Wednesday, 29 August 2018

आखिर क्यों नहीं ले पाती हो तुम वो फैसला जो लेना चाहती हो!

आज सुबह से ही जय का मूड कुछ उखड़ा-उखड़ा सा था। एक दो बार नेहा ने उससे बात करने की कोशिश की लेकिन जय ने उसे इग्नोर कर दिया। नेहा को समझ में आ गया कि कल बार जाने से मना करने वाली वाली बात से वो नाराज है।
पूरे दिन दोनों में कोई बात नहीं हुई, लेकिन शाम होते-होते जय का गुस्सा कुछ ठंडा हुआ तो उसने ही नेहा से पूछा- अच्छा एक बात बताओ, हमारे समाज में आज भी लड़कियां अपने बारे में फैसला लेने से इतना डरती क्यों हैं? 
मेरी एक भतीजी है जो गाने का शौक रखती है लेकिन, घरवाले हैं कि उसके इस फैलसे के सख्त खिलाफ हैं। मेरे भाई का कहना है कि ये गाने-वाने का काम लड़कियों के लिए ठीक नहीं है। 
मेरी भतीजी ने इस स्थिति को स्वीकार कर लिया है क्योंकि वो मेरे भाई से बहुत डरती है। उसे लगता है अगर पापा गुस्सा हो गए तो घर से निकलना और कोंचिंग जाना भी बंद करवा देंगे।
इतना कहने के बाद जय कुछ सोचने लगा... कुछ देर रुक के उसने नेहा से सवाल किया- क्या तुमने भी जिंदगी के फैसले ऐसे ही किसी दबाव में लिए हैं? आखिर लडकियोंं को इतना एक्सपोजर और इतनी कानूनी ताकत मिलने के बावजूद उनमें कॉन्फिडेंस क्यों नहीं आता?
नेहा ये सब सुने जा रही थी और किसी खयाल में उलझी हुई सी भी थी। जय के सवाल करने के अगले एक मिनट बाद तक वो शांत ही रही...जय ने उससे फिर पूछा- आखिर कुछ बोलती क्यों नहीं तुम ?
नेहा- देखो, तुम्हे ये बात समझनी होगी कि हर लड़की इतनी मजबूत नहीं होती कि वो घर वालों की मर्जी के खिलाफ जाकर फैसला ले सके। 
और हमारी परवरिश से ही बहुत हद तक ये निर्धारित हो जाता है कि हमें किस रास्ते पे जाना है। पढ़ाई से लेकर करियर और शादी तक का सब कुछ तो मां-बाप पहले से ही तय करके रखते हैं, फिर आपके लिए उसमें जगह ही कहां बचती है कोई फैसला खुद से लेने की।
ये बोलते-बोलते नेहा की आंखें कुछ नम हो गईं। लेकिन उसने तुरंत खुद को संभाला और बोली- अब मेरा ही ले लो... उसने मुझसे कहा था कि अगर तुम कहो तो मैं अपने घर वालों से बोलूं तुम्हारे घरवालों से बात करने को लेकिन, मैं इतनी हिम्मत नहीं जुटा पाई कि उससे हां कह पाती। मुझे लगा इससे मां-बाप की भावनाओं को ठेस पहुंचेगी और मैं चुप रह गई।
जय को ये बात खटकी तो कि आखिर अचानक नेहा ये किसके बारे में बात करने लगी लेकिन, उसने उसे रोका नहीं और न ही इस बात को कुरेदने की कोशिश ही की। उसने नेहा को बोलने दिया।
नेहा- देखो, ऐसा कोई भी फैसला जो सिर्फ आपको पसंद है और घर वाले उसके साथ नहीं हैं तो उसे लेने में परेशानी आती ही है। ऐसा फैसला लेने के लिए आपमें इतना कॉन्फिडेंस होना चाहिए कि उसके गलत होने पर आप खुद को संभाल सकें क्योंकि, तब कोई भी आपके साथ नहीं होगा।
जय- और ये कॉन्फिडेंस क्यों नहीं होता लड़कियों में कि वो अकेले भी इस दुनिया का सामना कर सकती हैं। आखिर क्यों हर बार उन्हें किसी फैसले के लिए पिता, भाई, प्रेमी या पति का सहारा चाहिए?
नेहा- क्योंकि हमें शुरू से ही ये बताया जाता है कि लड़की एक खुली तिजोरी की तरह है जिसे अगर संभाल के न रखा जाए तो उसे कोई भी लूट सकता है।
इस बात पर जय जोर से हंस पड़ा और बोला- और शायद दुनिया में यही एक ऐसा अपराध है जिसमें इस तिजोरी को लूटने वाले अपराधी से ज्यादा शिकार होने वाले को सजा भुगतनी पड़ती है। और ये सजा कोई कानून या कोर्ट नहीं बल्कि, वही समाज देता है जो लड़की की इज्जत को उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बता कर उसे हमेशा के लिए मर्दों के आगे कमजोर बना देता है।
जय की इस बात का नेहा कोई जवाब नहीं देती और फिर से कुछ सोचने लगती है...

