Saturday, 23 January 2010

ये दौर बहुत मुश्किल है मगर ...


ये दौर बहुत मुश्किल है मगर,

ना जाने क्यूँ सहता हूँ इसे,
मेरे साथ और भी लोग हैं यहाँ,
वो सब हँसते रहते हैं मगर,

कहते हैं जो करने के लिए,
मै कर नहीं पाता उसको मगर,
उन्हें लगता है मै काहिल हूँ,
मै काम नहीं करना चाहता,

ये सुनके बुरा लगता है मगर,
मै फिर भी सुनता जाता हूँ,
उनसे मै कहना चाहता हूँ,
ये काम नहीं मेरे मन का है,

मै आया था जान लगाने के लिए,
पर मन तक नहीं लगता है यहाँ,
इस बात का बेहद दुःख है मुझे,
इस दुःख की पीड़ा के आगे उनकी हर उलाहना छोटी लगती है,

सोचा था यहाँ होंगे ऐसे लोग जिनसे मै सब कह दूंगा मगर,
जब जाना ये है सच्चाई कि, काम नहीं केवल बातें की जाती हैं यहाँ,
यहाँ सबसे आगे रहने के लिए सबसे ज्यादा बोलना पड़ता है,
कोशिश यहाँ सबकी रहती है खुद को उम्दा बतलाने की,

वो कमजोरों पर हँसते हैं, उन्हें पिछड़ा कहते रहते हैं,
ये देख के पीड़ा होती है कि सर भी उनकी ही सुनते हैं,
ये खेल तमाशे-बाजी का मै खेल नहीं सकता हूँ कभी,

मै कजोरों को लेकर साथ, बाज़ी जीताना चाहता हूँ,
मै भी चाहता हूँ कि जीतूँ मगर, इसकी ख़ुशी उन्हें ज्यादा हो,
जिन्हें होपलेस यहाँ कहते हैं,

निराश में जो आशा जगा सके,
उन्हें कैसे मै स्वीकार करूँ,
खुद को साबित करने नहीं,
मै तो आया था यहाँ कुछ काम लिए,

रोते को हँसाना चाहता था, गिरते को उठाना चाहता था,
जो सबसे पीछे था उसको मै आगे लाना चाहता था,
पर यहाँ तो खुद ही सब आगे आना चाहते हैं,
पीछे वालों को वो काहिल कहते हैं,

अब सोचता हूँ किन्हें पिछड़ा कहूँ,
जो पीछे हैं ?
या जो आगे आना चाहते हैं ?

ये दौर बहुत मुश्किल है मगर,
इसे सह कर, एक बात सीखी है,
मुश्किल है उन्हें आगे लाना जो पीछे हैं, जो नीचे हैं,

क्या होगा उनका हाल मगर,
जो आगे रहकर भी पिछड़े हैं

संजीव श्रीवास्तव

2 comments:

अफ़लातून said...

आपको और विकास जुत्शी को इस ब्लॉग के लिए बधाई और शुभ कामनाएं ।
’converjent' किस्म के शब्द के हिज्जे ठीक कर लें । पोस्ट्स भी छापने के पहले खुद पढ़ लें।
टिप्पणियों के लिए word verification हटा लीजिए , लोग इसे झंझट-सा मानते हैं }। आपके ब्लॉग को ब्लॉगवाणी के लिए भेज रहा हूं ताकि आपकी हर नई पोस्ट की फ़ीड व्यापक पाठक समुदाय ्के समक्ष आती रहे ।

Amitraghat said...

शानदार लिखा है यथार्थ लेखन इसे कह्ते हैं ।
प्रणव सक्सेना
amitraghat.blogspot.com