Saturday, 6 February 2010

यहाँ बूढ़े भी शान से साईकिल पे चलते हैं !

हर कोई चाहता है यहाँ पे ‘बड़ा’ बनना,

जो न बन सके वो ‘लूज़र’ कहलाता है,

बड़ा बनने के लिए चुकानी पड़ती है एक कीमत,

कभी वो अपनों से दूर, तो कभी कर देती है दोस्त को दुश्मन,


ये कीमत है नहीं कुछ भी उन बड़े सपनो के बदले में,

मगर जाने क्यूँ मुझे ये सब नहीं भाता,


मै जीना चाहता हूँ एक सादा,सरल सा जीवन बस,

जहाँ मै हूँ ,मेरी मिटटी, मेरे सब दोस्त हो नज़दीक,


मै एक छोटे से घर में अपना एक कमरा चाहता हूँ,

मै उस घर को अपने सपनो के घर की तरह सजाना चाहता हूँ,


हैं देखे ऐसे भी घर जो ज़न्नत से भी खुबसूरत हैं,

मगर उसमे रहने वाली माँ की आँखों में बस उसका गाँव दीखता है,


माना बहुत मुश्किल है बड़ा आदमी बनना यहाँ,

मगर इतना आसन भी नहीं है यहाँ, एकआम आदमीबनना भी,


बिना हीटर के सर्दी में ,बिना बिजली के गर्मी में,

नहीं सुनता है जिसकी यहाँ बाबू भी दफ्तर में,

यहाँ अक्सर जो मरता है डाक्टर की गलती से,

सह जाता है जीवन भर जो तारीखें कचेहरी की,


वो सूखे को भी सहते हैं ,वो बाद में भी बहते हैं,

वो ट्राफिक में भी फंसते हैं,वो गढ्ढे में भी गिरते हैं,

मगर फिर भी वो अपना वोट उसी लीडर को देते हैं,

जो ट्राफिक जाम करता है और खुले आम करता है,


क्यूँ कोई चाहेगा यहाँ पे आम आदमी बनना,

जहाँ पे है बड़ा आसां एक कातिल से नेता बन जाना,

जहाँ पे रक्षक ही करते हैं मर्यादा का उल्लंघन,

यहाँ पे कहलाता है डी. जी. पी., एक इज्ज़त का लुटेरा भी,

जहाँ पे राष्ट्र-भाषा की होती है तौहीनी,

और इज्ज़त पाई जाती है बोलने पेअंग्रेजी’,

मुझको नहीं भाति ये बातें बड़ा बनने वालों की,

मुझे तो मतलब है बस अपने छोटे से आँगन की,

मुझे तो भाती है अपने गाँव की मिट्टी,

जो अपने संग लाती है खुशबु गाँव वालों की,

मै वापस जाना चाहता हूँ उनके-सब के बीच,

जिन्हें मेरी ज़रूरत है,मुझे कम नहीं उनकी भी,

मै खुश-किस्मत था पहुंचा यहाँ तक भी,

मगर वो ले नहीं सकते टिकट भी यहाँ तक आने का,

मै जाना चाहत हूँ उनको ये बतलाने,

किस्मत उनकी अच्छी है जो सोते हैं अपने छप्पर में,

वहां तो निपटने के लिए भी पैसा देना पड़ता है ,

यहाँ पे रुखी-सुखी है मगर है अपनी इज्ज़त भी ,

वहां तो सिर्फ पैसे वालों की ही इज्ज़त होती है ,

वहां पे कमरा मिलता है किराया देने पर ,

मगर मिलती नहीं है धुप पूरा फ्लैट ले कर भी,

यहाँ पे लोग मिलते हैं गली में और चौपालों पर,

वहां तो मिलना होता है होली और दिवाली पर,

हैं मुश्किलें यहाँ पर भी ,वहां पर भी,

वहां मुश्किल है जीना भी,

यहाँ मुश्किल नहीं है इतना भी,

वहां पे बच्चे भी शरमाते हैं बाइक से चलने में,

यहाँ बूढ़े भी शान से साईकिल पे चलते हैं,

वहां शामें बिताई जाती हैं बारों और डिस्को में,

यहाँ पे भीड़ लगती है चौपालों और मैदानों पे,

है सब कुछ बहुत सुन्दर और सलीके से,

मगर यहाँ की अल्ल्हड़ता बसी है सीने में,

जाता हूँ जब भी शहर में गाँव याद आता है,

क्यूँ कोई भी याद नहीं आता शहर का, जब मै गाँव जाता हूँ

संजीव श्रीवास्तव

3 comments:

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