ़ 'छोटा राजन' जिसे दाउद का दाहिना हाथ कहा जाता था ने 1993 में हुए मुंबई बम धमाके के बाद न सिर्फ खुद को दाउद से अलग कर लिया, बल्कि उसने उन सब लोगों को ठिकाने लगाने की भी सोच ली जिन्होंने भारत के निर्दोष लोगों को निशाना बनाया था.

मुंबई बनी गैंगवार की राजधानी...

यहीं से छोटा राजन और दाउद गिरोह के बीच गैंगवार की शुरुवात हुई. डी-कंपनी छोड़ने के साथ ही अपने कुछ साथियों (मोहन कुट्टियन, साधू शेट्टी और जसपाल सिंह) के साथ छोटा राजन दुबई में जाकर बस गया.


जबकि उसे सबक सिखाने के लिए मुंबई में छोटा राजन के सबसे करीबी दोस्त रमानाथ पय्यादे की जून 1995 में दाउद के गुर्गों ने हत्या कर दी.


इससे पहले डी-कंपनी ने छोटा राजन के करीबी कहे जाने वाले फिल्म प्रोड्यूसर 'मुकेश दुग्गल' की हत्या करवा दी थी. छोटा राजन को सबक सिखाने के लिए दाउद का तरीका दिन पे दिन खौफनाक होता जा रहा था. उसे कमजोर करने की फिराक में दाउद हर उस शख्स को निशाना बना रहा था जिससे छोटा राजन के सम्बन्ध थे.


इस कड़ी में अगस्त 1995 में एक बड़ी घटना हुई जब राजन के करीबी रहे शार्प शूटर सुनील सावंत की भी मुंबई में हत्या हो गई. इसके अलावा राजन के दोस्त और मुंबई के बिल्डर ओ पी कुकरेजा की भी दाउद के गुर्गों ने हत्या कर दी.

छोटा राजन ने दिया डी-कंपनी को जोर का झटका

अब मौका था छोटा राजन के पलटवार का. उसने सबसे पहले ईस्ट वेस्ट एयरलाइंस के प्रबंध निदेशक थाकियुद्दीन वाहिद को निशाना बनाया जिसे किराए के किलर ने बम धमाके में उड़ा दिया.


लेकिन सबसे सनसनीखेज वारदात थी नेपाल के एक पूर्व मंत्री व संसद सदस्य मिर्ज़ा दिलशाद बेग की हत्या. दरअसल बेग को नेपाल में दाउद का सबसे ख़ास आदमी माना जाता था.

मुंबई बम धमाके के आरोपियों का फैसला किया छोटा राजन गिरोह ने...


इसके बाद छोटा राजन ने एक-एक कर उन सभी को निशाना बनाना शुरू किया जिहोने मुंबई बम धमाके का जाल बुना था. इसमें सबसे पहला शिकार सलीम कुर्ला था, जिसकी अप्रैल 1998 में हत्या हुई. इसके बाद जून में मोहम्मद जींदरान और मार्च 1999 में माजिद खान को भी राजन ने ठिकाने लगवा दिया.

हालांकि इसी दौरान डी-कंपनी ने शिवसेना के एक नेता मोहम्मद सलीम की भी हत्या करवा दी. ऐसा भी कहा जाता है कि इस घटना के बाद महाराष्ट्र की भाजपा सरकार छोटा राजन के पक्ष में हो गई और उसे रानीतिक संरक्षण भी मिलने लगा.


यहां तक कि शिवसेना के मुखपत्र 'सामना' में ये लिखा गया कि पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई छोटा राजन की हत्या कराने की फिराक में है.


फरवरी 2010 में छोटा राजन गिरोह ने जामिम शाह की हत्या करवा दी. माना जाता है कि वह नेपाल में एक बड़ी मीडिया हस्ती था और दाउद का समर्थक भी.


शाह के आईएसआई से भी सम्बन्ध थे और वह भारत में जाली मुद्रा पहुंचाने वाले गैंग का सरगना भी था. हालांकि उसके भारत विरोधी कामों से भारत सरकार लम्बे समय से परेशान थी. जिसे एक झटके में ही छोटा राजन ने ठिकाने लगा दिया.


'...सुपारी किलर' की अगली कड़ी में पढ़िए कैसे फिल्मों की टिकट ब्लैक करने वाला एक आम लड़का बन गया छोटा राजन...