उसमें एक बड़ी ताकत है

श्याम बहुत दिनों से जय से कह रहा था, चल यार किसी दिन बीयर-शीयर पीते हैं लेकिन, जय उसे लगातार टाल रहा था। आखिर शनिवार को श्याम पीछे ही पड़ गया कि आज तो पार्टी होके ही रहेगी।

दोनों ने तय किया कि बार में चल के पी लेंगे और नेहा को भी साथ ले लेंगे। ये बात दोनों ने नेहा को नहीं बताई। लेकिन रास्ते में जब नेहा को ये बात पता लगी तो उसने जाने से इनकार कर दिया। घर से तीनों साथ ही निकले थे, लेकिन नेहा रास्ते में ही उतर गई। जय ने कई बार रिक्वेस्ट की, लेकिन वो नहीं मानी। नेहा को छोड़ने के बाद दोनों बार पहुंचे और अपनी-अपनी पसंद की ड्रिंक ऑर्डर कर के चखना खाने लगे।

कुछ देर बाद जब सुरूर चढ़ने लगा तो श्याम ने जय से पूछा- यार तू इसे इतनी लिफ्ट देता ही क्यों है? साला तूने इतनी मिन्नत की फिर भी वो यहां आने के लिए तैयार नहीं हुई।

जय- अरे नहीं यार, ऐसी बात नहीं है। देख, मैं उसे लिफ्ट-विफ्ट नहीं देता। जैसे तू मुझे अच्छा लगता है वैसे ही वो भी मुझे अच्छी लगती है... बस। तू भी तो कई बार मेरी बात नहीं मानता। तो इसका क्या मतलब है कि मैं तुझसे दोस्ती तोड़ दूं।

श्याम- अरे यार, लेकिन तुझे लगता नहीं कि वो बहुत ही फुद्दू टाइप लड़की है। ऐसा लगता है जैसे उसे बहुत बांध के रखा गया है और बस इतना कहा गया है कि दिल्ली में रहती है तो नौकरी कर ले, ज्यादा पैर पसारने की जरूरत नहीं है।

जय- हाँ, शायद तू ठीक कह रहा है। देख भाई, हर इंसान की जिंदगी में कुछ न कुछ डार्क होता ही है। मेरी और तेरी जिंदगी में भी कुछ न कुछ ऐसा है। अगर हम उसे जानते हैं तो अच्छी बात है, क्योंकि अगर जानते हैं तो कभी न कभी उससे छुटकारा भी मिल ही जाएगा। मुश्किल तब होती है जब हम अपनी ही कमजोरियों से अनजान होते हैं।

श्याम- यानि, उसकी कमजोरियों को जानने के बावजूद तू उसका साथ छोड़ेगा नहीं!

