Tuesday, 5 January 2010

क्या हम दोस्त नहीं बन सकते?



पिछले हफ्ते मुंबई में लगातार चार दिनों में चार लोगो ने आत्महत्या की आश्चर्य की बात ये कि उनमे से दो बच्चोंकी उम्र १२ वर्ष से भी कम थी। तीसरी एक १८ वर्षीयमेडिकल स्टुडेंट थी और चोथी युवती २८ वर्ष की थी जोमुंबई में ही एक विज्ञापन एजेंसी में काम करती थी।

ये घटनाये देखने में भले ही अलग लगे लेकिन आपस मेंजुडी हुई हैं। ११-१२ वर्ष क़ी उम्र एक ऐसी अवस्था है जबहमारे पास बहुत कम वक़्त होता है। क्या-क्या नहीं करना होता सुबह उठ कर स्कूल जाना, फिर स्कूल में दोस्तोंके साथ खूब सारी बातें करना। सपनो के घर बनाना। वापस घर आना। आते ही अपना मनपसंद कार्टून चैनलदेखना। फिर होम वर्क करना। पापा-मामा से बातें करना। और जाने क्या-क्या।

इस उम्र में डांट पड़ना या कभी-कभी पिटाई हो जाना तो आम बात होती है। स्कूल में होम-वर्क करने क़ी वजह सेपिटाई होती है तो घर पर ज्यादा देर तक खेलने या टी. वी. देखने पर। लेकिन कौन परवाह करता है, थोड़ी देर रोयेफिर अपने-आप ही चुप हो गए और लग गए अपने काम पर फिर से। ऐसा नहीं है कि उस उम्र में दबाव नहीं होताथा। लेकिन शायद अब बच्चे कम उम्र में ही ज्यादा समझदार होने लगे हैं।

समय बदला है। समय के साथ बच्चों क़ी सोच भी बदली है समय के बदलाव में जिस तत्व ने सबसे अहम् भूमिकानिभाई है, वो है सूचना-तकनीकि। आज बहुत कम उम्र में ही बच्चे ऐसी बहुत सी बातें जान चुके होते हैं जिन्हें पहलेके लोग वयस्क होने पर भी बमुश्किल जान पाते थे। और सोचने वाली बात तो ये है कि उन बच्चों को तो इस बातका एहसास है लेकिन बड़े अभी भी इस बदलाव को समझ नहीं सके हैं। यही विरोधाभास जनरेसन गैप पैदा कररहा है। इस गैप का ही नतीजा है क़ी आज बच्चों और माँ-बाप के बीच की दूरी बढ़ती जा रही है। उनके बीच संवादकम होता जा रहा है। किसी भी रिश्ते में अगर बातचीत कम होने लगे तो समझ लेना चाहिए कि कुछ गड़बड़ है याबहुत जल्दी कोई बड़ी गड़बड़ होने वाली है।

कुछ वक़्त पहले तक बच्चे का doctar , enjineer , आई. ए.एस., वकील या मैनेजर बनना किसी भी माँ-बाप केलिए गर्व क़ी बात होती थी। लेकिन बदलते वक़्त ने बच्चों की उम्मीदों और उनके सपनो को नई दिशा दिखाई है।आज के बच्चों को सिनेमेटोग्राफर , फोटोग्राफर ,डांसर , मयूजिशन जैसे प्रोफेशन अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं।उनके आदर्शों में सचिन तेंदुलकर, सानिया मिर्जा, अभिनव बिंद्रा, करीना और कटरीना जैसे लोग शामिल हो चुकेहैं। ऐसा नहीं है कि आज का युवा डोक्टर,इंजीनियर या scientist बनना ही नहीं चाहता, लेकिन आज के बच्चे यायुवा किसी से प्रेरित होने कि जगह अपने दिल क़ी आवाज और अपने intarest को ज्यादा तवज्जो देते हैं।

जो माँ-बाप इस बदलाव को जितनी जल्दी समझ जाते हैं वो अपने बच्चों को उतने ही अपने करीब पाते हैं। लेकिनदुर्भाग्य से आज भी ऐसे माँ-बाप हैं जो अपने बच्चे का भविष्य बनाने के लिए उनपर अपने सपनो को थोपना चाहते हैं। माँ-बाप का इरादा हमेशा ही अपने बच्चों की ख़ुशी होता है, लेकिन मासूम नौनिहालों के कोमल कन्धों पर अपनेसपनो का बोझ डालने से पहले उनसे भी तो हमें ये पूछना चाहिए की आखिर वो क्या चाहते हैं।

हमारे सपने हमारे बच्चों से ज्यादा कीमती तो नहीं हैं ? अक्सर हम अपने बच्चों पर कुछ खास करने का दबावडालते हैं क्यूंकि हमें लगता है कि इससे समाज में हमारा सम्मान बढेगा, हमारी इज्जत बढ़ेगी, लेकिन इस झूठीशान ने जाने कितने होनहार युवाओं और बच्चों से उनकी जिंदगियां छीन ली हैं। ये सिलसिला रोकना होगा औरइसका सिर्फ एक ही रास्ता है; हमें अपने बच्चों को अपना दोस्त बनना पड़ेगा। हमें उनसे बात करनी होगी, उन्हेंसमझना होगा और समझाना भी होगा।

संजीव श्रीवास्तव

1 comment:

nidhi said...

aapke lekh pade "kya hum dost nahi ban sakte " dil ko chu gaya .bachho ke dost ban kar hi unke karrb jaya ja sakta he.umeed he aage bhi isi tarah ke vichar padne ko milenge.