Monday, 25 January 2010

इन सबके पीछे थी कहीं दौलत की ज़रूरत !

कश्ती को भँवर में फँसते हुए देखा,

जिंदगी को कई मोड़ पे रुकते हुए देखा,

अब तक के सफ़र में कई ऐसे भी दौर हैं,

जब खुद को सरेआम शर्मिंदा होते हुए देखा,


कभी कपड़ों, कभी सूरत, तो कभी सीरत ने दी ज़िल्लत,

कभी जूतों के उखड़े सोल ने दिलाई हमें ज़िल्लत,

इन सबके पीछे थी कहीं

दौलत की ज़रूरत,

इसने हर मकाम पे दिलाई हमें ज़िल्लत,


कहते हैं की अक्सर निकलते हैं गुदड़ी में ही लाल,

हमने तो यहाँ लालों को गुदड़ी में है पाया,

अक्सर यहाँ किताबों में छपते हैं ये किस्से,

की हमारे लाल ने तो बिना कोचिंग के ही टॉप किया है,

अब क्या कहें वो , जिन्हें रोटी भी नहीं मिलती,


काबिल हैं वो जो खुद को औरों से रक्खें आगे,

वो क्या रहेंगे आगे जिन्हें रोटी की फिक्र है,

रोटी तो भरती पेट है , लाती नहीं रौनक,

रौनक तो ली जाती है चेहरा मसाज से,


भाते नहीं गरीब जिन्हें रेंगते हुए,

देते हैं वो भाषण जिन्हें कुत्तों से प्यार है,

कहते हैं खुद को वो गरीबों का रहगुज़र,

वो जिनको पता भी नहीं की रोटी का क्या भाव है।


संजीव श्रीवास्तव

2 comments:

smsinhindi.com said...

Bilkul sahi baat kaha hai apne kavita ke madhyam se... jinko roti ki kimat nahi pata hai wo bhi khud ko garibo ke subhchintak mante hai

Udan Tashtari said...

बहुत जबरदस्त रचना..चोट करती है,