जय- मैंने किसी कमजोरी की वजह से उसका साथ नहीं पकड़ा है बल्कि, उसमें कुछ ऐसी ताकत देखी है जो अगर तुम देख सकते तो शायद तुम्हें भी वो अच्छी लगती। बल्कि, मैं तुममे भी ऐसा ही कुछ देखता हूं इसलिए ही तो तू मेरे इतने करीब है।

श्याम अब तक पूरी तरह टुन्न हो चुका था और बोलने की हालत में नहीं था। जय ने उसे किसी तरह कार में बिठाया और दोनों वहां से चल दिए

21वीं सदी की लड़की और उसकी सदियों पुरानी मजबूरी

नेहा के कॉलेज में वैसे तो और भी कई लड़के थे लेकिन, राहुल अकेला ऐसा लड़का था जिससे नेहा सहित सारी लड़कियां बात करती थीं। कॉलेज में आने से ठीक पहले राहुल का अपनी गर्लफ्रेंड से ब्रेकप हुआ था और वो हर समय डिप्रेशन में रहता था।
लेकिन कॉलेज में आने के बाद जल्द ही वो सारी लड़कियों से घुल-मिल गया। नेहा से उसकी सबसे ज्यादा बातचीत होती। उसकी ये हालत नेहा से देखी नहीं जाती थी इसलिए वो राहुल को समझाने की हर कोशिश करती। ये सिलसिला चलता रहा और इसी दौरान न जाने कब राहुल को नेहा से प्यार हो गया। एक दिन राहुल ने नेहा को अकेले में बुलाया और उससे 'आई लव यू' बोल दिया। नेहा ने राहुल को उसी समय सीधा जवाब दिया - बट, आई डोंट।
जिस वक़्त नेहा ये सब जय को बता रही थी उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं था। ठीक वैसे ही जैसे भिखारी को भीख देते समय हमारे चेहरे पर कोई भाव नहीं होता। जय से रहा नहीं गया और उसने पूछ ही दिया - क्या तुम्हें उस पर बिल्कुल दया नहीं आई?
नेहा - मैं क्या करती। मैंने उसे पहले ही बता दिया था कि शादी करने के लिए मेरी कुछ शर्तें हैं और जो लड़का उस पर खरा उतरेगा मैं उससे ही शादी करूंगी।
इसमें पहली शर्त थी कि लड़का अपनी जाति का हो। उसका अच्छा दिखना दूसरी जरूरी शर्त थी। अपना घर सहित अच्छी नौकरी होना तो जरूरी था ही। राहुल इसमें से पहली शर्त ही पूरी नहीं करता था।
असल में नेहा जिस तरह के परिवेश से आई थी वहां शादी एक रस्म है, एक ऐसी परंपरा है जिसका सीधा संबंध परिवार की इज्जत से जुड़ा होता है। आश्चर्य की बात ये कि 21वीं सदी शुरू होने के एक दशक बीत जाने के बावजूद खुद को मॉडर्न और यंग कहने वाली लड़की भी इस परंपरा को सिर्फ इसलिए स्वीकार करती है क्योंकि ऐसा न करने पर उसके मां-बाप को दुख होता।
इसमें कोई दो राय नहीं कि दुनिया में सबसे कठिन काम अपनों से लड़ना है। ऐसी ही दुविधा से अर्जुन को बाहर निकालने के लिए श्रीकृष्ण को अपना दिव्य रूप प्रकट कर अर्जुन को समझाना पड़ा था कि ये लड़ाई अपने और पराए की नहीं, धर्म और अधर्म की है। हालांकि अब ये बात बहुत पुरानी हो चुकी है।
शादी की शर्तों वाली बात सुनकर जय को लगा जैसे वो किसी ऐसी लड़की से बात कर रहा हो जिसने रिश्तों की मजबूरी के आगे तर्क और विवेक के अपने सारे हथियारों को ताक पर रख दिया हो। न जाने क्यों उसे नेहा का कद अचानक ही कुछ छोटा दिखने लगा।
जय सोचने लगा कि महाभारत के काल से लेकर आज तक ज्यादातर मौकों पर इंसान हर वो लड़ाई हारता रहा है जहां सामने कोई दुश्मन नहीं बल्कि, अपने खड़े हों। हालांकि, वो अब तक इस बात को पचा नहीं पा रहा था कि नेहा ने राहुल के प्रेम प्रस्ताव को सिर्फ इसलिए ठुकरा दिया था क्योंकि वो शर्तों वाली लिस्ट के मुताबिक नहीं था।
शायद नेहा की कोई और मजबूरी भी रही होगी लेकिन, उस वक़्त उसने खुल के कुछ नहीं कहा। बड़े ही बेरुखे अंदाज में बस इतना ही बोली- मैंने थोड़े ही कहा था कि तुम मुझसे प्यार करो! तुमने किया था तो गलती तुम्हारी है...तुम भुगतो।
नेहा की ये बात बिलकुल सच है कि प्यार करने से पहले इंसान न तो सामने वाले से परमिशन लेना जरूरी समझता है और न ही जाति धर्म के बंधनों को देखता है। दुनिया न जाने कितनी सदियों से प्यार करने वालों को ये बात समझाने की कोशिश कर रही है लेकिन, प्यार करने वाले हैं कि किसी भी युग में इसे समझने के लिए तैयार ही नहीं हैं। ठीक वैसे ही जैसे गीता में कृष्ण के उपदेश के बावजूद अपनों के आगे इंसान हारता आ रहा है।
नेहा शायद ये बात समझ पाती अगर उसे भी किसी से प्यार हुआ होता। नेहा ने खुद ही जय को बताया कि उसे कभी किसी से प्यार हुआ ही नहीं।

