Sunday, 31 January 2010

दलाली यहाँ का सबसे बड़ा रोज़गार है


दिल्ली में आये थे ,सुना था नाम बड़ा इसका,

देखा तो यहाँ हर तरफ बिखरी है गरीबी ,

दिन भर भटकते हैं यहाँ रोटी की तलाश में ,

रातों को सोते देखा जिन्हें कूड़ेदान में,


है रौशनी हर तरफ ,रौनक है हर तरफ ,

मेट्रो पे हैं सवार यहाँ लोग बेफिक्र,

किसको फिकर है कितने गरीब यहाँ बेकार हैं ,


कहते हैं इस शहर में बहुत रोज़गार है ,

जाती है पूरी कमाई जहाँ किरायेदारी में,

मिलती है सस्ती रोटी , यहाँ पानी है महंगा,

दलाली यहाँ का सबसे बड़ा रोज़गार है,


कमरे की दलाली यहाँ गाडी की दलाली ,

कहते हैं जिस्म की दलाली भी यहाँ ज़ोरदार है,


संजीव श्रीवास्तव

3 comments:

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

दलाल तो देश को भी चलाने में योगदान दे रहे हैं बन्धु. वर्ड वेरीफिकेशन हटा दें तो अधिक सुविधा होगी.

Udan Tashtari said...

दलाली ही दलाली..

Amitraghat said...

संजीव-सफेद दाँतों के पीछे टारटर भी जमा होता है- बिल्कुल सही लिखा है आपने,विचार के स्तर पर भी और शब्दों के स्तर पर भी बस ज़रूरत है किसी ठोस हल की...... ।