मैं उड़ नहीं पा रही हूं...

आज शाम से ही जय बहुत परेशान था। नेहा ने उससे साफ कह दिया था कि अब वो किसी भी कीमत पर उसके साथ नहीं रहेगी क्योंकि वो उसे जितना कमजोर समझ रहा है वो उतनी कमजोर नहीं है।
जय इस बात से और भी पेरशान हो गया कि इतने दिन साथ रहने के बाद भी वो उस लड़की को नहीं समझ पाया जिसे समझने का वो दावा करता फिरता था। वो सबसे ये कहता था कि मैं उसे जानता हूं, वो आसमान में उड़ना चाहती है... वगैरह-वगैरह। जबकि नेहा कह रही है कि अगर वो उड़ नहीं पा रही है तो ये सिर्फ उसकी कमजोरी है क्योंकि, वो खुद आगे नहीं बढ़ रही है।
नेहा ने कहा कि अगर उसने अच्छे से पढ़ाई की होती तो आज वो भी किसी ऐसी नौकरी में होती जिसमें उसे ज्यादा पैसे मिलते। उसे रोज नए-नए लोगों से मिलने का मौका मिलता। लेकिन जब उसने अच्छे से पढ़ाई ही नहीं की तो फिर वो समाज या अपने घरवालों को कैसे दोष दे सकती है?
आज भी जबकि मेरे पास सारी सुविधाएं मौजूद हैं मैं अपने मन मुताबिक बहुत सी चीजें नहीं कर पा रही हूं क्योंकि मैं उस हद तक नहीं जा पा रही हूं जिस हद तक मुझे जाना चाहिए। इसके लिए मैं समाज को कैसे जिम्मेदार ठहरा सकती हूं।
इतना कहते-कहते नेहा का गुस्सा और भी बढ़ गया और उसने तमतमाते हुए कहा- पिछले छह महीने से मैं गाड़ी चलाना सीखने की सोच रही हूं लेकिन, ये छोटा सा काम भी नहीं कर पा रही हूं तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है? अब मैं कहूं कि इसके लिए भी मेरे घर वाले ही जिम्मेदार हैं या समाज जिम्मेदार है....
जय- नेहा, देखो मैं कुछ और बात कह रहा हूं और तुम उसे कमजोरी और मजबूती पर ले जा रही हो। तुम कह रही हो कि नहीं मैं उतनी कमजोर नहीं हूं जितनी तुम सोचते हो। असल में मैं किसी दूसरी कमजोरी की बात कर रहा हूं, तुम इस बात को क्यों नहीं समझती?
नेहा- तुम किस कमजोरी की बात कर रहे हो फिर....
जय- मैं ये कह रहा हूं कि हमारे आस-पास ऐसा माहौल है जो हमें कमजोर बनाता है और हम इस बात को समझ नहीं पाते। तुम गाड़ी चलाना सिखना चाहो या वो पढ़ाई जो तुम करना चाहती थी नहीं कर पाई, इन दोनों बातों के लिए तुम खुद को जिम्मेदार मानती हो? लेकिन मैं ऐसा नहीं मानता....
नेहा- अच्छा, तो आप क्या मानते हैं?
जय- मैं ये कह रहा हूं कि हमारे सिस्टम में ऐसी कोई व्यवस्था ही नहीं है जो व्यक्ति को समझ सके या उसके असली हुनर को पहचान सके। मुझे पता है कि मैं कोई अनोखी या नई बात नहीं कह रहा हूं लेकिन, इस बात को हम केवल सुनते हैं महसूस नहीं करते।
हम बड़ी आसानी से ये मान लेते हैं कि तुम जो पढ़ाई करना चाहती थी वो इसलिए नहीं कर पाई क्योंकि तुममे वो क्षमता ही नहीं थी। जबकि सच ये है कि हममें से ज्यादातर लोग किसी पढ़ाई को इसलिए चुनते हैं क्योंकि उसमें अच्छे करियर की संभावना होती है।
हमारे सिस्टम में कोई भी बच्चा कौन सी पढ़ाई करेगा वो इस बात से डिसाइड किया जाता है कि उसे दसवीं या बारहवीं में कितने अंक मिले थे। ठीक इसी तरह करियर का फैसला भी इस आधार पर किया जाता है कि उस प्रोफेशन का स्कोप कितना है। कितने का पैकेज मिलेगा वगैरह वगैरह...
मैं बस इतना कहना चाहता हूं कि तुम अगर किसी काम को करने के लिए बिस्तर नहीं छोड़ पा रही हो या उसके लिए कुछ भी कर गुजरने का रिस्क नहीं ले पा रही हो तो उसका कारण बस इतना है कि वो तुम्हारा पैशन या जुनून है ही नहीं। उसे पाने के लिए तुममें पागलपन नहीं है। अगर आप आकर्षक करियर बनाने या ज्यादा पैसे कमाने का सपना देखते हैं और इसे न पाने के बावजूद रोज रात को आपको चैन की नींद आती है तो ये तय है कि वो आपका गोल नहीं है और ये बात हमें हमारा सिस्टम नहीं सिखाता...कमजोरी यहां है, समझी तुम।
ये सुनने के बाद नेहा का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया लेकिन, वो इस बहस को और आगे नहीं बढ़ाना चाहती थी इसलिए वो चुप हो गई। जय ने भी सोचा इतनी रात को इसे और परेशान करना ठीक नहीं है, सो उसने भी कमरे की लाइट आॅफ कर दी।

उस परफ्यूम की खुशबू आज तक नहीं भूल पाई वो

नेहा कुछ सोचते हुए बार-बार अपनी उंगलियों में दुपट्टा लपेटते और सुलझाते इधर-उधर टहल रही थी। रोज की तरह आज भी जय ने ही बात शुरू की- अच्छा तुम्हे क्या लगता है, तुम्हारे मार्क्स दसवीं में तो कम थे फिर बारहवीं में तुमने क्या कर डाला कि तुम फर्स्ट क्लास में पास हो गई?
नेहा - क्या बताऊं.... बस ये समझो कि किसी का जादू था, जो बस छा गया।
ये कहते हुए नेहा का चेहरा खिल उठा। ऐसे, जैसे अचानक किसी ने उसे गुदगुदी कर दी हो। और फिर उसने खुद ब खुद बोलना शुरू कर दिया - मैं गर्ल्स स्कूल में पढ़ती थी। वहां सारी टीचर्स भी फीमेल ही थीं। हम कॉमर्स के क्लास में टीचर का इंतजार कर रहे थे कि तभी एक हैंडसम से शख्स ने क्लास में एंट्री की।
हम सब खड़े हो गए। उन्होंने बड़े ही सलीके से हमें बताया कि आज से वही हमें कॉमर्स पढ़ाएंगे।
जिस वक़्त नेहा ये बात कह रह थी उसे देख के लगा जैसे वो खुद को उन लम्हों में धकेल देना चाहती है। उसकी आंखें चमकने लगीं थीं चेहरा सुर्ख लाल हो गया था।
तभी जय ने उसे कुरेदते हुए चुटकी ली - तुम्हारा चेहरा इतना खिल क्यों गया, अपने कॉमर्स टीचर का नाम लेते ही?
नेहा - क्या बताऊं... अगर तुम मेरी जगह होते तो तुम्हारा भी यही हाल होता। वो थे ही ऐसे। एक-एक टॉपिक को ऐसे समझाते जैसे नर्सरी के बच्चों को कोई अल्फाबेट पढ़ा रहा हो। इसके बाद भी एक-एक लड़की से पूछते, समझ में आया या नहीं?
न जाने कैसे उन्हें ये पता लग ही जाता कि बच्चों को कहीं न कहीं परेशानी है। फिर से उसी टॉपिक को दूसरे ढंग से समझाते। इन सबके बीच न जाने कैसे मैं उनकी फेवरेट स्टूडेंट बन गई।
जब भी कोई टॉपिक रिपीट करना होता या दोबारा समझाना होता तो वो मुझे बुलाते और कहते, अब तुम समझाओ पूरे क्लास को। उनकी पढ़ाने की स्टाइल इतनी अच्छी थी कि जल्द ही गर्ल्स कॉलेज के वो सबसे फेवरेट मेल टीचर बन गए। यहां तक कि जब वो क्लास के बाहर भी किसी को कुछ समझाते तो लड़कियां उन्हें चारों तरफ से घेर लेतीं।
स्टूडेंट्स के उलट कॉलेज की फीमेल टीचर्स को नए कॉमर्स टीचर खटकने लगे। कई बार मैंने अपनी टीचर्स को ये कहते सुना कि देखो, कन्हैया जी कैसे अपनी गोपियों से घिरे हुए हैं।
आर्ट्स और साइंस की लड़कियां तो न जाने क्या-क्या बातें करतीं उनके बारे में। ये तक कहा जाने लगा कि देखो वो लड़की तो अपना दुपट्टा भी ठीक से नहीं रखती उनके सामने। मुझे ये बातें बिल्कुल भी अच्छी नहीं लगती थीं। मुझसे रहा नहीं गया और एक दिन मैंने ये सारी बातें उन्हें बता दीं।
ये कहते हुए नेहा अचानक रुक गई और दुपट्टे को जोर से अपनी उंगलियों में लपेटने लगी। कॉलेज छोड़ने के दस साल बाद भी समाज की उस बेरुखी से वो अब तक आहत थी। उसे बिल्कुल बर्दाश्त नहीं हो रहा था कि जो इनसान दिमाग के रास्ते होते हुए दिल तक में जगह बना ले उसके बारे में कोई इतनी खराब बात कैसे कर सकता है।
नेहा का ये दर्द साफ बयां कर रहा था कि कॉमर्स के उस टीचर ने सफेद चॉक से ब्लैक बोर्ड पर न जाने ऐसा क्या लिखा जिसके निशान अट्ठारह साल की एक युवा और कोमल लड़की के दिल पर ऐसे पड़े कि मिटाने की तमाम कोशिशों के बावजूद आज भी वो जस के तस मौजूद थे। यहां तक कि उस टीचर के परफ्यूम की खुशबू भी उसकी नाकों में अब अब तक बसी हुई थी।
नेहा ने खुद ही बताया कि आज भी जब कहीं उस परफ्यूम की खुशबू नाक में पड़ती है तो वो याद आ जाते हैं।
जय ने देख लिया कि नेहा भले ही छत पर उसके साथ खड़ी है लेकिन, उसकी रूह ग्यारहवीं की उस क्लास में पहुंच चुकी थी जहां वो और उसके फेवरेट कॉमर्स के सर के अलावा और कोई नहीं था। जय ने धीरे से आवाज लगाई - नेहा... क्या हुआ, कहां खो गई?
नेहा - क्या कहूं यार, वो दिन मेरी अब तक की जिंदगी के सबसे खूबसूरत दिन थे।
इतना कहते हुए नेहा की आंखें फिर से चमक उठीं और चहकते हुए उसने बोला - तुम्हें पता है... वो ऐसे अकेले टीचर थे जो मेरे घर तक आए थे। एक दिन उन्होंने मुझे अपनी बाइक से मेरे घर तक छोड़ा।
फिर अचानक ही उसके चेहरे पर तनाव पसर गया। नेहा ने भरे मन से कहा - उस दिन मम्मी ने मुझे सर की बाइक से उतरते देख लिया था। जैसे ही मैं घर में घुसी उन्होंने मुझसे कहा - अगर पापा को पता चला कि तू एक लड़के के साथ स्कूल से घर आई थी तो पता है क्या हाल होगा तेरा?
इतना कहते ही नेहा अचानक चुप हो गई। कुछ देर तक जय भी कुछ नहीं बोला, फिर दोनों अपने-अपने कमरे की तरफ चल दिए।

इतने टेंशन में क्यों रहते हैं आप?

नेहा - तो क्या मैं पापा से बात करूं? 
जय - किस बारे में? 
नेहा - अरे शादी के बारे में और किस बारे में? 
जय - कौन, वो तुम्हारे पापा के दोस्त की बेटी? 
नेहा - हां, लड़की बहुत सुंदर है। 
जय - देखो तुम जानती हो कि मुझे सुंदरता में कोई इंट्रेस्ट नहीं है। मुझे पता है मैं कैसा दिखता हूं। और फिर किसी खुबसूरत लड़की को मेरे जैसे कम शक्ल इंसान में इंट्रेस्ट क्यों होगा? 
नेहा - आप एक बार मिल तो सकते हैं उससे। 
जय - तुम्हें पता है कि शादी के इस सिस्टम का मैं समर्थक नहीं हूं। अच्छा, तुम बताओ तुम सबसे ज्यादा प्यार किससे करती हो। 
नेहा - अपने मम्मी-पापा से। 
जय - अच्छा, इन दोनों से तुम्हारा रिश्ता कैसे बना? क्या तुमने अपने मां-बाप को चुना था? मतलब, दुनिया का पहला रिश्ता ही नैचुरल है, स्वाभाविक है, प्राकृतिक है। इसमें चुनाव वाली तो कोई बात ही नहीं है। इसके बाद भाई-बहन, दोस्त-रिश्तेदार, ये सारे रिश्ते तो स्वाभाविक ढंग से ही बनते हैं। हम ये तो नहीं कहते कि वो दिखने में अच्छा नहीं है तो उसे मैं अपना भाई नहीं कहूंगी। फिर, ऐसा रिश्ता जिसे हम जिंदगी भर निभाने की कसम खाते हैं उसे शर्तों पर क्यों तय किया जाता है? क्यों ये शर्त रखी जाती है कि तुम्हारी शादी उसी शख्स से होगी जो तुम्हारे धर्म का हो, तुम्हारी ही जाति का हो, गोत्र एक ही हो.... इस रिश्ते को भी स्वाभाविक ढंग से क्यों नहीं बनने दिया जाता? क्यों इतनी दीवारें खड़ी की जाती हैं? 
नेहा - आपको किसी ने रोका है क्या ऐसा करने से? आपको करना है तो आप कीजिए अपने ढंग से। और अगर होना होता तो हो गया होता अब तक.... अगर आप कोशिश ही नहीं करेंगे तो कैसे होगा वैसा भी जैसा आप चाहते हैं। कोशिश तो कीजिए...किसी से मिलेंगे-जुलेंगे तभी तो होगा वैसा, जैसा आप चाहते हैं। लेकिन आपको तो किसी से मिलना ही नहीं है। 
जय - देखो, मैं मिलने के खिलाफ नहीं हूं लेकिन, ये मिलना भी तो कंडीशनल ही हुआ न? हम किसी से इसलिए मिलेंगे क्योंकि एक-दूसरे में हम शादी की संभावना तलाशेंगे? 
नेहा - तो फिर कैसे मिलेगी वो जिसे आप तलाश रहे हैं? 
जय - किसने कहा कि मैं तलाश रहा हूं? 
नेहा - तो फिर इतने बेचैन क्यों रहते हैं हर वक़्त ? 
जय - तुम्हे ऐसा क्यों लगता है कि मैं इसलिए बेचैन हूं कि मुझे किसी की तलाश है? ये भी तो हो सकता है कि मेरी तलाश पूरी हो गई है इसलिए मेरी बेचैनी बढ़ गई है। क्या बेचैनी का ये कारण नहीं हो सकता कि जिसकी तलाश थी वो मिल गई है, लेकिन मैं उसे ये बता नहीं पा रहा हूं? 
नेहा ने कोई जवाब नहीं दिया...

गुझिया की याद में

ढोल-नगाड़ों की तेज आवाज से अचानक उसकी नींद टूट गई। चादर से मुंह निकाल उसने घड़ी देखने की कोशिश की। साढ़े ग्यारह बज रहे थे। उसने सोचा: बाहर निकलने का भी क्या फायदा, चाय-सिगरेट तो मिलेगी नहीं आज।

मोबाइल पर होली मुबारक वाले नोटिफिकेशन की बाढ़ आई हुई थी। उसने किसी को जवाब नहीं दिया। बिस्तर से उठ जैसे ही उसने दरवाजा खोला तो चटख धूप पूरे कमरे में फैल गई। आंख मिझते हुए बालकनी की ओर बढ़ा ही था कि उसका पांव फिसल गया। नीचे देखा तो पूरी फर्श गीली थी। तभी पानी से भरा एक बड़ा सा गुब्बारा उसके पांव के पास छपाक से गिरा।

गुब्बारे में रंग नहीं था, सिर्फ पानी। सामने वाले घर में दो बच्चे गुब्बारों से भरी बाल्टी लिए ये करतब कर रहे थे। उसकी नजर पड़ते ही बच्चे थोड़ा सहम गए। बालकनी में खड़ा वह काफी देर तक गली में लोगों के झुंड और बच्चों की टोली पर पानी, रंगों और गुब्बारों की बौझार को देखता रहा।

उसे अचानक गुझिया की याद आ गई। सामने वाले बच्चों को खाता देख उसे भी जैसे भूख लग आई। मोबाइल की घंटी सुन वह अंदर आ गया।

- हैलो, आपको भी हैप्पी होली। इतना शोर क्यों हो रहा वहां?

- अरे, मत पूछो यार। कल तक तुम्हारी भाभी ने रो-रो कर बुरा हाल कर रखा था। जब तक बेटा घर में आ नहीं गया तब तक गुझिया का सामान लाने तक को तैयार नहीं थीं। अब सारे मिलकर गुझिया बना रहे हैं और एक-दूसरे को परेशान कर रहे हैं। खैर, तुम क्यों नहीं आए होली पर?

- अरे, आप जानते तो हैं... प्राइवेट नौकरी में छुट्टी का ही तो लफड़ा है।

- हां, सो तो है। और... खाना-वाना खा लिया? भगवान को थोड़ा अबीर-गुलाल चढ़ा देना। होली के दिन शुभ करना जरूरी होता है।

- हां, चढ़ा दिया है।

- अच्छा, रखता हूं फोन। पता नहीं किस-किस का मिस कॉल और मैसेज आ चुका है इतनी देर में। उन्हें भी निबटाना जरूरी है यार। चलो तुम होली एंन्जॉय करो। हैप्पी होली!